एक और नासूर नहीं

स्थानीय निवासी अपनी आजीविका, जल स्रोतों, पुश्तैनी जमीनों, और सांस्कृतिक पहचान के हनन का विरोध करते हैं, तो उनके खिलाफ सख्त कदम स्थिति को और अधिक बिगाड़ देते हैं। अतः सरकार को संवाद का रास्ता चुनना चाहिए।

अरुणाचल प्रदेश में सियांग बांध का विरोध तेज होने के साथ ही सरकार ने युवा आंदोलनकारियों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। कम-से-कम 47 लोगों पर मुकदमे दायर किए गए हैं। 26 लोग गिरफ्तार किए गए हैं, जिनमें पांच नाबालिग बताए जाते हैं। केंद्र ने रैपिड एक्शन फोर्स की टुकड़ियां वहां भेजी हैं। अशांति की स्थिति में प्रशासनिक कार्रवाई के औचित्य से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन बेहतर यह होगा कि वहां के हालात को सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या ना मानी जाए। समझा जाता है कि सियांग परियोजना पर अमल में तेजी तिब्बत में चीन के बांध बनाने के निर्णय के मद्देनजर लाई गई है।

चीन के बांध से संभावित चुनौती का मुकाबला करने की पूर्व-तैयारी अपने-आप में समस्याग्रस्त सोच नहीं है। लेकिन इस दौरान स्थानीय निवासियों की इस राय को अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि सियांग नदी पारंपरिक रूप से उनकी जिंदगी का सहारा रही है। इसलिए उस नदी के बहाव या उसकी प्राकृतिक संचरना में कोई परिवर्तन करने से पहले लोगों की सहमति पाना जरूरी है। वरना, यह परियोजना ऐसे जन असंतोष का कारण बन सकती है, जो चीन से लगे उस सीमाई इलाके में एक स्थायी नासूर बन जाए। मणिपुर गुजरे साढ़े तीन साल से सुलग रहा है। ऐसे में उत्तर-पूर्व के एक और राज्य की आबादी में आक्रोश पैदा करने का जोखिम नहीं उठाया जा सकता।

यह समझने की बात है कि जब स्थानीय निवासी अपनी आजीविका, जल स्रोतों, पुश्तैनी जमीनों, और सांस्कृतिक पहचान के हनन के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो उनके खिलाफ दमनकारी कदमों का इस्तेमाल स्थिति को और अधिक बिगाड़ देता है। अतः सरकार को तुरंत सभी सख्त कदमों और जबरन फैसले थोपने की प्रवृत्ति पर विराम लगाते हुए व्यापक जन संवाद शुरू करना चाहिए। ग्राम सभाओं, बुद्धिजीवियों, पर्यावरण विशेषज्ञों और प्रभावित नागरिकों को इस प्रक्रिया में समान भागीदार बनाकर उनकी चिंताओं का पारदर्शी समाधान निकाला जाना चाहिए। उससे विकास एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में स्थानीय आवाम की सहभागिता बनाई जा सकेगी। वरना, उस क्षेत्र के लोग सियांग डैम को सत्तातंत्र की मनमानी के प्रतीक रूप में देखते रहेंगे।