बर्लिन में बना जर्मनी का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर

Berlin New Hindu Tempel

Berlin – New Hindu Tempel: बर्लिन और पूरे जर्मनी में हिंदू समुदाय के लिए रविवार 7 जून का दिन, एक बहुत ही विशेष दिन था। उस दिन, जर्मनी की राजधानी बर्लिन, एक नए अपूर्व आकर्षण की धनी बन गई।

 

20 वर्षों से भी ज़्यादा समय की योजना और निर्माणकार्य पूरा होने के बाद, 7 जून 2026 के दिन, बर्लिन के “नोएकौएल्न” (नवकोलोन) नाम के उपनगर में, गणेश जी को समर्पित एक नए भव्य हिंदू मंदिर का— उनकी मूर्ति की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा और मंदिर की इमारत के अभिषेक के साथ— भव्य उद्घाटन हुआ।

 

अभिषेक समारोह के दौरान, तीन पुजारियों में से एक ने, एक ऊँचे क्रेन की सहायता से मंदिर के शिखर पर बर्लिन की स्प्रे नदी और भारत की गंगा नदी के मिश्रित पानी का जलार्पण किया। बर्लिन, जर्मनी की राजधानी होने के साथ-साथ जर्मनी का एक राज्य भी है। इसीलिए, मंदिर के उद्घाटन समारोह में बर्लिन राज्य के दो मंत्री और जर्मनी में भारत के राजदूत अजीत गुप्ते भी उपस्थित थे।

निर्माण पूरी तरह दान के पैसे से

17 मीटर से भी अधिक ऊँचाई वाला यह मंदिर अब जर्मनी में सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है। उसका का निर्माण पूरी तरह दान के पैसे और लोगों द्वारा स्वैच्छिक सेवा के बल पर किया गया है। उसे बनाने वाली पंजीकृत संस्था “श्री-गणेश-हिंदू-मंदिर .V.” के प्रमुख विल्वानाथन कृष्णमूर्ति ने मीडिया को बताया कि यह “श्री गणेश हिंदू मंदिर” शनिवार से ही लोगों के लिए खुल गया: मंदिर में सभी का गर्मजोशी से स्वागत है। इस मंदिर के निर्माण की योजना 20 साल से भी पहले बनी थी और निर्माणकार्य 2010 में शुरू हुआ था। निर्माण का ख़र्च, जो लगभग 11 लाख यूरो के बराबर है (1 यूरो=111रूपये), केवल दान के ज़रिए जुटाया गया।

निर्माण कार्य में विलंब

2005 की शुरुआती योजनाओं के अनुसार, निर्माण कार्य 2007 के अंत में शुरू होना और मंदिर 2010 तक बन कर पूरा होना था। 4 नवंबर 2007 के दिन मंदिर की नींव रखने का पहला समारोह हुआ, लेकिन उसके बाद निर्माण कार्य वास्तव में शुरू नहीं हो पाया। 2010 में निर्माण की सरकारी स्वीकृति जब मिल गई, तो उसी साल सितंबर में मंदिर की नींव रखने का दूसरा समारोह हुआ। 

 

इसके बाद, सितंबर 2011 तक काम पूरा करने का लक्ष्य रखा गया, लेकिन चंदा कम मिलने के कारण ऐसा हो नहीं सका। एक वर्ष बाद, 2012 में ही “राजा गोपुरम” कहलाने वाले प्रवेश द्वार के लिए नींव और खंभे आदि खड़े किए जा सके। 2013 में निर्माण अनुमति की समय-सीमा ख़त्म होने के बाद, नई अनुमति के लिए एक नया आवेदन करना पड़ा। हालांकि, 2024 में काम पूरा होने की तारीख तय की गई थी, लेकिन उस समय तक काम पूरा नहीं हो पाया था, इसलिए अगली समय-सीमा अक्टूबर 2025 तय की गई।

यूरोप में अपनी तरह का सबसे बड़ा मंदिर

बर्लिन में बना यह भव्य मंदिर पूरे, यूरोप में अपनी तरह के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है। मंदिर की 17 मीटर ऊँची सुनहरी छत, दक्षिण भारतीय कारीगरों द्वारा बनाई गई शानदार नक्काशी-भरी कलाकृति है। मंदिर की दीवारों वाले नीले रंग के बाहरी हिस्से पर सजावटी पैटर्न और देवी-देवताओं की आकृतियाँ बनी हुई हैं। पूजा-स्थल का अंदरूनी हिस्सा भी बहुत शानदार ढंग से डिज़ाइन किया गया है। प्रवेश द्वार को हाथ से पेंट की गई 250 आकृतियों से सजाया गया है। पूजा स्थल के अंदरूनी हिस्से को भी शानदार ढंग से डिज़ाइन किया गया है। इसमें गणेश जी को समर्पित मुख्य वेदी के साथ-साथ कई अन्य वेदियाँ भी हैं—जो शिव, विष्णु और दुर्गा जैसे देवी-देवताओं को समर्पित हैं—और जिनकी रक्षा रक्षकों की भव्य आकृतियाँ करती हैं। बर्लिन में यह दूसरा और पूरे यूरोप में गणेश जी को समर्पित संभवतः एकमात्र मंदिर है।

2080 तक के लिए मिली है ज़मीन

गणेश जी ऊर्जा और बुद्धिमत्ता के प्रतीक माने जाते हैं। मंदिर की प्रायोजक संस्था के प्रमुख विल्वानाथन कृष्णमूर्ति के अनुसार, श्री गणेश मंदिर लगभग 850 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला है, जबकि वर्ष 2080 तक मंदिर के लिए मिली पूरी ज़मीन लगभग 5,000 वर्ग मीटर के बराबर है। इससे पहले बर्लिन में जो एकमात्र हिंदू मंदिर था और अब भी है, वह 2013 में बना था और “श्री मयूरपति मुरुगन मंदिर” कहलाता है। वह मुख्य रूप से श्रीलंका में 1983 से 2009 तक चले “तमिल टाइगर्स” वाले गृहयुद्ध के समय, वहां से यूरोप और जर्मनी में आए तमिल शरणार्थियों का बनाया मंदिर है।

Berlin New Hindu Tempel

श्रीलंकाई तमिलों ने ही जर्मनी के नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया राज्य के “हाम” (Hamm) शहर में, जर्मनी में पहला हिंदू मंदिर बनाया था। दक्षिणी भारत के कांचीपुरम में स्थित कामाक्षी देवी के मंदिर की वास्तुकला से प्रेरित “श्री कामाक्षी अम्पाल” नाम के इस मंदिर का उद्घाटन 7, जुलाई 2002 के दिन हुआ था। अर्किटेक्ट (वस्तुकार) थे, जर्मनी के हाइंस-राइनर आइशहोर्स्ट। हाम के तमिल-हिंदू मंदिर को पूरे यूरोप में सबसे बड़ा द्रविड़ मंदिर माना जाता है।

बर्लिन में हिदुओं की अनुमानित संख्या 45,000

किसी को भी ठीक-ठीक नहीं पता कि लगभग 40 लाख की जनसंख्या वाले बर्लिन में कितने हिंदू रहते हैं। श्री गणेश मंदिर की निर्माता संस्थ केप्रमुख विल्वानाथन कृष्णमूर्ति का अनुमान है कि बर्लिन में हिदुओं की संख्या 45,000 तक हो सकती है। हाल ही में इस संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है, जिसका मुख्य कारण भारत से आए छात्र और आईटी (IT) पेशेवर माने जाते हैं। 8 करोड़ 41 लाख की जनसंख्या वाले पूरे जर्मनी में भी अनुमानतः क़रीब केवल 2 लाख ही भारतीय रहते हैं, जिनमें से अनुमानतः1 लाख हिंदू हैं।

 

मंदिर के उद्घाटन समारोह के समय बताया गया कि उस के दरवाज़े रोज़ शाम 4:00 बजे से 6:00 बजे तक सबके लिए खुले रहेंगे। सुबह और शाम की आरती में शामिल होने के लिए किसी पंजीकरण या प्रवेश फ़ीस की ज़रूरत नहीं होगी। यह मंदिर हर हिंदू परंपरा—वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मार्त—और यहाँ आने वाले हर व्यक्ति का स्वागत करेगा: बर्लिन के परिवारों, छात्रों, अलग-अलग धर्मों के लोगों, आस-पास के कार्यालयों के कर्मचारियों तथा “ओपन डे” पर आने वाले स्कूली बच्चों की टोलियों का भी स्वागत है।

संस्कारी अनुष्ठान संस्कृत, तमिल या हिंदी में

मंदिर के पुजारी नामकरण संस्कार, स्कूल जाने की शुरुआत, शादी और गृह-प्रवेश की पूजा जैसे अवसरों के लिए उलब्ध रहेंगे। वे संस्कारी अनुष्ठान संस्कृत, तमिल या हिंदी में करवाते हैं— साथ में जर्मन या अंग्रेज़ी अनुवाद भी होता है। संस्कृत भाषा सीखने की हर हफ़्ते क्लास लगेगी। संस्कृत की पहले से कोई जानकारी होना ज़रूरी नहीं है। बच्चे और बड़े, सब साथ-साथ सीख सकते हैं। हार्मोनियम और तबले के साथ गाना- बजाना सीखने की भी सुविधा होगी। त्योहारों के दिन “अन्नदान” होगा— सभी मौजूद लोगों के लिए गर्म भोजन होगा— चाहे वे भक्त हों या अचानक आए आगंतुक।

 

बर्लिन का बहुचर्चित और उतना ही प्रतीक्षित मंदिर तो अंततः बन गया; उसके निर्मातओं को अब एक ऐसा “अंतर-सांस्कृतिक मिलन-केंद्र” बनाने का विचार ललचा रहा है, जिसका उद्देश्य बर्लिन की अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों के लोगों के बीच पारस्परिक संवाद को बढ़ावा देना होगा। यह एक ऐसा विचार है, जो अन्यथा अन्य धर्मों वाले लोगों और उनके धर्माधिकारियों के मन में नहीं आता। अन्य धर्मी यही मानते हैं कि केवल उनका धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। अतः जो उनके सहधर्मी नहीं हैं, वे उनके धर्म को अपनाएं।

Fathers Day 2026: पिता का साया क्यों होता है सबसे बड़ा सहारा? जानिए फादर्स डे पर

Fathers are a protective shield for their children; the image depicts a scene celebrating Happy Fathers Day

