
इंदौर में आयोजित छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी ने करीब 27 बार ‘अंधभक्त’ शब्द का इस्तेमाल किया। या शायद इससे भी ज्यादा बार। इस आयोजन को गैर-राजनीतिक कहकर प्रचारित किया जा रहा है, कांग्रेस इसे छात्रों से सीधा संवाद करना कहती है। अगर ऐसा है तो फिर राहुल गांधी अपनी स्पीच और इस पूरे संवाद में ‘अंधभक्त’ शब्द का इस्तेमाल क्यों करते हैं, यह शब्द तो पूरी तरह से सोशल मीडिया पर लड़ी जाने वाली पॉलिटिकल लड़ाई से निकलकर आया शब्द है।
दूसरी बात यह कि ‘अंधभक्त’ की श्रेणी में तो बहुत से ऐसे छात्र भी हैं जो अभी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में पढ़ रहे हैं और मोदी समर्थक हैं या किसी न किसी मुद्दे पर सरकार से अपनी सहमति रखते हैं। जबकि दूसरे कई ऐसे मुद्दें हैं, जिन पर सरकार से उनकी सहमति नहीं है, मसलन देश का एजुकेशन सिस्टम, बेरोगजारी और नीट घोटाला इत्यादि।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी ऐसे ‘छात्रों’ को भविष्य में अपने वोटर्स में तब्दील नहीं करना चाहते हैं जो अभी किसी न किसी लिहाज से ‘अंधभक्त’ कहे या माने जा सकते हैं? क्या राहुल गांधी ने ऐसे ‘अंधभक्तों’ को हमेशा के लिए ‘अंधभक्त’ मान लिया है, जो आगे चलकर कभी अपना माइंडसेट बदल सकते हैं। क्या राहुल गांधी ऐसे लोगों को बार-बार अंधभक्त कहकर उन्हें और ज्यादा अपना विरोधी नहीं बना रहे हैं, जिनमें आगे चलकर राहुल का वोटर्स होने की संभावना छिपी है?
यहां राहुल गांधी की समझ और दूरदृष्टि को लेकर कुछ संशय पैदा होता है, वे यह मानकर चलते हैं कि जो ‘अंधभक्त’ हैं वो हमेशा ‘अंधभक्त’ रहेंगे, जबकि निजी-तौर पर मेरा यह मानना है और मैंने यह देखा है कि पिछले कुछ वक्त में मेरे इर्द-गिर्द सैकड़ों प्रो-बीजेपी लोगों का माइंडसेट बहुत हद तक बदला है और वे राहुल गांधी को एक दूसरा पक्ष या एक दूसरे विकल्प के तौर पर देखना चाहते हैं, बशर्ते वो विकल्प उनकी सोच पर खरा उतरता हो।
वे चाहते हैं कि सत्ता के सामने एक ऐसी दूसरी सोच उभरकर आए जो वर्तमान सरकार के ‘एल्गोरिदम’ का मुकाबला कर सके और वेलफेयर के मामलों में सरकार को चुनौती दे सके, लेकिन राहुल गांधी की तरफ से वो ‘फोर्स’ नहीं बन पा रहा है, जिसकी अनुभूति कर के वे राहुल गांधी नाम के दूसरे विकल्प को मन ही मन चाहने लगे और जब वोटिंग की कतार में खड़े हों तो न चाहते हुए भी उनका हाथ कमल के सामने ठप्पा लगाने के लिए मजबूर न हो।
हर मनुष्य के मन में एक गहरी लालसा दबी पड़ी होती है, ठीक ऐसे ही वोटर के मन में भी एक ऐसी ‘अनभिज्ञ’ इच्छा होती है, जिसे खंगालकर उसकी पड़ताल राहुल गांधी नहीं कर पा रहे हैं। संभवत: मोदी भक्त या प्रो-बीजेपी वोटर्स राहुल गांधी को वोट देने का पाप अपने सिर नहीं लेना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि यह पाप करने का मौका उन्हें राहुल गांधी खुद दें, किंतु राहुल की तरफ से वो फिसलन नहीं बन पा रही