
उनके पास वोटर कार्ड नहीं है। आधार कार्ड नहीं है, वे नेताओं को वोट नहीं देते, वे सिस्टम के किसी के काम के नहीं। चुनाव में उनकी कोई भूमिका नहीं। वे किसी दंगा- फसाद में शामिल नहीं होते। न किसी तरह की धर्म की लड़ाई लड़ते हैं। न हिंदू- मुलसमान करते हैं और सवर्ण- दलित के लफड़े में पड़ते हैं। वे न तो अपने लिए किसी तरह का आरक्षण मांगते हैं और न किसी सरकारी योजना के लिए कतार में खड़े नजर आते हैं। और न ही किसी तरह का टेक्स जमा करते हैं।
वे सिर्फ एक हरेभरे पेड़ की शाखा पर अपना एक छोटा सा घरोंदा चाहते हैं, जहां वे रात गुजार सके। वे सिर्फ सुबह उठकर दाना-पानी के लिए एक उड़ान भरते हैं और शाम को फिर से अपने छोटे से आशियाने पर लौटकर रात गुजारते हैं। वे सिर्फ इतनाभर चाहते हैं कि शाम को जब अपने बच्चों के लिए दाना- पानी लेकर लौटे तो उनके आशियाने उन्हें वहीं मिले, जहां बनाए गए थे। लेकिन हम इंसान उनके लिए इतनाभर भी नहीं कर सके, क्योंकि वे पक्षी हैं, परिंदे हैं, तोते हैं, कबूतर हैं, चिड़ियाएं हैं। वे हम इंसानों के किसी काम के नहीं, राजनीति में उनकी कोई भागीदारी नहीं, समाज में उनका कोई योगदान नहीं, इसलिए हम बहुत बेरहम होकर उनके आशियाने, उनकी खोह उजाड़ देते हैं, क्योंकि हम उन्हें अपनी जिंदगी का हिस्सा नहीं मानते। हम इंसान विकास की अंधी दौड़ में इतना बौखला गए कि कुछ कबूतर, तोते, चिड़ियाओं को सहेजना तो छोड़िए, उल्टे उनके बनाए आशियाने तक उजाड़ रहे हैं। ये नेताओं और इंसानी बेशर्मी की हद है, मनुष्य की बेदर्दी की पराकाष्ठा है, विकास की अंधी दौड़ में पगलाए इंसानों की बेरहमी का ये सबसे निर्दयी और सबसे बड़ा उदाहरण है।
नेताओं, जनप्रतिनिधियों और विकास के लिए अंधी हो रही सरकारों को इतना भी रास नहीं आ रहा कि कुछ हजार तोते किसी हरेभरे पेड पर सूकुन से एक रात गुजार ले।
इंदौर के रानी सराय इलाके में आशियाना बनाकर कई दशकों से रहने वाले कबूतर, तोते और चिड़ियाओं ने जब सुबह दाना पानी के लिए उड़ान भरी तो उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि जब शाम को वे अपने पेड़ों की शाखाओं पर लौटेंगे तो उन्हें अपने आशियाने उजड़े हुए मिलेंगे और घोंसलों में उनके बच्चों के अंडे आरियों से कटे हुए मिलेंगे। उन्हें क्या पता था उनके बच्चे खून से लथपथ जमीन पर तड़पते मिलेंगे, उन्हें क्या पता था जिन इंसानों पर भरोसा कर के वे यहां रह रहे थे, वे उन्हें सहेजना,दाना-पानी देना तो दूर उनके घोंसले ही तबाह कर डालेंगे।
पूरे इंदौर शहर के पंछी- पक्षियों और कई तरह के परिंदों के लिए रीगल के रानी सराय पर स्थित ये 200 पेड़ ही उनकी रहने और जीने की जगह है, अब यहां मेट्रो की अंधी रफ्तार में रानी सराय के इन 200 पेड़ों को बेरहमी से काटा जा रहा है, तोते, कबूतर और चिड़ियांए उजड़े आशियाने देखकर सुधबुध खो रहे हैं कि अब वे कहां जाएंगे, कहां रहेंगे। रविवार की दोपहर शुरू हुई कटाई के बाद जब हजारों तोतों के घर उजड़े तो वे रातभर अपने लिए शहर के दूसरे हिस्सों में पेड़ और आशियाने खोजते रहे, लेकिन पूरी रात उन्हें कहीं कोई ठिकाना नहीं मिला।
बता दें कि इंदौर के रीगल तिराहे पर स्थित रानी सराय परिसर में मेट्रो के अंडरग्राउंड स्टेशन के निर्माण कार्य ने गति पकड़ ली है। परिसर में रविवार से ड्रिलिंग और पेड़ों की छंटाई का काम तेजी से प्रारंभ कर दिया गया है। मेट्रो परियोजना के चलते यहां स्थित लगभग 200 पुराने पेड़ों को काटने और ट्रांसप्लांट करने का बेरहम काम चल रहा है, जिसे विकास कहा जा रहा है।
निगरानी और ट्रांसप्लांट का दावा : रानी सराय परिसर के घने वृक्ष लंबे समय से हजारों तोतों का आशियाना रहे हैं। पर्यावरणविदों द्वारा इस कटाई का विरोध किए जाने के बाद मामला उच्च न्यायालय पहुंचा था। न्यायालय ने पक्षी वैज्ञानिकों की निगरानी में पेड़ों की कटाई और छंटाई की अनुमति प्रदान की है। प्रशासन का दावा है कि पेड़ों की छंटाई के दौरान तनों को सुरक्षित रखा जा रहा है ताकि उन्हें दूसरी जगह ट्रांसप्लांट करके जीवित रखा जा सके।
हाई कोर्ट के आदेश के उल्लंघन का आरोप : दूसरी ओर पर्यावरणविदों ने मेट्रो कॉरपोरेशन पर उच्च न्यायालय के आदेश का पालन न करने का गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि डबल बेंच ने निर्देश दिया था कि पक्षी वैज्ञानिकों की नियुक्ति मामले में इंटरवेनर पद्मश्री भालचंद्र मोढ़े के सुझाव पर की जाएगी। पर्यावरणविदों का दावा है कि इस तय प्रक्रिया को पूरा किए बिना ही कॉरपोरेशन ने पेड़ों की छंटाई शुरू कर दी है।
कई संस्थाओं का विरोध : रानी सराय के ऐतिहासिक वृक्षों को बचाने के लिए शहर की कई सामाजिक संस्थाओं ने लंबे समय तक संघर्ष किया है। पेड़ों को कटने से बचाने के लिए रीगल तिराहे पर कई प्रदर्शन आयोजित किए गए थे, जिसमें बड़ी संख्या में नागरिकों ने भाग लिया था। इसके अतिरिक्त जनहित पार्टी के संस्थापक अभय जैन ने परिसर में 1 महीने तक धरना भी दिया था। इन जन आंदोलनों के बावजूद अब मेट्रो निर्माण के लिए कटाई की कार्रवाई जारी है। विकास की अंधी रफ्तार और विफल होती नजर आ रही मेट्रो के लिए बौखला रहे नेताओं, जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के अधिकारियों को क्या फर्क पड़ेगा अगर कल सुबह इन हजारों पक्षियों का कलरव सुनाई न दे।