Father and Family Relationship: इस बार रविवार, 21 जून 2026 को पितृ दिवस मनाया जा रहा है। फादर्स डे एक ऐसा मौका है जब हम उस इंसान को शुक्रिया कहते हैं जो खामोशी से हमारे पूरे जीवन की नींव रखता है। अक्सर मां के प्यार और ममता पर बहुत कुछ लिखा जाता है, जो कि बिल्कुल सही भी है, लेकिन पिता का प्यार थोड़ा अलग होता है। वह अमूमन अपनी भावनाएं जताते नहीं हैं, लेकिन उनका साया जीवन का सबसे बड़ा सहारा होता है।

 

आखिर पिता का साया सबसे बड़ा सहारा क्यों माना जाता है? आइए इसे कुछ गहरे पहलुओं से समझते हैं:

 

1. सुरक्षा का मजबूत कवच

बचपन में जब पिता का हाथ थामकर हम मेले या भीड़-भाड़ वाली जगह पर चलते थे, तो एक अजीब सा सुकून रहता था कि 'अब कुछ गलत नहीं हो सकता।' पिता का होना घर में एक ऐसी सुरक्षा की भावना देता है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। दुनिया की कोई भी मुसीबत हो, पिता एक ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं ताकि आंच बच्चों तक न पहुंचे।

 

2. बिन कहे सब कुछ सहने की ताकत

एक पिता की सबसे बड़ी खासियत होती है उनका मौन समर्पण। अपनी खुशियों, नए कपड़ों या जरूरतों को टाल देना ताकि बच्चों की स्कूल फीस और ख्वाहिशें पूरी हो सकें। ऑफिस या काम के तनाव को घर के दरवाजे के बाहर ही छोड़ देना और अंदर आते ही मुस्कुराना। कभी यह अहसास न होने देना कि वह आर्थिक या मानसिक रूप से किसी दबाव में हैं।

 

3. उड़ने के लिए पंख और गिरने पर हौसला

मां जहां हमें संवारती है और संभलकर चलना सिखाती है, वहीं पिता हमें दुनिया की कड़वी सच्चाइयों का सामना करना सिखाते हैं। जब आप लाइफ में पहली बार असफल होते हैं, तो पिता वो इंसान होते हैं जो आपकी पीठ थपथपाकर कहते हैं- 'कोई बात नहीं, उठो और दोबारा कोशिश करो, मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूं।' वह आपको रिस्क लेना सिखाते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि गिरकर ही बच्चा मजबूत बनेगा।

 

4. जीवन के सबसे पहले 'रोल मॉडल'

हर बच्चे के लिए उसके पिता दुनिया के सबसे मजबूत और बुद्धिमान इंसान होते हैं। हम अनजाने में ही सही, उनके चलने, बात करने, और मुश्किल हालातों से निपटने के तरीके को कॉपी करने लगते हैं। एक पिता का अनुशासित और ईमानदार जीवन ही बच्चों के भविष्य के नैतिक मूल्यों (Values) की नींव रखता है।

 

5. इस फादर्स डे पर क्या करें?

पिता कभी आपसे महंगे तोहफों की उम्मीद नहीं करते। उन्हें सिर्फ आपका थोड़ा सा वक्त और सम्मान चाहिए होता है।

 

उनसे बात करें: आज के दिन उनके पास बैठें, उनके पुराने दिनों के किस्से सुनें।

 

शुक्रिया कहें: जो बातें आप रोज नहीं कह पाते, आज कह दें—'पापा, आप जो मेरे लिए करते हैं, उसके लिए थैंक यू।'

 

उनके चेहरे पर मुस्कान लाएं: उनकी पसंद की कोई छोटी सी चीज या उनके साथ उनकी पसंदीदा चाय/कॉफी शेयर करें।

 

आपके जीवन में आपके पापा का साया हमेशा एक मजबूत बरगद के पेड़ की तरह बना रहे।

 

फादर्स डे की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं! 

 

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तेजी से बदल रहा है बंगाल

 West Bengal Chief Minister Suvendu Adhikari

पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी सरकार द्वारा सत्ता संभालने के अल्पकाल में ही स्पष्ट बदलाव दिख रहा है। ऐसा लगता है कि केवल ममता सरकार की विचारधारा और दिशा के बिल्कुल उलट शुभेंदु सरकार ने यू टर्न ही नहीं किया बल्कि सारे कील कांटों को उखाड़ते, ध्वस्त करते तीव्र गति से शासन की गाड़ी वहां पहुंच रही है जहां से  बंगाल शांत और स्थिर हो सामान्य राज्य के रूप में गतिविधियों का निर्धारण करे। 

 

शुभेंदु सरकार ने कुछ फैसले किए तथा कुछ प्रभाव में ही परिवर्तन आ गया। इनमें केवल केंद्रीय योजनाओं को लागू करना ही नहीं है। आप चाहे भाजपा के जितने आलोचक हों क्या किसी ने कल्पना की थी कि सरकार आने के हफ्ते भर के अंदर ही राज्य से टीएमसी द्वारा लगाए अवैध टोल बूथ हट जाएंगे, बैरिकेड समाप्त हो जाएंगे, हफ्ते वसूली का धंधा खत्म हो जाएगा…? यह हो गया। 

 

ममता ने स्वयं महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिंता प्रकट करते हुए रात में न निकलने का आग्रह किया था। सरकार बदलते ही बंगाल अपने स्वभाव, संस्कृति और चहल-पहल में वापस दिख रहा है। महिलाएं देर रात आती-जाती दिखाई दे सकती है। सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।

कोलकाता समेत कई जिलों में रात की पुलिस पेट्रोलिंग काफी बढ़ा दी गई है। आम प्रतिक्रिया देख लीजिए सोशल मीडिया से लेकर मुख्य मीडिया में लोग लिख रहे हैं कि अब सरकार बदली है ऐसा महसूस हो रहा है। बकरीद के दिन वर्षों बाद सड़कों की बजाय मैदानों और मस्जिदों में नमाज पढ़े गए। 

 

किसी सरकार की दिशा का संकेत होता है और अगर वैचारिक और प्रशासनिक दिशा स्पष्ट हो, उनके प्रति प्रतिबद्धता और व्यवहार में प्रखरता हो तो उसका इकबाल  कायम होता है। चुनाव परिणाम के तुरंत बाद ऐसा लग रहा था मानो बंगाल को संभालना कठिन होगा। कुछ ही दिनों में ऐसा लगने लगा मानो यह वो बंगाल है ही नहीं जिसे हम 4 मई के चुनाव परिणाम के पूर्व या उसके दो चार दिनों बाद तक देख रहे थे। 

 

कोलकाता से आसनसोल तक अवैध निर्माण के विरुद्ध बुलडोजर कार्रवाई का आक्रामक हिंसक विरोध पूर्व सरकार की तस्वीर पेश कर रहा था। पत्थरबाजी भी हुई। उसके बाद क्या हुआ यह महत्वपूर्ण है। फुटेज से पत्थरबाजों और दंगाइयों के चेहरे पहचान कर कार्रवाई हो रही है तथा पुलिस ने लाउडस्पीकर में ऐलान कर दिया कि जिन लोगों ने हिंसा और तोड़फोड़ की है उनकी संपत्ति से इसकी वसूली की जाएगी।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने हिंसक प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों के विरुद्ध यही नियम अपनाया और उसके परिणाम काफी हद तक आए। बंगाल में इसकी कल्पना ही नहीं थी जो सामने है। 

 

भाजपा ने चुनाव अभियान में कानून और व्यवस्था कायम करने, महिला सुरक्षा, अवैध घुसपैठ रोकने, घुसपैठियों को बाहर निकालने, सीमा सुरक्षा एवं अंतरिक्ष सुरक्षा दोनों सुनिश्चित करने, तुष्टिकरण की समाप्ति एवं हिंदुओं के साथ हुए अन्याय का परिमार्जन, भ्रष्टाचार का अंत, प्रदेश को विकास एवं सांस्कृतिक गरिमा की पटरी पर वापस लाने आदि वायदे किए थे। 

 

मुख्यमंत्री का पदभार संभालते ही शुभेन्दु ने बांग्लादेश की सीमा पर घेराबंदी के लिए सीमा सुरक्षा बल को भूमि सौंपने का आदेश दिया जिसे 45 दिनों में पूरा हो जाना है। 450 किलोमीटर ऐसे क्षेत्र हैं जहां घेरा लगाना बाकी है उसकी जमीन मिली नहीं। मिनट में यह काम हो गया। इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला नेशनल हाईवे 10 और नेशनल हाईवे 110 के सात हिस्से केंद्र सरकार को सौंपना है। इनमें से पांच चिकन नेक या सिलीगुड़ी गलियारा से गुजरते हैं। 

 

चिकन नेक का 120 किलोमीटर इलाका पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को भारत के साथ जमीन से जोड़ता है। यह बांग्लादेश, नेपाल, भूटान तीन देशों से लगता है और चीन भी यहां से निकट है। चिकन नेक कट जाए तो पूर्वोत्तर से भारत का सीधा जमीनी संपर्क खत्म हो जाएगा।

दिल्ली दंगों के आरोपी सरजिल इमाम को उच्चतम न्यायालय ने आज तक जमानत इसीलिए नहीं दी कि उसने मुसलमानों के द्वारा चिकन नेट काट कर भारत को खंडित करने की बात की थी। संयोग से उस पूरे क्षेत्र में भारत के अंदर बंगाल और बिहार दोनों और मुसलमानों की आबादी राष्ट्रीय औसत से अधिक है तथा दूसरी और बांग्लादेश है। 

 

मुस्लिम आबादी को भड़का कर चिकन नेक काट कर शेष पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने का विचार बांग्लादेश के पूर्व शासक मोहम्मद यूनुस से लेकर वहां जेन जी आंदोलन तथा जमात ए इस्लामी के नेताओं के सामने आए । ममता सरकार ने केंद्र के आग्रह को स्वीकार नहीं किया और इस कारण वहां रक्षा और नागरिक दोनों प्रकार के आधारभूत संरचनाओं की कमी रही। 

 

अवैध घुसपैठ के साथ अनेक भारत विरोधी गतिविधियां, अवैध पशुओं एवं सामग्रियों की तस्करी आदि को पूरी तरह रोक पाना कठिन था।  नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया तथा नेशनल हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड मिलकर इसका विकास करेगा। यानी आंतरिक और सीमा सुरक्षा और दूसरे रूप में कहें तो घुसपैठियों को रोकने के लिए सरकार ने पूर्ण प्रतिबद्धता दिखाई है। 

