
समीरात्मज मिश्र
भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार को लेकर हाल में आए आंकड़े सरकार के लिए उत्साहजनक हैं। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में देश की वास्तविक जीडीपी 7।8 फीसद की दर से बढ़ी है। सरकार के मुताबिक विनिर्माण और सेवाओं के साथ घरेलू मांग ने भी इस वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ALSO READ: आईआईटी जैसे शीर्ष संस्थानों में कैसे रुकेंगी आत्महत्याएं
हालांकि आर्थिक वृद्धि की इस तस्वीर के साथ ही रोजगार और युवाओं को लेकर सामने आए आंकड़े एक दूसरी चुनौती की ओर इशारा करते हैं। 18 सितंबर को जारी जिला-स्तरीय श्रम बाजार आंकड़ों के मुताबिक देश के करीब 250 जिलों में 15 से 29 वर्ष की उम्र के कम से कम 25 फीसद युवा नीट (एनईईटी) यानी नॉट इन इंप्लॉयमेंट, एजुकेशन और ट्रेनिंग श्रेणी में हैं।
इसका मतलब है कि इन युवाओं के पास ना तो रोजगार है, ना ही ये शिक्षा हासिल कर रहे हैं और ना ही किसी तरह का प्रशिक्षण ले रहे हैं। यह पहली बार है जब पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे यानी पीएलएफएस के तहत इस तरह के जिला-स्तरीय आंकड़े सामने आए हैं। ALSO READ: बिहार: क्या बैकवॉटर इफेक्ट से बाढ़ हुई भयावह
250 जिलों का आंकड़ा क्यों महत्वपूर्ण है?
राष्ट्रीय स्तर पर 15 से 29 वर्ष के युवाओं की नीट दर करीब 25 फीसदी बताई गई है लेकिन जिला-स्तर पर तस्वीर कई जगह इससे भी ज्यादा खराब है।
आंकड़ों के मुताबिक बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के करीब दो-तिहाई जिलों में 15 से 29 वर्ष के कम से कम एक चौथाई युवा नीट श्रेणी में हैं। आंध्र प्रदेश, ओडिशा, असम और तेलंगाना में भी करीब आधे जिलों में यह अनुपात 25 फीसदी या उससे अधिक है।
हालांकि तस्वीर पूरे देश में एक जैसी नहीं है। कुछ जिलों में ऐसे युवाओं की संख्या 10 फीसदी से भी कम है। ओडिशा के नबरंगपुर में यह दर 4.1 फीसदी बताई गई है जबकि केरल के एर्नाकुलम जैसे जिलों में भी यह राष्ट्रीय औसत से काफी कम है।
इससे यह संकेत मिलता है कि समस्या केवल युवाओं की संख्या से जुड़ी नहीं है बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था, शिक्षा, रोजगार के अवसर, कौशल और सामाजिक परिस्थितियां भी यह तय करती हैं कि युवा आर्थिक गतिविधियों में किस हद तक शामिल हो पाते हैं। ALSO READ: भारत की सड़कों पर मर्दानगी से जूझती महिलाएं
नीट का मतलब सीधे बेरोजगार होना नहीं
हालांकि इन आंकड़ों को समझते समय एक महत्वपूर्ण अंतर भी ध्यान में रखना जरूरी है। नीट श्रेणी को सीधे ‘बेरोजगार’ कहना सही नहीं होगा। इसमें ऐसे युवा भी शामिल हो सकते हैं जो नौकरी की तलाश नहीं कर रहे हैं, बल्कि घरेलू या ऐसे ही कुछ अन्य काम में लगे हैं या किसी अन्य कारण से श्रम बाजार और शिक्षा-प्रशिक्षण व्यवस्था से बाहर हैं।
नीति आयोग की अगस्त 2026 में जारी ‘रीइमेजिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत @2047′ नाम की रिपोर्ट भी करीब 8.7 करोड़ नीट युवाओं का आंकड़ा देती है। रिपोर्ट के मुताबिक यह अनुमान 2021 के एनएसएस आंकड़ों पर आधारित हैं। यानी यह आंकड़ा भी मौजूदा समय में बेरोजगार युवाओं की सटीक संख्या नहीं बताता, बल्कि उन युवाओं के एक बड़े समूह की ओर संकेत करता है जो रोजगार, शिक्षा या प्रशिक्षण की मुख्यधारा से बाहर हैं।
यही अंतर इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाता है कि जीडीपी यदि बढ़ रही है तो क्या रोजगार भी उसी गति से बढ़ रहा है?
भारत की वास्तविक जीडीपी में अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में 7.8 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई जबकि इसी अवधि में वास्तविक जीवीए (ग्रॉस वैल्यू एडेड) में 8.2 फीसदी की वृद्धि हुई। सरकार के मुताबिक, विनिर्माण और सेवाओं की वृद्धि ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया। हालांकि जीडीपी का बढ़ना अपने आप यह साबित नहीं करता कि अर्थव्यवस्था उतनी ही मात्रा में गुणवत्तापूर्ण और पर्याप्त रोजगार भी पैदा कर रही है।
आर्थिक वृद्धि क्या देश में रोजगार की स्थिति को भी बता रही है?
