
फ्रांस में बढ़ती महंगाई, शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं और सार्वजनिक सेवाओं में गिरावट को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। शनिवार को राजधानी पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में हिंसा की आशंका को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में करीब 1,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने के दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है।
इटली के मिलान, रोम और ट्यूरिन समेत कई शहरों की सड़कों पर शनिवार को हजारों युवाओं ने मार्च निकाला। पिछले सप्ताह इसी तरह के प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसक झड़पों और लूटपाट की घटनाओं को दोबारा होने से रोकने के लिए अधिकारियों ने बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों और सैनिकों को तैनात किया।
संग्रहालय और प्रमुख सांस्कृतिक संस्थान बंद
प्रदर्शनों के दौरान संभावित हिंसा की आशंका को देखते हुए पेरिस के कई प्रमुख सांस्कृतिक संस्थानों को बंद कर दिया गया। इनमें लूव्र संग्रहालय, म्यूजियम डी’ऑर्से, पिकासो संग्रहालय और ग्रां पैले शामिल हैं। ट्यूलरी गार्डन को भी बंद कर दिया गया।
सुरक्षा चिंताओं के कारण पेरिस ओपेरा के दोनों केंद्रों में गतिविधियां रोक दी गईं। आर्ट बेसल पेरिस ने भी सप्ताहांत का कार्यक्रम रद्द कर दिया। इसके अलावा, संवेदनशील इलाकों में आवाजाही सीमित करने के लिए 20 से अधिक मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने की खबर है।
व्यापारिक प्रतिष्ठानों ने भी एहतियाती कदम उठाए। दुकानदारों ने अपनी दुकानों की खिड़कियों को ढक दिया, प्रवेश द्वार मजबूत किए और अतिरिक्त सुरक्षा कर्मचारी तैनात किए। लुई वितों, डायर और बुल्गारी जैसे लग्जरी ब्रांडों से जुड़े स्टोरों में भी सुरक्षा बढ़ाई गई।
देशभर में 70 हजार सुरक्षाकर्मी तैनात
फ्रांस के गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज ने देशभर में करीब 70,000 पुलिसकर्मियों और जेंडरमेरी बल के जवानों की तैनाती की घोषणा की। यह संख्या 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान तैनात सुरक्षाकर्मियों से करीब 10,000 अधिक बताई गई है।
सुरक्षा व्यवस्था के तहत हेलीकॉप्टर, बख्तरबंद वाहन, वाटर कैनन और विशेष सुरक्षा इकाइयों को अलर्ट पर रखा गया। फ्रांस के आतंकवाद विरोधी अभियान में शामिल सैनिकों ने भी महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा में सहायता की।
पिछले सप्ताहांत देशभर में पांच लाख से अधिक लोगों के प्रदर्शन में शामिल होने की खबर थी। इसके बाद लूटपाट, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाओं में करीब 3,000 दुकानों और कारोबारी प्रतिष्ठानों के प्रभावित होने की बात सामने आई थी। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी अधिकारियों की तैयारियों में कमियों को स्वीकार किया था।
कई शहरों में बदले गए प्रदर्शन के रास्ते
पेरिस में पुलिस ने एक ट्रेड यूनियन मार्च का निर्धारित रास्ता बदल दिया। इसका उद्देश्य प्रदर्शनकारियों को उन प्रमुख व्यावसायिक इलाकों से दूर रखना था, जहां पहले हिंसा की घटनाएं हुई थीं।
ल्योन, नीस और मोंपेलिये के कुछ हिस्सों में भी प्रतिबंध लगाए गए। वहीं, मार्सेय में अधिकारियों ने अंततः ट्रेड यूनियन के प्रदर्शन को अनुमति दे दी।
ल्योन में प्रतिबंधित प्रदर्शन क्षेत्र में एकत्र करीब 150 लोगों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया। दूसरी ओर, ओरलियॉं में हजारों लोगों ने मरीन ले पेन के नेतृत्व वाली दक्षिणपंथी नेशनल रैली पार्टी के खिलाफ मार्च निकाला।
आखिर फ्रांस में क्यों बढ़ रहा है लोगों का गुस्सा?
फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस क्षेत्र के छात्रों ने स्कूलों में कर्मचारियों की कमी और खराब शैक्षणिक परिस्थितियों को लेकर की थी। धीरे-धीरे यह विरोध व्यापक अभियान में बदल गया, जिसमें बेहतर वेतन, पेंशन और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार की मांग उठाई जा रही है।
छात्र अधिक विश्वविद्यालय सीटें, ज्यादा छात्रवृत्ति और सार्वजनिक छात्र आवासों के किराये पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। वहीं, कर्मचारियों और श्रमिक संगठनों का कहना है कि घरेलू खर्चों में बढ़ोतरी और आर्थिक असमानता के कारण आम लोगों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल होती जा रही है।
महंगाई, शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दों ने अलग-अलग वर्गों को एक मंच पर ला दिया है। यही वजह है कि फ्रांस में विरोध प्रदर्शनों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में सरकार की प्रतिक्रिया और प्रदर्शनकारी संगठनों के साथ बातचीत इस आंदोलन की दिशा तय करने में अहम हो सकती है।