 

कट मनी और भ्रष्टाचार तथा महिलाओं के विरुद्ध अपराध की व्यापक छानबीन और कार्रवाई के लिए दो उच्च स्तरीय अधिकार प्राप्त आयोगों का गठन किया जा चुका है। सरकार ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज के पूर्व सुपरिटेंडेंट संदीप घोष के खिलाफ वित्तीय धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में ईडी को मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है।

ऐसे ही आदेश अन्य मामलों में दिए जा रहे हैं जिन्हें पूर्व सरकार ने रोक कर रखा था। आप जानते हैं कि संदेशखाली से लेकर आईजी कर और यहां तक कि मुर्शिदाबाद के दंगों में महिलाओं के साथ व्यवहार बंगाल में प्रमुख मुद्दा रहा है। कट मानी और भ्रष्टाचार का अनुभव ऐसा था मानो यह सरकारी प्रक्रिया का ही अंग हो। आप देख लीजिए वही पुलिस प्रशासन और माहौल कितना बदला है। 

 

अवैध कब्जों से मुक्ति बंगाल की ऐसी चुनौती है जिससे निपटना यानी इतिहास की धारा बदल देना होगा। एक पार्टी के लोगों का ही पूरे प्रदेश में कब्जा है। तृणमूल ने सत्ता में आते ही कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के दफ्तरों व अन्य स्थान कब्जाये, इसके साथ नेताओं ने प्रशासन की मिली भगत से सरकारी व निजी जमीन, मकान सब पर भयानक रूप से कब्जे किए।

माफिया तंत्र भूमि का उत्पन्न हुआ जिसने न जाने कितने लोगों को स्थान छोड़ने को विवश कर दिया। इसी तरह धर्म स्थलों पर कब्जे हुए या उन्हें जबरन बंद रखने को भी विवश किया गया।  लगातार उन अवैध कब्जों के विरुद्ध कार्रवाई हो रही है। कांग्रेस और वामपंथी दलों तक के दफ्तर मुक्त कर भाजपा के लोगों ने कई जगह सौंप दिया। कुछ डर से ही छोड़ कर भाग गए। कई धर्मस्थल तो जनता ने हीं मुक्त करा लिए।

 

वास्तव में शुभेंदु सरकार ने भाजपा की विचारधारा को सत्ता नीति में अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है। सड़कों पर नमाज पढ़ने का अंत करने के लिए लगातार कार्रवाई हो रही है। वंदे मातरम गायन अनिवार्य कर दिया गया। राज्य के इमामों, मुअज्जिनों और पुजारियों को दिया जाने वाला सरकारी भत्ता (मानदेय) 1 जून से समाप्त करने का आदेश जारी किया गया है। 

 

सरकार का एक बड़ा‌ फैसला अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण को 17% से घटाकर 7% करना तथा इसे केवल 66 हिंदू जातियों तक ही सीमित रखना है। पिछड़ी जाति की सूची में से मुसलमान की जातियों को पूरी तरह हटा दिया। ममता बनर्जी ने 2024 में 71 जातियों को पिछड़ी जाति में शामिल किया था जिनमें 65 मुस्लिम समुदाय के थे। ममता बनर्जी ने मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा पिछड़ी जाति का आरक्षण देने के लिए ही श्रेणी ए बनाकर 10% आरक्षण घोषित किया था। इसके पहले  पिछड़े वर्ग के लिए 7% आरक्षण था। 

 

साफ था कि केवल वोट बैंक की दृष्टि से मुसलमानों को पिछड़ी जाति में शामिल कर अतिरिक्त आरक्षण का अनुपात लाया गया। इस तरह शुभेंदु सरकार ने कम समय में ही त्वरित गति से अपने कदमों द्वारा यह स्थापित कर दिया कि राज्य किसी मजहब या पंथ विशेष या पार्टी नेताओं या समर्थकों लिए नहीं बल्कि सबके हित में काम करेगा। 

खजाने का धन किसी पंथ के तुष्टिकरण के लिए नहीं बल्कि उपयुक्त पात्रों के कल्याण पर खर्च होगा, शासन कानून और विधान के अनुसार चलेगा,  प्राथमिकता आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा तथा विकास होगा एवं पहले जो निहित स्वार्थी तत्व इसके रास्ते में आए, सत्ता का दुरुपयोग किया उन सबके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होगी।


(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

घर संभालने वाली महिलाओं को 30 हजार; पर ‘हाउस हसबैंड्स’ का क्या?

Homemakers

11 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन दुर्घटना दावा मामलों में एक क्रांतिकारी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने गृहिणियों (Homemakers) को “नेशन बिल्डर्स” (राष्ट्र निर्माता) का दर्जा देते हुए उनके घरेलू योगदान (Loss of Domestic Care) के लिए न्यूनतम 30,000 मासिक की नोशनल इनकम (Notional Income) तय कर दी है। यह सिर्फ एक मुआवजा नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक बदलाव है:
 
10% की बढ़ोतरी: यह तय राशि हर तीन साल में 10% बढ़ेगी।

अतिरिक्त लाभ: अगर कोई महिला कामकाजी (Working Woman) भी है, तो यह राशि उसकी सैलरी के अतिरिक्त जोड़ी जाएगी।

फैसले की इनसाइड स्टोरी: क्यों बदलना पड़ा पुराना नियम?
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने 2001 के एक पुराने मामले पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक सिद्धांत स्थापित किया।

कोर्ट की तीखी टिप्पणी: “यह बेहद विडंबनापूर्ण है कि गृहिणी को कमाने वाले सदस्यों पर निर्भर माना जाता है, जबकि हकीकत यह है कि पूरा घर उन्हीं के दम पर चलता है। सच तो यह है कि बाहर कमाने वाले सदस्य खुद गृहिणी पर निर्भर होते हैं।”

पहले अदालतों में गृहिणियों के काम को 'अकुशल श्रम' (Unskilled Labour) मानकर महज 3,000 जैसी मामूली रकम पर मुआवजा आंका जाता था। कोर्ट ने साफ किया कि महिलाएं देश की GDP में 15-17% का अनपेड योगदान देती हैं और पुरुषों से कहीं ज्यादा वक्त घर के कामों में बिताती हैं।

क्या है 'Loss of Domestic Care' का नया फॉर्मूला?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह 30,000 एक 'बेसिक मिनिमम' (Stand-in) है। अब मुआवजे की गणना में 'घरेलू देखभाल का नुकसान' एक अलग हेड होगा, जिसके तहत निम्नलिखित को शामिल किया जाएगा:

घर का सुचारू संचालन और प्रबंधन।
बच्चों की मातृत्व देखभाल (Maternal Care)।
जीवनसाथी (Spouse) को मानसिक और व्यावहारिक समर्थन।

सकारात्मक पहलू: यह फैसला सदियों से अदृश्य रहे महिलाओं के घरेलू श्रम को आर्थिक मूल्य और सम्मान देता है। ग्रामीण और मध्यम वर्ग के परिवारों को दुर्घटना के वक्त इससे बहुत बड़ी आर्थिक सुरक्षा मिलेगी।

ओपिनियन: 'माई लॉर्ड'… पुरुष गृहस्थों (House Husbands) का ख्याल कौन रखेगा?

फैसले की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि कोर्ट ने माना कि 'Homemaker' शब्द सुनते ही अक्सर महिला की छवि दिमाग में आती है, लेकिन पुरुष भी इस भूमिका में हो सकते हैं—चाहे मर्जी से या मजबूरी से। कोर्ट ने पुरुष होममेकर्स के प्रयासों की सराहना तो की, लेकिन पूरा फैसला पारंपरिक ढांचे (यानी महिला होममेकर) पर ही केंद्रित रहा। 

यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है: क्या कानून और मुआवजे का यह सिद्धांत 'जेंडर-न्यूट्रल' नहीं होना चाहिए?

बदलते भारत की हकीकत: आधुनिक भारत में 'रोल रिवर्सल' तेजी से बढ़ रहा है। आज कई पुरुष अपनी पत्नी के करियर को उड़ान देने के लिए खुद पूर्णकालिक (Full-time) घर संभालते हैं—बच्चों की परवरिश, खाना बनाना, सफाई और बजट संभालना। हालांकि सोशल मीडिया पर इस फैसले के बाद सवाल उठाए जा रहे हैं कि शीर्ष अदालत का यह फैसला उन पुरुषों पर भी लागू होना चाहिए, जो होममेकर की भूमिका में कामकाजी पत्नी की अनुपस्थिति में पूरा घर संभालते हैं।  

भेदभाव क्यों?: अगर एक पुरुष गृहस्थ की दुर्घटना में मौत होती है, तो उसे सिर्फ 'आश्रित' (Dependent) मानकर कम मुआवजा देना न्यायसंगत नहीं है। जो योगदान एक महिला का है, वही योगदान उस पुरुष का भी है।

रूढ़िवादिता तोड़ना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट ने 2021 और 2024 के फैसलों में भी पत्नी के घरेलू काम को पति के ऑफिस वर्क के बराबर माना था। अब समय आ गया है कि इस समानता को दोनों दिशाओं (महिला और पुरुष) में समान रूप से लागू किया जाए।

चुनौतियां और आगे की राह
चुनौती: इस फैसले को जमीनी स्तर पर लागू करने में एकरूपता (Consistency) लाना सबसे बड़ा काम होगा। इसके लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल्स (MACT) को विशेष ट्रेनिंग और गाइडलाइंस देनी होंगी।

सुझाव: भविष्य में अदालतों को 'हाउस हसबैंड्स' के अधिकारों को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित करना होगा। इसके अलावा, होममेकर्स (चाहे महिला हो या पुरुष) के लिए सिर्फ मौत के बाद मुआवजे तक बात सीमित न रहे, बल्कि उनके लिए सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसी योजनाएं भी सोची जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बेहद प्रगतिशील और सराहनीय है। यह राष्ट्र निर्माण में घरेलू श्रम की गरिमा को पहचान देता है। लेकिन सच्ची समानता तभी आएगी, जब 'घर संभालने वाले' के जेंडर को दरकिनार कर, उसके काम को समान आर्थिक और सामाजिक मूल्य दिया जाएगा। उम्मीद है कि 'माई लॉर्ड' अगली बार हाउस हसबैंड्स की इस अदृश्य मेहनत पर भी न्याय की मुहर लगाएंगे। कानून का यह सफर तभी पूर्ण होगा! 