है, जिसका इस्तेमाल प्रो-बीजेपी वोटर्स अपने और अपने बच्चों के फायदे के लिए कर सकें। इस पर भी राहुल गांधी सरकार के समर्थन में पोस्ट करने वाले लोगों को ‘अंधभक्त’ कहकर पहले से ही अपने लिए वोटर्स के तौर पर खारिज कर देते हैं। वे यह सीख ही नहीं पा रहे हैं कि जिस सच्चाई के साथ मंच पर ग्राफिक्स के जरिए वे एजुकेशन सिस्टम के फैल्योर, देश में बढ़ती बेराजगारी, नीट घोटाला, व्यापम स्कैम, स्कॉलरशिप की दिक्कतें, होस्टल की परेशानियां, बंद होते सरकारी स्कूल, विभागों में नियुक्तियां, नौकरी में भर्तियां और यूनिवर्सिटियों में भेदभाव के आकड़ें दिखा रहे हैं, वे बदलाव लाने के लिए काफी हैं। ये मुद्दें आम लोगों की नब्ज दबाने के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन इनसे प्रभावित जनता का भरोसा जीतने की बजाए उन्हें ‘अंधभक्त’ कहकर उन्हें पहले से ही अपने से दूर कर रहे हैं, इस बात को पुख्ता मानते हुए कि ये अंधभक्त हैं तो कभी कांग्रेस को वोट नहीं देंगे। कभी बीजेपी समर्थकों ने भी तो कांग्रेस को वोट दिया होगा।
राहुल गांधी ये क्यों सोचते हैं कि जो अंधभक्त हैं, उनके बच्चे नीट की तैयारी नहीं कर रहे होंगे, आईआईटी के लिए नहीं जा रहे होंगे या किसी यूनिवर्सिटी में उनके साथ भेदभाव नहीं हुआ होगा, या ऐसे लोगों के बच्चों को किसी संस्थान में एडमिशन लेने या हॉस्टल में किसी तरह की दिक्कत नहीं हो रही होगी?
जब राहुल गांधी ऐसे मंच को गैर-राजनीतिक बताकर सिर्फ छात्रों की बात करते हैं तो उन्हें अंधभक्त जैसे राजनीतिक और दोयम दर्जे के शब्दों के इस्तेमाल से बचना चाहिए, तभी वो ऐसे परिजनों के दिलों पर भी दस्तक दे सकेंगे, जो अभी इस वक्त कहीं न कहीं वर्तमान सरकार से इत्तेफाक तो रखते हैं, लेकिन बेहतर भविष्य के लिए भी उम्मीदमंद भी हैं।
यह ठीक है कि राहुल गांधी के नाम पर इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ में करीब एक लाख से ज्यादा लोग पहुंच थे। जिस इंदौर में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं जीता, उस शहर में इतने बड़े जनसैलाब की उम्मीद कांग्रेस को भी नहीं थी। यह जरूर है कि जगह की अनुमति देने के नाम पर बीजेपी ने अड़ंगे लगाकर जो खेल खेला उससे कांग्रेस को बहुत हद तक फायदा हुआ, लेकिन आयोजन स्थल पर जो दृश्य था, उसका पूरा श्रेय सिर्फ बीजेपी को ही नहीं जाता, इस भीड़ के पीछे राहुल गांधी एक बड़ी वजह है, क्योंकि वे जेन-जी या युवाओं से बेहद आसानी से जुड़ जाते हैं, युवा उनके आसपास बेहद कंफर्ट महसूस करते हैं। कुछ ऐसा ही नजारा भारत जोड़ो यात्रा के दौरान देखा गया था।
अब सवाल यह नहीं है कि बेहद विपरीत परिस्थितयों में भी राहुल की सभा में लाखों लोग उमड़ पड़े, सवाल यह है कि जब राहुल को देखने-सुनने के लिए इतनी संख्या में युवा पहुंच रहे हैं ये भीड़ वोटर्स में तब्दील क्यों नहीं होती। यहां तक तो राहुल ठीक ठीक पहुंच गए हैं, अब उन्हें इस ‘क्यों’ के आगे सोचना चाहिए।