नॉर्वे का राजपरिवार चिंताग्रस्त क्यों है?

norway royal family

Norway Royal Family: यूरोप का सबसे उत्तरी देश नॉर्वे एक राजशाही लोकतंत्र है। पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के बहुत निकट होने के कारण वहाँ सर्दियों का मौसम बहुत लंबा और बहुत ही बर्फीला होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  यूरोप की अपनी पिछली विदेश यात्रा के समय 18-19 मई को जब नॉर्वे में थे, तब वहां की राजधानी ओस्लो का तापमान दिन में 13 से 18 डिग्री सेंटिग्रेड और रात में 3 से 8 डिग्री सेंटिग्रेड था।

 

प्रधानमंत्री मोदी इस यात्रा के समय ओस्लो में नॉर्वे के राजा हाराल्ड और रानी सोन्या तथा युवराज हाक्कोन और उनकी पत्नी युवराज्ञी मेत्ते मारित से भी मिले थे। मेत्ते मारित की तबीयत उस समय भी ठीक नहीं थी और उसके बाद में तो और भी चिंताजनक बन गई।

युवराज्ञी मेत्ते मारित की बीमारी

नॉर्वे के राजमहल ने इस बीच शुक्रवार, 5 जून को आधिकारिक तौर पर बताया कि युवराज्ञी मेत्ते मारित को उनके फेफड़े के प्रतिरोपण (lung transplant) के लिए एक प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) में रखा गया है। इसका कारण “युवराज्ञी के फेफड़ों की बीमारी का चिंताजनक रूप से बढ़ जाना है।” ठीक एक दिन पहले उनका ओस्लो के रिक्सहोस्पिटालेट (Rikshospitalet) अस्पताल में कई घंटों तक इलाज हुआ था।

 

मेत्ते मारित को फेफड़ों की “पल्मोनरी फाइब्रोसिस” (pulmonary fibrosis) नाम की बीमारी होने की बात 2018 से ही ज्ञात है। दिसंबर 2025 में, राजमहल ने घोषणा की थी कि उनके फेफड़ो के लिए संभावित प्रतिरोपण की तैयारियां शुरू हो गई हैं। तब से, 52 वर्षीय मेत्ते मारित सार्वजनिक कार्यक्रमों में आदि में अक्सर ऑक्सीजन-प्रदायी उपकरण के साथ दिखाई देती रही हैं। “पल्मोनरी फाइब्रोसिस” फेफड़ों की एक जानलेवा गंभीर बीमारी है, जिसमें फेफड़ों के ऊतकों (tissue) को नुकसान पहुंचता है और उनमें कठोर निशान (scar tissue) बन जाते हैं। इससे फेफड़ों का लचीलापन खत्म हो जाता है और शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती।

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“यह ख़तरनाक बीमारी है”

जिस दिन राजमहल ने अपना बयान जारी किया, उसी दिन मेत्ते मारित के डॉक्टरों ने प्रेस से बात की। ओस्लो के रिक्सहोस्पिटालेट अस्पताल के मुख्य फिजिशियन और “पल्मोनोलॉजिस्ट” तथा प्रतिरोपण (ट्रांसप्लांट) विभाग के प्रमुख “कार्डियोथोरेसिक” सर्जन ने मेत्ते मारित की बीमारी की वर्तमान स्थिति और उनके उपचार के लिए आवश्यक आगे के कदमों के बारे में जानकारी दी।

 

इन डॉक्टरों ने बताया कि पिछले छह महीनों में मेत्ते मारित के फेपड़ों की हालत काफी ख़राब हो गई है। पिछले एक साल में उनके फेफड़ों में बहुत ज़्यादा “स्कार टिश्यू” (कठोर निशान वाले ऊतक) बन गए हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि “फेफड़ों की कार्यक्षमता की जांच से पता चला है कि केवल पिछले तीन महीनों में उनकी कार्यक्षमता काफी घट गई हुई है–“यह खतरनाक है।” फेफड़ों के विशेषज्ञ ने बताया कि प्रतिरोपण सूची में किसी का नाम शामिल करने के लिए स्पष्ट चिकित्सा निर्देशों का पालन किया जाता है–“मरीज़ के फेफड़ों की बीमारी इतनी गंभीर होनी चाहिए कि हमें यह मानना पड़े कि उसके पास जीने के लिए अब केवल एक साल बचा है।” साथ ही, बीमार व्यक्ति की स्थिति इतनी स्थिर भी होनी चाहिए कि वह उपचार प्रक्रिया और उसके बाद की ठीक होने की अवधि को भी झेल सके।

मेत्ते मारित के लिए जटिल प्रक्रिया

फाइब्रोसिस का सही इलाज सिर्फ़ फेफड़ों का प्रतिरोण (ट्रांसप्लांट) ही है। दवाएं बीमारी के बढ़ने की गति को धीमा तो कर सकती हैं, लेकिन इस प्रक्रिया को पलट नहीं सकतीं। यह प्रक्रिया अपने आप में बहुत मुश्किल और चुनौतीपूर्ण हती है। डॉक्टरों ने इस प्रक्रिया के बारे में बताया कि रोगी को सामान्य निश्चेतक (एनेस्थीसिया) के द्वारा बेहोश करने के बाद छाती की हड्डी (ब्रेस्टबोन) को खोला जाता है, दिल को हार्ट-लंग मशीन से जोड़ा जाता है और बीमार फेफड़े को काट कर निकाल दिया जाता है— जो “पूरी प्रक्रिया का सबसे मुश्किल हिस्सा” है। इस ऑपरेशन में तीन से पांच घंटे तक का समय लगता है।

 

डॉक्टरों ने बताया कि इस तरह की प्रक्रिया के बाद आगे जो कुछ होगा, उसमें जोखिम भी शामिल है—”यदि हम मान लें कि इन मरीज़ों को प्रतीक्षा सूची में रखा गया है और बारी आने पर उनका सफल प्रतिरोपण ऑपरेशन होता है, तब भी आठ में से एक मरीज़ पहला साल बीतने तक जीवित नहीं रह पाता।” एक दशक बाद, प्रतिरोपण ऑपरेशन करवाने वाले लगभग आधे मरीज़ ही जीवित रहते हैं। इसके अलावा, मरीज़ों को जीवन भर “प्रतिरक्षादमनकारी” (इम्यूनोसप्रेसिव) दवाएं लेनी पड़ती हैं, जो ऑपरेशन के बाद शरीर की अत्यधिक सक्रिय हो गई प्रतिरक्षा-प्रणाली को शांत करती हैं। जो लोग इस सब से उबर पाते हैं, उनमें से कई अच्छी ज़िंदगी भी जी पाते हैं।

उपयुक्त फेफड़े के दानी की तलाश

रिक्सहोस्पिटालेट (Rikshospitalet) के डॉक्टरों ने भरोसा जताया कि प्रतिरोपण के लिए जल्द ही उपयुक्त फेफड़ा मिल जाएगा। पिछले छह महीनों में प्रतीक्षा सूची “बहुत छोटी” रही है। नॉर्वे में हर साल लगभग 100 से 120 मृत अंग दाता (deceased organ donors) हुआ करते हैं, किंतु उनके फेफड़ों में से केवल एक-चौथाई ही प्रतिरोपण के लिए उपयुक्त होते हैं।

 

डॉक्टरों ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि प्रतिरोपण के लिए दानी से मिले फेफड़े का आकार, मरीज़ के फेफड़े के आकार से मेल खाना चाहिए। इसी प्रकार, दानी के रक्त का ग्रुप मरीज़ के रक्त-ग्रुप से मेल बैठना चाहिए, और उसके ऊतक-प्रकार (टिश्यू टाइप) के खिलाफ कोई एंटीबॉडी नहीं होनी चाहिए। डॉक्टरों ने कहा कि मेत्ते मारित देश के युवराज (यानी भावी राजा) की पत्नी अवश्य हैं, पर तब भी उन्हें कोई विशेष प्राथमिकता नहीं दी जाएगी— “हम हमेशा उस व्यक्ति को प्राथमिकता देते हैं जो सबसे अधिक गंभीर रूप से बीमार है, जिसके पास इंतज़ार करने का समय नहीं है।”

युवराज और परिवार पर असर

युवराज्ञी मेत्ते मारित के फेफड़ों के लिए होने वाले प्रतिरोपण की तैयारी का असर नॉर्वे के पूरे शाही परिवार पर दिखने लगा है। राजमहल ने घोषणा की है कि मेत्ते मारित अब आधिकारिक कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाएंगी। युवराज हाक्कोन और मेत्ते मारित के विवाह की 25वीं वर्षगांठ (रजत जयंती) का जश्न— जो इसी वर्ष, यानी अगस्त 2026 में होना था — टाल दिया गया है। साथ ही, मेत्ते मारित सितंबर में होने वाली शाही यात्रा में भी शामिल नहीं होंगी। इसी प्रकार, युवराज हाक्कोन भी अपनी पत्नी के साथ अधिक समय बिताने के लिए अपने कार्यक्रमों को बदलने वाले हैं। शाही परिवार के दोनों बच्चे भी अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी को नए सिरे से व्यवस्थित कर रहे हैं।

 

राजमहल ने घोषणा की है कि राजकुमारी इन्ग्रिद अलेक्सांद्रा 2026 के ऑटम (शरत्कालीन) शिक्षा सेमेस्टर में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में अपनी पढ़ाई नहीं करेंगी; इसके बदले नॉर्वे के ओस्लो विश्वविद्यालय में ही अपनी पढ़ाई जारी रखेंगी। राजकुमार स्वेरे माग्नुस अपनी योजना के अनुसार, यूरोप में ही अपनी आगे की पढ़ाई शुरू करेंगे और ज़रूरत पड़ने पर नॉर्वे लौट आएंगे। नॉर्वे का रजघराना, इन सारी जानकारियों को छिपाने के बदले सार्वजनिक करने के द्वारा, 56 लाख की जनसंख्या वाली अपनी जनता को यही जताना चाहता है कि हम भी आदमी ही हैं, देवता नहीं। आम जनता के समान ही हमें भी सुख-दुख और बीमारियों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

भरपूर लाभ के लिए रोज करें मंडूकासन; जानिए इसे करने का सही तरीका

Mandukasana Method

'मंडूक' का सीधा सा मतलब है मेंढक। जब आप इस योग की अंतिम मुद्रा में होते हैं, तो आपके शरीर का आकार एक बैठे हुए मेंढक जैसा दिखाई देता है, बस इसीलिए इसे मंडूकासन (Frog Pose) कहा जाता है। वैसे तो इसे करने के कई तरीके हैं, लेकिन सबसे पॉपुलर और असरदार तरीका नीचे दिया गया है।

 

स्टेप-बाय-स्टेप गाइड (The Right Method)

स्टार्टिंग पोजीशन: सबसे पहले दंडासन (पैरों को सीधा फैलाकर) में बैठें और फिर घुटनों को मोड़कर वज्रासन की मुद्रा में आ जाएं।

मुद्रा बनाएं: अब अपने दोनों हाथों की मुट्ठियां बंद करें। ध्यान रहे, मुट्ठी बंद करते समय अंगूठा उंगलियों के अंदर दबा होना चाहिए।

पोजीशन लॉक करें: इन बंद मुट्ठियों को अपनी नाभि (Navel) के दोनों तरफ सेट करें।

फाइनल मूव: एक गहरी सांस छोड़ते हुए (Exhale) धीरे-धीरे आगे की ओर झुकें और अपनी ठोड़ी (Chin) को जमीन से टिकाने की कोशिश करें। कुछ सेकंड इसी पोजीशन में होल्ड करें, फिर सांस लेते हुए वापस नॉर्मल वज्रासन में आ जाएं।

 

काउंटर पोज (विपरीत आसन) क्यों है जरूरी?

योग का नियम कहता है कि आगे झुकने वाले आसन के बाद पीछे झुकने वाला आसन जरूर करना चाहिए ताकि बॉडी का बैलेंस बना रहे। मंडूकासन के बाद आप अपने योग एक्सपर्ट की सलाह से ऊष्ट्रासन (Camel Pose) या विपरीत नौकासन कर सकते हैं।

 

कितनी बार करें? (Frequency)

आम लोगों के लिए: इस आसन को रोजाना 2 बार दोहराना काफी है।

डायबिटीज मरीजों के लिए: शुगर कंट्रोल करने के लिए इसका अभ्यास 3 से 4 बार तक किया जा सकता है।

 

अलर्ट: कब और किसे बचना है? (Precautions)

नो-गो जोन: अगर पेट का कोई सीरियस ऑपरेशन या गंभीर बीमारी हो, तो इसे बिल्कुल न करें।

विशेष सलाह: स्लिप डिस्क, ऑस्टियोपॉरोसिस या भयंकर कमर दर्द के मरीज इसे बिना योग थेरेपिस्ट की देखरेख के ट्राई न करें।

प्रो-टिप: झुकते समय ध्यान रखें कि आपकी मुट्ठियां नाभि के आस-पास एकदम सही जगह पर फिक्स हों।

 

अल्टीमेट बेनिफिट्स (यह शरीर पर कैसे काम करता है?)

डायबिटीज में रामबाण: यह आसन आपके पैनक्रियाज (अग्न्याशय) को एक्टिव कर देता है, जिससे इंसुलिन का बैलेंस सुधरता है। शुगर के मरीजों के लिए यह बेहद फायदेमंद है।

डाइजेशन का पावरहाउस: पेट की आम समस्याएं जैसे गैस, कब्ज, एसिडिटी, अपच और भूख न लगने की शिकायत को यह चुटकियों में दूर करता है।

इंटरनल ऑर्गन्स का डीटॉक्स: इस आसन के दबाव से आमाशय, लिवर, किडनी, छोटी-बड़ी आंत, गॉलब्लैडर और रीप्रोडक्टिव ऑर्गन्स की डीप मसाज हो जाती है, जिससे उनकी वर्किंग कैपेसिटी बढ़ जाती है।

हार्ट और बेली फैट: यह आपके दिल (Heart) की सेहत को दुरुस्त रखता है और पेट की चर्बी को टोन करने में भी मदद करता है।

 

हिंदी साहित्य में पहेली के रूप में लिखी जाने वाली एक लयात्मक कविता: कह मुकरियां

Illustration based on Hindi poetry

 

मुझको देता शीतल छाया।

देख उसे मन बहुत लुभाया।

वर्षा देने में वह दक्ष।

क्या सखि साजन? ना सखि ‘वृक्ष’।।

 

उसकी छटा श्याम सुखकारी।

सावन में उसकी बलिहारी।

धरा को जो कर देता मादल।

क्या सखि साजन? ना सखि बादल।।

 

मुझको हरदम राह दिखाता।

तम के भीतर दीप जलाता।

वह मेरे जीवन का रक्षक।

क्या सखि साजन? ना सखि शिक्षक।।

 

उसकी सूरत अति मनभावन।

वह लगता तुलसी सा पावन।

वह मेरी गोदी में लेटा।

क्या सखि साजन? ना सखि बेटा।।

 

मंद-मंद मुस्काता रहता।

शीतल रश्मि बहाता रहता।

उसके आगे फीके इंद्र।

क्या सखि साजन? ना सखि चन्द्र।

 

वह मेरा साथी है सच्चा।

मन उसका जैसे हो बच्चा।

भोली सूरत उच्च चरित्र 

क्या सखि साजन? ना सखि मित्र।

 

उसकी महिमा बड़ी निराली।

भर दे जीवन में हरियाली।

महक उठे जिससे मेरा तन।

क्या सखि साजन? ना सखि उपवन।।

 

मेरे मन का वही सहारा।

दुख में बन जाता रखवारा।

दुखों को करता है वह राई 

क्या सखि साजन? ना सखि भाई।।

 

उसकी धुन में सपने बुनती।

मन की गोपी उसको सुनती

तान सुने कान्हा का अंशी।

क्या सखि साजन? ना सखि वंशी।।

 

मुझको सबसे अधिक दुलारा।

उसने जीवन खूब सँवारा।

रोम-रोम उपजे उत्कर्ष

क्या सखि साजन? ना सखि ‘हर्ष’।।

 

बाल एकांकी: काला सोना

A scene from a childrens play featuring a character dressed as crude oil, in a short drama centered on petrol, diesel, gas, and kerosene

पात्र –
1- एक बालक आयु लगभग 15 वर्ष- काले लबादे में {क्रूड ऑयल के वेश में}

2- एक बालक रूद्र आयु लगभग 12 वर्ष
3- एक बालिका आद्या आयु लगभग 10 वर्ष
4- चार अन्य बच्चे आयु 10 से 12 वर्ष के बीच

 

मंच का परदा खुलता है और उस पर एक आकृति काला लबादा ओढ़े दिखाई देती है। वह आकृति नाचते हुए गा रही है।

 

      काला सोना काला सोना,

 

      नाम हमारा काला सोना।

 

      हमसे ही संचालित होता,

 

      है धरती का कोना-कोना।

 

      काला सोना काला सोना…….का….ला …

 

{तभी मंच के एक तरफ से आद्या का प्रवेश}

 

आद्या –ये भाई …. क्यों शोर मचा रहे हो, कौन हो तुम और ये काला सोना काला सोना, क्या है सब ये……..।

 

काली आकृति –लो जी लो, अब सुन लो इनकी बात, ये काला सोना भी नहीं जानते। सारी दुनिया में हल्ला है और ये मेम साब पूछती हैं काला सोना क्या है।

 

{तभी दूसरी तरफ से रूद्र का प्रवेश}

 

रूद्र–अरे भाई शांत ..शांत रहो भाई काले आदमी। एक तो यहां हल्ला मचा रहे हो और ठीक से अपना परिचय भी नहीं दे रहे हो।

 

काली आकृति–

 

     पेट्रोल हैं,  डीज़ल हैं हम, 

 

     हम हैं गैस रसोई वाली।

 

     नींद नहीं आती है घर को,

 

     पडा सिलेंडर हो जब खाली।

 

     बिना हमारे जले न चूल्हा,

 

     गरम न होता हाय भगौना

 

     काला सोना काला सोना …..

 

आद्या –रूद्र {एक साथ}-आंय! पेट्रोल, डीज़ल, गैस …..अरे तो क्या आप क्रूड ऑयल हैं -क्रूड ऑयल, काले-काले अंकल। आप यहां क्या कर रहे हैं? {दोनों चहकते हैं}

 

काली आकृति –क्या कर रहे हैं! आश्चर्य मेरे कारण दुनिया में इतनी मारा-मारी मची है और तुम लोग पूछ रहे हो कि यहां क्या कर रहे हो।

 

आद्या –अरे अंकल, अब ठीक से बताओ भी, इतने काले और अकड़ …काले को तो काला ही कहेंगे ना। अच्छा अपने बारे में ठीक से बताओ। यह तो मैंने भी पढ़ा कि पेट्रोल, डीज़ल, गैस इत्यादि क्रूड ऑयल से ही बनता है। लेकिन कैसे, कहां? ठीक से नहीं मालूम। अब आप बताओ। आपका जन्म स्थान कहां है, कैसे इस धरती पर आते हो और कैसे डीज़ल, पेट्रोल, गैस बन जाते हो? ज़रा ठीक से बताओ।

 

काली आकृति –ये बड़ी लम्बी दास्तान है बच्चों। कितनी पीड़ा होती है हमें है, धरती के भीतर, बाहर आने में और फिर बाहर आकर भी।

 

रूद्र –अंकल पूरी कथा सुनाओ प्लीज, बिना रुके, बिना कुछ छुपाए चटपट और झटपट।

 

काली आकृति–बताता हूं, बताता हूं, ध्यान से सुनो-बात करोड़ों साल पुरानी है।समुद्र के नीचे करोड़ों करोड़ सूक्ष्म जीव और वनस्पतियों का जमावड़ा था, जमावड़ा होता रहता था। समय के साथ ये जीव और वनस्पतियां नष्ट होती जाती थीं और समुद्र की तह में जमा होती जाती थीं। धीरे-धीरे उनके ऊपर गाद मिटटी और धूल जमती गई। चट्टानें बनती गईं और ये जीवाश्म तलछट में दबते रहे।

 

आद्या –फिर पेट्रोल कैसे बन गए ?

 

काली आकृति –अरे सुनो भी, कहानी जरा लम्बी है ना ज़रा धैर्य रखो। हां तो जब उन जीवाश्मों पर जब धरती का भारी दबाव पडा और भीतर का तापमान बढ़ा तो ये जीव/पौधे एक चिप चिपे गीले पदार्थ में परिवर्तित हो गए। यह मोम सरीखा पदार्थ केरोसिन कहलाता है और वह क्रिया जिससे यह पदार्थ बनता है, डायजे नेसिस क्रिया कहलाती है।

 

रूद्र –लेकिन ..लेकिन इतना, कितना केरोसिन कहां बनता होगा, ये तो सारी दुनिया में…..कितनी अधिक खपत है पेट्रोल, डीज़ल, गैस की। फिर केरोसिन से पेट्रोल कैसे बना।

 

काली आकृति –फिर जल्द बाजी, बेटे धीरज रखो थोड़ा। असीमित मात्रा में हमारी उपस्थति धरती के भीतर है। लाखों साल पहले जब ये सूक्ष्म पौधे प्रकाश संश्लेषण क्रिया से भोजन बनाते थे ऊर्जा पाते थे और जीवित रहते थे। छोटे छोटे करोड़ों जीव इस वनस्पति को खाकर जीवित रहते थे। इन जीवों का जीवन बहुत छोटा होता था लेकिन ये करोड़ों अरबों की मात्रा में पैदा होते मरते रहते थे। और सागर की तलहटी में डूब जाते थे। भारी दबाव और तापमान से बने केरोसिन भी केटाजेनिस क्रिया से तरल रूप में बदल जाते थे और यही तरल पदार्थ ही कच्चा तेल या क्रूड ऑयल कहलाया, मतलब हम कहलाए।

 

आद्या–लेकिन ..लेकिन यह क्रूड ऑयल, मतलब अंकल आप केरोसिन के वंशज हो, ऊपर धरती पर कैसे आते हो?

 

काली आकृति -गुरुत्वाकर्षण के कारण, धरती का दबाव नीचे की तरफ होने से, हम तरल कम दबाव की तरफ मतलब ऊपर की तरफ आना चाहते हैं लेकिन भारी चट्टानें हमें रोक लेती हैं और, और हम क्रूड ऑयल तरल के रूप में चट्टानों के बीच खाली जगह में एकत्रित होते रहते हैं। और अभी भी करोड़ों लीटर कच्चे तेल के रूप में हमारे भाई वंशज जमीन में चट्टानों के नीचे दबे पड़े हैं। कहीं-कहीं जहां चट्टानें हमारी बाधा नहीं बनतीं,  मिट्‍टी को भेदता हुआ ये तरल मतलब क्रूड ऑयल मतलब हम धरती के ऊपर बिना रोक टोक के आ जाते हैं। यथार्थ में तकनीकी भाषा में हमारे इस क्रूड ऑयल रूप को हाइड्रो कार्बन कहते हैं।

 

रूद्र-तभी तो मजा है ना,  हम लोग खूब सारा पेट्रोल भरवाकर कारों में यहां वहां घूमते हैं। जितना चाहे क्रूड ऑयल धरती से निकालो। आप तो सब जगह हैं न धरती पर-धरती के नीचे अंकल?

 

काली आकृति –अरे ना- ना- ना बच्चों। बहुत कम स्थानों पर निकलते हैं हम। वे क्षेत्र भाग्यवान हैं जहां की धरती में हमारी मौजूदगी रहती है।

 

       जिस धरती के नीचे हैं हम,

 

       लोग वहां के हैं आभारी।

 

       और हमारे कारण ही तो,

 

       लोग वहां के सब पर भारी।

 

       लोग सहेजे रखते हमको, 

 

       जैसे हम हैं मृग का छौना|

 

       काला सोना ….

 

आद्या –अरे यार अंकल आप तो फिर गाने लगे। आपने क्रूड ऑयल की बात तो बताई लेकिन ये क्रूड ऑयल पेट्रोल, डीज़ल, गैस में कैसे बदलता है ये तो बताया ही नहीं। हां अंकल एक बात और आपके वंशज आजकल सबसे ज्यादा किस क्षेत्र में उपलब्ध हैं ?

 

काली आकृति — हम तो बेताज बादशाह हैं बच्चों। जिस क्षेत्र में हम हैं तो हम ही हम हैं। वहां के लोगों की बल्ले-बल्ले है। जिस-जिस की धरती से हम निकले वह देश देखते ही देखते धनवान हो गए। अमेरिका-रूस बहुत से अरब देश, जहां-जहां हम प्रकट हुए वहां धन की कोई कमी नहीं है।

 

मेरे कारण ही दुनिया में,

 

मची हुई है बहुत लड़ाई।

 

बड़े देश छोटे देशों पर,

 

करते बम से हाथापाई।

 

मैं हूं सच में बड़ा कीमती,

 

मैं हूं अब लड्डू का दौना।

 

काला सोना………….

 

रूद्र –और हमारे अपने देश भारत में आप धरती से क्यों नहीं बाहर आते?

 

काली आकृति –बड़े नादान हो बालक, हम जब यहां धरती के नीचे होंगे तब ही तो बाहर आएंगे। लेकिन फिर भी असम, राजस्थान, गुजरात और मुंबई के पास समुद्र के नीचे से हम क्रूड ऑयल बनकर निकल रहे हैं। हमारी तेजी से खोजबीन भी हो रही है, शायद और कई स्थानों पर हम धरती में छुपे मिल जाएं। लेकिन इस देश की मांग दिन पर दिन बढ़ रही है और इतनी कम मात्रा का उत्पादन देश की आपूर्ति नहीं कर सकता आपको बाहरी देशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

 

आद्या –ठीक है, ठीक है अब बताओ आप काले से गोरे और चमकदार मतलब पेट्रोल कैसे बने और रोज लाखों करोड़ों लीटर की मात्रा में कैसे बन जाते हो? 

 

काली आकृति –ये हुई ना काम की बात। तो सुनो बच्चों- बड़ी-बड़ी मशीनों से धरती को ड्रिल करके कई हज़ार फुट नीचे से कच्चा तेल मतलब हमें बाहर निकाला जाता है। फिर हमें सेपरेशन टेंकों में एकत्रित करते हैं। और बाद में रिफायनरी में भेज दिया जाता है।

 

रूद्र- रिफायनरी मतलब शोधन शाला ना?

 

काली आकृति –हां-हां वही जगह जहां हमारे शरीर से काम के अवयव अलग-अलग कर दिए जाते हैं। शोधन शाला में  बहुत बड़े-बड़े चेंबरनुमा संयंत्र लगे होते हैं। जिनको डिस्टिलेशन टावर कहते हैं। जिसमें हमें बहुत अधिक तापमान पर, लगभग 400 डिग्री सेल्सियस पर गर्म किया जाता है। और गरमी पाकर हम भाप बनने लगते हैं। हमारे जिस-जिस अवयव का बोइलिंग पॉइंट मतलब क्वथनांक सबसे कम होता है वह जल्दी भाप बनकर चेंबर के सबसे ऊपरी भाग में एकत्रित हो जाता है उससे थोडा अधिक क्वथनांक वाला उसके नीचे और अधिक क्वथनांक वाले अवयव क्रमशःनीचे के खण्डों में एकत्रित होते रहते हैं।

 

आद्या– फिर अंकल, फिर क्या होता है?

 

काली आकृति– फिर क्या, सबसे ऊपरी भाग में हमारा एक विशेष रूप एलपीजी उसके नीचे नेप्था उसके नीचे गेसोलीन मतलब पेट्रोल फिर केरोसिन फिर और नीचे डीज़ल फिर फ्यूल आयल और अंत में सबसे नीचे बिटूमिन मतलब डामर अलग होकर एकत्रित हो जाता है। यह क्रिया चलती रहती है। और पेट्रोलियम मतलब मेरे इन उत्पादों का अलग-अलग भण्डारण कर और शुद्धिकरण एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा बाजारों में विक्रय के लिए भेज दिया जाता है। पेट्रोल, डीजल मोबिल आयल इत्यादि पेट्रोल पम्पों पर और अन्य सामान उचित भंडारण घरों अथवा दुकानों पर भेज दिया जाता है|

 

रूद्र–अंकल हवाई जहाज वाला ईंधन इनमें कौन सा वाला है?

 

काली आकृति–अरे! सॉरी बच्चे, वैरी सॉरी, हम तो भूल ही गए केरोसिन और डीज़ल के बीच का उत्पाद ए.टी. ऍफ़. मतलब एविएशन टरबाइन फ्यूल कहलाता है, काले कलूटे हमारे रूप का नया स्वरूप -जो हवाई जहाज उड़ा देता है।

 

स्वच्छ हमारे रंग रूप से,

 

दुनिया के वाहन चल पाते।

 

हमें पेट में भर लेते जब,

 

वायुयान नभ में उड़ पाते।

 

हम हैं तो ही पहुंच सरल है,

 

लंदन, पेरिस, वार्सीलोना।

 

काला सोना ………

 

आद्या –इन्हीं गानों के चक्कर में आप काम की बात भी भूल जाते हैं। काले अंकल, ये जो डामर है जिसे आप सभ्य भाषा में बिटुमिन कहते हैं मुझे बहुत गन्दा लगता है और प्लास्टिक छी-छी …चिपचिपा सा ….

 

काली आकृति –-

 

सड़कों पर जो चम-चम करता,

 

वह डामर भी हम हैं भाई।

 

और प्लास्टिक- पॉलीथिन भी,

 

तो हमने ही है उपजाई।

 

इनकी बनी थैलियां डिब्बे,

 

बच्चों के हैं बने खिलौना।

 

रूद्र -–अरे यार फिर गाना, क्या आप गवैए हो।

 

काली आकृति –हां हां गवैया हूं गवैया। आजकल सारी दुनिया मुझे ही तो गा रही है। एक तो हमारे बिना काम नहीं चलता, हमारा अंधाधुंध उपयोग होता है और जब प्रदूषण होता है गाली भी सब हमें ही देते हैं।

 

होने लगी रोज ही अब तो,

 

घर-घर बात प्रदूषण वाली।

 

जुम्मेवारी इसकी सिर पर,

 

लोगों ने बस हम पर डाली।

 

उनकी गलती का अपने सिर,

 

दोष पड़ रहा हमको ढोना।

 

काला सोना…………...

 

आद्या –क्या बात है काले अंकल, आप क्रूड ऑयल कम और कवि ज्यादा लग रहे हैं।

 

काली आकृति –क्या कहूं यातनाएं सहते-सहते आलोचनाएं सुनते-सुनते जैसे आदमी कवि बन जाता है तो हम भी बन गए। आप लोग दस कदम पैदल नहीं चल सकते, हाथ में कपडे की या कागज़ की थैली लेकर नहीं चल सकते और प्रदूषण के लिए दोष डीज़ल का, पेट्रोल का, पॉलीथिन का और प्लास्टिक का, वाह क्या गजब की सोच है।

 

क्यों उपयोग बढाए जाते,

 

लोग हमारा हर दिन भाई।

 

पैदल दस गज चलने में ही,

 

उन्हें हो रही क्यों कठिनाई।

 

कपड़े वाली थैली हाथों,

 

में लगती क्यों भारी ढोना।

 

काला सोना …………..

 

रूद्र –क्षमा करें अंकल। हमें नहीं मालूम था कि आपको भी आम आदमियों के सेहत की इतनी चिंता है। गलतियां आदमियों से हो रहीं हैं और दोष हम कारखानों को, पेट्रोल को, डीज़ल को,पॉलीथिन को दे रहे हैं। पेट्रोलियम के लिए युद्ध हो रहे हैं, निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं, करोड़ों की संपत्ति नष्ट हो रही है और देश इसके अधिपत्य के लिए अरबों खरबों रुपयों के हथियार बना रहे हैं, बेच रहे हैं और खरीद रहे हैं।

 

अंधाधुंध दोहन धरती का,

 

धरती होती जाती खाली।

 

हुई मानसिकता लोगों की,

 

ज्यादा धन सुविधाओं वाली।

 

बढ़ते रोग अस्थमा दिल के,

 

फैला करता यहां करोना।

 

काला सोना…..

 

आद्या –रूद्र भैया इन अंकल ने तो हमारी आंखें खोल दीं। मुझे भी माफ़ करना मेरे प्रिय काले अंकल। आप काले हैं तो क्या हुआ। आप सच में काला सोना कहलाने के हकदार हैं। आप सोने के सामान कीमती हैं लेकिन आपका ह्रदय पेट्रोल सरीखा चमकदार और ऊर्जावान है।

 

हमें ही सुधरना होगा। हम बच्चों को सोचना होगा। हम ही तो हैं प्रदूषण के हरकारे।

 

{आद्या और रूद्र गाते हैं}

 

पेट्रोल, डीज़ल, पॉलीथिन,

 

घोर प्रदूषण हैं फैलाते।

 

पता नहीं क्यों नहीं नियंत्रण,

 

थोड़ा भी इन पर कर पाते।

 

आम हमे पाना है तो फिर,

 

बीज बबूलों के क्यों बोना।

 

काला सोना….

 

आद्या –रूद्र भैया क्यों न हम अपने मित्रों को भी बुलाकर काले अंकल की बातों का समर्थन कर उनका अभिनन्दन करें?

 

रूद्र –हां हां बिलकुल बहन आद्या, बिलकुल ठीक कहा तुमने। हम अपने मित्रों को अभी बुलाते हैं।

 

{तभी मंच पर चार बच्चे और आ जाते हैं}

 

फिर काली आकृति सहित सब बच्चे गाते हैं –

 

अब हम सबने सोच लिया है,

 

आसपास पैदल जाएंगे।

 

दूर-दूर जाना होगा तो,

 

ही हम वाहन ले जाएंगे।

 

अब कपडे के थैलों का ही,

 

हम उपयोग करेंगे हरदिन।

 

जीना भी अब शुरू करेंगे,

 

बिना प्लास्टिक, पॉलीथिन बिन,

 

पैदल चलने में अब हमको,

 

नहीं आएगा बिलकुल रोना।

 

काला सोना काला सोना ……..

 

{धीरे- धीरे परदा बंद होता है}

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फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते

A scene in the picture depicting childhood memories

इंसान की ज़िन्दगी का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा बचपन ही होता है, क्योंकि बचपन हर फ़िक्र से आज़ाद और बेगाना होता है। बचपन की यादें हमारे दिलो-दिमाग़ पर ऐसे नक़्श हो जाती हैं कि उन्हें वक़्त की धूल भी मिटा नहीं पाती। और जब बात गर्मियों की छुट्टियों की हो, तो फिर कहना ही क्या। दूसरे बच्चों की तरह हमें भी सालभर गर्मियों की छुट्टी का इंतज़ार रहता था, क्योंकि गर्मियों की छुट्टियों में हमें अपनी नानी जान के घर जाने का मौक़ा मिलता था। हम नानी जान के घर जाते थे। 

 

इससे पहले बहुत-सी तैयारियां की जाती थीं। उस वक़्त बैग्स का चलन ज़्यादा नहीं था। इसलिए सन्दूक़ में कपड़े रखे जाते थे। प्लास्टिक की टोकरी में खाने-पीने का सामान होता था यानी रास्ते के लिए पूड़ी-सब्ज़ी और पानी की बोतलें होती थीं। सामान क़ुली उठाता था। उस वक़्त रेलगाड़ियों में आज जैसी भीड़-भाड़ नहीं होती थी।

रेल में हमें बहुत अच्छा लगता था। खिड़की की सीट हमें ही मिलती थी। खिड़की से भागते हुए दरख़्तों को देखना कितना भला लगता था। ख़ैर, आज भी उतना ही भला लगता है। रस्ते में गंगा आती, तो हम उसमें सिक्के डालते थे। हापुड़ के पापड़ और गजरौले के पेड़े खाते। सफ़र में खाने का भी अपना ही लुत्फ़ है।         

 

हमारे नाना के बाग़ थे, जिनमें आम, अमरूद, जामुन, शहतूत और शरीफ़े के अलावा और भी बहुत से फलों के दरख़्त थे। हम अपने भाइयों और मामाज़ाद बहनों के साथ दरख़्तों पर चढ़कर फल तोड़ते और खाते थे। दरख़्तों पर चढ़कर फल तोड़कर खाने के लुत्फ़ को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज भी फलों के दरख़्तों को देखकर बचपन में उन पर चढ़ना याद आता है।

बाग़ के पास एक बड़ा तालाब भी था। एक बार वहां खेलते हुए तालाब में गिर भी गए थे। अल्लाह का शुक्र है कि हमें पानी में से निकाल लिया गया। वहां का लज़ीज़ खाना, रबड़ी, छोले-समौसे, नारियल के बुरादे की कुल्फ़ी और बरगद के पत्तों पर रखी मलाई बर्फ़ बहुत याद आती है।      

 

जिस साल नानी के घर नहीं जाते, उस साल अपने ही घर में ख़ूब मज़े करते। हमारा घर बहुत बड़ा था। उसका आंगन भी बहुत बड़ा था। घर में बग़ीचा था। बग़ीचे में फलों के बहुत से दरख़्त थे। इनमें आम, अमरूद, जामुन, शहतूत और गूलर के कई दरख़्त थे।

गर्मियों की छुट्टियों में हम ख़ूब मस्ती करते, शरारतें करते, धमा चौकड़ी करते। दरख़्तों पर चढ़ते और फल तोड़ते। दादी जान कहती थीं कि जामुन और गूलर के दरख़्त पर नहीं चढ़ना चाहिए, क्योंकि इसकी लकड़ी कमज़ोर होती है। हमारे घर के पास एक बड़ा मैदान था। उस मैदान में बहुत से दरख़्त थे। वहां पीपल, बरगद, नीम, शीशम, करंद और खजूर आदि के भी बहुत से दरख़्त थे। शीशम की डालों पर झूला डालकर भी खूब झूलते थे।

 

हमारे घर में माशा अल्लाह फुलवारी भी बहुत थी। इनमें बेला, गुलाब, जूही, चम्पा, चमेली, मोगरा जैसे बहुत से फूलों के पौधे व बेलें थीं। हमारा घर ही नहीं, बल्कि आसपास का इलाक़ा भी इन फूलों की ख़ुशबू से महकता रहता था। अम्मी को मोगरा के फूल पहनने का बहुत शौक़ था। वे चांदी के तार की बालियों में बेला के फूलों को पिरोकर कानों में पहना करती थीं और बालों में बेला के गजरे भी लगाती थीं।

हमारी दादी जान भी कानों में फूल पहना करती थीं। वे मेज़ पर रखे पंखों पर फूलों के गजरे डाल देतीं, जिससे सारा घर-आंगन महक उठता था। हमारे घर से बहुत से लोग फूल ले जाते थे और फिर उनके गजरे व हार बनाते थे। घर के पास एक मन्दिर था। बहुत से लोग मन्दिर में देवी-देवताओं को चढ़ाने के लिए फूल लेकर जाते थे।  

 

हमें लू की वजह से गर्मियों की भरी दोपहरी में बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी। इसलिए हम घर के भीतर ही रहते और दोपहर ढलने का इंतज़ार करते थे। कई बार हम घरवालों की नज़र से बचकर बाहर खेलने चले जाते थे। आंगन में तख़्त बिछे होते थे। उन पर सफ़ेद चादरें बिछी होतीं और गाव तकिये क़रीने से लगे हुए होते थे। शाम को घर के सब लोग इन्हीं पर बैठते थे। शाम को दादी तरह-तरह के पकौड़े बनाती थीं। रूह अफ़ज़ा शर्बत भी बनता था। उसमें बहुत-सी बर्फ़ डाली जाती थी।    

 

गर्मियों में हम छत पर सोया करते थे। शाम को छत की साफ़-सफ़ाई की जाती। फिर पानी छिड़का जाता, ताकि छत ठंडी हो जाए। छत पर चटाइयां बिछाई जातीं। फिर उन पर दरियां बिछाई जातीं। दरियों पर रंग-बिरंगी कढ़ाई वाली चादरें बिछाई जातीं और तकिये रखे जाते। क़रीब में ही पानी से भरी मिट्टी की सुराहियां रखी जातीं, गिलास रखे जाते। हम बच्चे अपनी-अपनी छोटी सुराहियां अपने सिरहाने रख लिया करते थे, ताकि रात में प्यास लगे तो अपनी ही सुराही से पानी पी लें। हमें दादी-नानी ने ही नहीं, बल्कि पापा ने भी बचपन में कहानियां सुनाई हैं।   

 

हमारे घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था। ननिहाल और ददिहाल में सब लोग पढ़े-लिखे थे। नाना जान और दादा जान दोनों ही दानिशमंद थे। हमारी अम्मी को भी लिखने और पढ़ने का बहुत शौक़ था। वे शायरा थीं और बहुत शानदार लिखती थीं।

 

हमारे घर किताबों की एक अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी थी। उनमें अरबी, उर्दू, इंग्लिश और हिन्दी की किताबों की भरमार थी। आज भी यही हाल है। बरसों पहले इनमें पंजाबी की किताबें भी शामिल हो गईं। अम्मी की देखा-देखी हमें भी किताबों से मुहब्बत हो गई। बचपन में ही हमने लिखना शुरू कर दिया था। हमें डायरी लिखने का भी शौक़ था, जो आज भी है। डायरी में हम अपनी बातों के अलावा अपने पसंदीदा शायरों की ग़ज़लें, गीत और नज़्में लिखा करते थे। आज भी लिखते हैं।

हमारी डायरी में शायरा इशरत आफ़रीन की एक ग़ज़ल दर्ज है-

 

यूं ही किसी के ध्यान में अपने आप में गाती दोपहरें

 

नर्म गुलाबी जाड़ों वाली बाल सुखाती दोपहरें

 

सारे घर में शाम ढले तक खेल वो धूप और छांव का

 

लिपे पुते कच्चे आंगन में लोट लगाती दोपहरें

       

जीवन-डोर के पीछे हैरां भागती टोली बच्चों की

 

गलियों-गलियों नंगे पांव धूल उड़ाती दोपहरें

 

सरगोशी करते पर्दे कुंडी खटकाता नटखट दिन

 

दबे-दबे क़दमों से तपती छत पर जाती दोपहरें

 

कमरे में हैरान खड़े आईना जैसे हंसते दिन

 

ख़ुद से लड़कर गौरैया-सी शोर मचाती दोपहरें

 

वही मुज़ाफ़ातों के भेद भरे सन्नाटों वाले घर

 

गुड़ियों के लब सी कर उनका ब्याह रचाती दोपहरें

 

खिड़की के टूटे शीशों पर एक कहानी लिखती हैं

 

मंढे हुए पीले काग़ज़ से छनकर आती दोपहरें

 

नीम तले वो कच्चे धागे रंगती हुई पुरानी याद

 

घेरा डाले छोटी-छोटी हाथ बटाती दोपहरें

 

फटी-पुरानी कथरी ओढ़े धूप सेंकते बूढ़े दिन

 

पेशानी तक पल्लू खींचे चिलम बनाती दोपहरें

 

पानी की तक़सीम के पीछे जलते खेत सुलगते घर

 

और खेतों की ज़र्द मुंडेरों पर कुम्हलाती दोपहरें

 

पुरवाई से लड़ते कितने वर्क़ पुरानी यादों के

 

सौग़ातों के संदूक़ों को धूप दिखाती दोपहरें

 

दुखती आंखें ज़ख़्मी पोरें उलझे धागों जैसे दिन

 

बादल जैसी ओढ़नियों पर फूल खिलाती दोपहरें

 

ओढ़नियों के उड़ते बादल रंगों के बाज़ारों में

 

चूड़ी की दुकानों से वो हमें बुलाती दोपहरें

 

सुनते हैं अब उन गलियों में फूल शरारे खिलते हैं

 

ख़ून की होली खेल रही हैं रंग नहाती दोपहरें

 

ये तो मेरे ख़्वाब नहीं हैं ये तो मेरा शहर नहीं

 

किस जानिब से आ निकली हैं ये गहनाती दोपहरें         

 

वाक़ई, बचपन से वाबस्ता यादें बहुत दिलकश होती हैं। 

 

बशीर बद्र साहब ने क्या ख़ूब कहा है-

 

उड़ने दो परिन्दों को अभी शोख़ हवा में

फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते… 

 

(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है…)

विकास और विरासत: मोदी युग में नए भारत का नव-उदय

PM Narendra Modi

PM Narendra Modi

भारतीय राजनीति में 10 जून 2026 का दिन एक ऐतिहासिक तिथि के रूप में दर्ज होगा। लगातार तीसरे कार्यकाल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पंडित जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी करते हुए देश में सबसे लंबे समय तक चुने जाने वाले राष्ट्रप्रमुख बन जाएंगे। पीएम मोदी का यह कार्यकाल केवल एक संख्यात्मक उपलब्धि नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के उस अटूट विश्वास का प्रमाण है, जिसने भारत को प्रगति और वैश्विक नेतृत्व के शिखर पर पहुंचाया है। इस शासन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि नरेंद्र मोदी ने स्वयं को हमेशा 'प्रधान सेवक' के रूप में प्रस्तुत किया और स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, नारी शक्ति वंदन अधिनियम (33% महिला आरक्षण) तथा 'मन की बात' जैसे अभियानों के माध्यम से शासन को सीधे जन-भागीदारी से जोड़ दिया।

 

तकनीक से सामाजिक न्याय और अंत्योदय

आर्थिक और सामाजिक न्याय के मोर्चे पर, सरकार ने जनधन-आधार-मोबाइल यानी 'जैम ट्रिनिटी' की त्रिशक्ति से बिचौलियों और भ्रष्टाचार के पुराने तंत्र को समूल नष्ट कर दिया। डिजिटल तकनीक और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के सीधे जरूरतमंदों के खातों में पहुंच रहा है। इसके फलस्वरूप पिछले एक दशक में लगभग 25 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर आए हैं।

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वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर हर नागरिक को सम्मानित जीवन देने के लिए सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाओं ने धरातल पर करोड़ों जीवन बदले हैं। मुख्य योजनाओं की पहुंच को हम इन सीधे आंकड़ों से समझ सकते हैं: प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (80 करोड़ मुफ्त राशन लाभार्थी), आयुष्मान भारत योजना (55 करोड़ लोगों को 5 लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य कवच), प्रधानमंत्री आवास योजना (4 करोड़ से अधिक पक्के मकान), पीएम-किसान निधि (11 करोड़ किसानों को सालाना 6,000 की सीधी मदद), जल जीवन मिशन (14 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल से जल), उज्ज्वला योजना (10 करोड़ से अधिक महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन), पीएम सूर्य घर योजना (1 करोड़ घरों को मुफ्त सौर बिजली) और जनधन योजना (50 करोड़ से अधिक बैंक खाते) आदि हैं।

 

बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता

दूसरी ओर, बुनियादी ढांचे के निर्माण में वर्तमान भारत ने जो गति पकड़ी है, वह पूरी दुनिया के लिए शोध का विषय है। आज देश में प्रतिदिन लगभग 28 से 30 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण हो रहा है; रेल नेटवर्क के आधुनिकीकरण के साथ 'वंदे भारत' जैसी स्वदेशी ट्रेनें दौड़ रही हैं और हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। यूपीआई (UPI) के माध्यम से आज भारत वैश्विक डिजिटल भुगतान में सबसे आगे है।

 

स्वास्थ्य क्षेत्र में पहले जहां केवल 7 एम्स (AIIMS) थे, वहीं अब 20 एम्स चालू हो चुके हैं। 'मेक इन इंडिया' की दूरदर्शी नीतियों के चलते भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है और देश अब सेमीकंडक्टर (चिप) निर्माण के क्षेत्र में उतरकर वैश्विक स्तर पर आत्मनिर्भर बन रहा है।

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विदेश नीति और वैश्विक नेतृत्व

वैश्विक मंच पर भारत की विदेश नीति 'राष्ट्र प्रथम' के महामंत्र पर आधारित है, जहां देश बिना किसी महाशक्ति के दबाव में आए स्वतंत्र निर्णय लेता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व के संघर्षों और वैश्विक मंदी के बीच भी भारत ने पश्चिमी प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए कच्चे तेल का आयात जारी रखा और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक महाशक्ति बना रहा। जी-20 की सफल अध्यक्षता करके भारत 'ग्लोबल साउथ' की सशक्त आवाज और 'विश्वमित्र' के रूप में उभरा है। यही कारण है कि पीएम मोदी को अब तक 24 से अधिक देशों द्वारा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दिए जा चुके हैं। हाल ही में, मई 2026 में उन्हें मिला नॉर्वे का सर्वोच्च सम्मान (ग्रैंड क्रॉस ऑफ द रॉयल नॉर्वेजियन ऑर्डर ऑफ मेरिट) उनके अंतरराष्ट्रीय सम्मानों की श्रृंखला में 32वां सम्मान है।

 

एक ऐतिहासिक नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा विपरीत परिस्थितियों में होती है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने रिकॉर्ड समय में दो प्रमुख टीकों- पूर्णतः स्वदेशी 'कोवैक्सीन' और भारत में निर्मित 'कोविशील्ड- का उत्पादन किया और 'वैक्सीन मैत्री' के तहत दुनिया के दर्जनों देशों को टीके भेजकर 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना को चरितार्थ किया।

 

विकास भी, विरासत भी

यह नेतृत्व 'विकास भी, विरासत भी' के संतुलित मंत्र पर चलता है। एक तरफ इसरो (ISRO) ने चंद्रयान, सूर्ययान और गगनयान जैसे ऐतिहासिक अभियानों से अंतरिक्ष में अपना परचम लहराया, तो दूसरी तरफ अयोध्या में भव्य प्रभु श्री राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम व महाकाल लोक का पुनरुद्धार और योग-आयुर्वेद को वैश्विक मान्यता दिलाकर देश के सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित किया गया है।

 

इसी तरह, रक्षा क्षेत्र भी आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा है। 'मेक इन इंडिया' के तहत आईएनएस विक्रांत और तेजस जैसे हथियारों के निर्माण से जहां रक्षा आयात कम हुआ है, वहीं रक्षा निर्यात 21,000 करोड़ के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को पार कर चुका है। सीडीएस (CDS) पद का गठन, अटल व सेला टनल का निर्माण और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति ने देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को अभेद्य बनाया है।

 

निष्कर्ष

अंततः, आज की यह ऐतिहासिक तिथि कोई ठहराव नहीं, बल्कि 'विकसित भारत @2047' के विराट संकल्प की ओर बढ़ने वाले एक अनंत रथ का नव-प्रस्थान है। आज का न्यू इंडिया एक हाथ में इसरो की आधुनिकतम तकनीक और दूसरे हाथ में अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का गौरव थामे हुए वैश्विक मंच पर एक महाशक्ति के रूप में खड़ा है। आगामी पीढ़ियां मोदी युग को इतिहास के पन्नों में राष्ट्र के सांस्कृतिक अरुणोदय और वैश्विक महाशक्ति के रूप में उसके सिंहनाद के रूप में याद रखेंगी।