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे मशहूर अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं कि भारत की आर्थिक वृद्धि के आंकड़े खासकर संगठित क्षेत्र की गतिविधियों को प्रतिबिंबित करते हैं, जबकि असंगठित क्षेत्र की स्थिति अपेक्षाकृत अदृश्य रह जाती है।
डीडब्ल्यू से बातचीत में प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं, “वृद्धि दर मापने का तरीका भी गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। संगठित का बढ़ना और असंगठित का घटना बेरोजगारी पैदा करता है। संगठित क्षेत्र में रोजगार के बहुत ज्यादा अवसर नहीं बन रहे हैं और वहां से काम छूटने वाले लोग असंगठित क्षेत्र में चले जाते हैं, जिसे रोजगार में गिन लिया जाता है। इससे रोजगार की वास्तविक स्थिति का पूरा पता नहीं चलता। नोटबंदी के बाद से असंगठित क्षेत्र पर दबाव और बढ़ा है।”
प्रोफेसर अरुण कुमार का यह भी कहना है, “आंकड़ों में हम अंडरएंप्लायड को भी काउंट कर लेते हैं जबकि वास्तव में ऐसे लोग आंशिक रूप से बेरोजगार ही रहते हैं। उदाहरण के लिए, खेती के बाद सबसे बड़ा रोजगार वाला क्षेत्र व्यापार है। वहां ई कॉमर्स बढ़ रहा है। इसकी वजह से स्टोर्स की डिमांड कम हो गई और ई कॉमर्स की डिमांड बढ़ गई। और हमारे पास डेटा तो ईकामर्स और मॉल्स से आता है तो लगता है कि यहां ग्रोथ बढ़ गई है। यह स्थिति नोटबंदी के बाद से ही दिख रही है। असंगठित क्षेत्र की गिरावट बढ़ती जा रही है। हमें असंगठित क्षेत्र पर फोकस करना चाहिए लेकिन हम संगठित क्षेत्र के आधार पर डेटा तैयार कर रहे हैं और उसी के आधार पर पॉलिसी बना रहे हैं।”
प्रोफेसर अरुण कुमार के मुताबिक समस्या सिर्फ बेरोजगारी की नहीं, बल्कि ऐसे रोजगार और श्रम-बाजार की भी है जिसकी वास्तविक स्थिति आंकड़ों में पूरी तरह दिखाई नहीं देती। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के श्रमबल में स्वरोजगार में लगे लोगों की हिस्सेदारी 58.4 फीसदी है, जबकि नियमित तरीके से नौकरियों में लगे लोगों की हिस्सेदारी 21.7 फीसदी है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि बड़ी संख्या में लोग ऐसे रोजगार में हैं जहां सामाजिक सुरक्षा का कवरेज नहीं है।
युवाओं का सवाल सिर्फ अर्थव्यवस्था का नहीं, देश के भविष्य का भी
भारत की आबादी में युवाओं की बड़ी हिस्सेदारी को लंबे समय से देश की ताकत माना जाता रहा है। इसे ही अक्सर डेमोग्रेफिक डिविडेंड कहा जाता है। लेकिन युवा आबादी तभी आर्थिक लाभ में बदल सकती है जब उसके पास शिक्षा, कौशल और रोजगार के पर्याप्त अवसर हों।
नीति आयोग की रिपोर्ट भी इस बात पर जोर देती है कि भारत के विकसित राष्ट्र बनने की महत्वाकांक्षा के लिए उसके लोगों की शिक्षा, कौशल और रोजगार क्षमता निर्णायक होगी। इसलिए करीब 250 जिलों में एक चौथाई से अधिक युवाओं का नीट श्रेणी में होना केवल श्रम बाजार का आंकड़ा नहीं है बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि देश के कई हिस्सों में युवा आबादी और आर्थिक अवसरों के बीच दूरी बनी हुई है।
2047 का लक्ष्य और युवाओं की चुनौती
भारत ने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखा है। लेकिन इस लक्ष्य की चर्चा केवल जीडीपी के आकार या आर्थिक वृद्धि दर से पूरी नहीं होती। इसके लिए रोजगार पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था, उद्योगों की क्षमता, शिक्षा और कौशल के बीच बेहतर तालमेल और अलग-अलग क्षेत्रों की जरूरत के मुताबिक रोजगार के अवसर जरूरी होंगे।
प्रोफेसर अरुण कुमार 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को सिर्फ एक राजनीतिक जुमला मानते हैं। उनका कहना है, “2047 तो भूल जाइए, अगले दो साल की बात करिए। एआई से इतनी ज्यादा बेरोजगारी बढ़ेगी कि कल्पना भी नहीं कर सकते। तमाम बड़ी कंपनियां बड़े पैमाने पर छंटनी कर रही हैं। आने वाले दो साल में क्या होने वाला है, ये सोचिए। 2047 की बात करना बेमतलब की बात है।”
उनके मुताबिक, “इसके पहले के भी तमाम वादे कहां पूरे हुए? किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाएगी, ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी हो जाएगी, अब 2047 तक विकसित हो जाएंगे। ऐसे बातें हवा-हवाई हैं। हमें जो करना चाहिए वो हम कर नहीं रहे हैं। मसलन, रोजगार सृजन के क्षेत्र में काम करना चाहिए लेकिन उसके लिए कोई ठोस योजना नहीं है। बजट में भी हम तमाम ऐसे सेक्टरों में कमी कर दे रहे हैं, जहां रोजगार हैं। सड़क, हाईवे जैसी चीजों में रोजगार बहुत कम हैं जबकि ग्रामीण रोजगार, शिक्षा इत्यादि पर हम फोकस नहीं कर रहे हैं जहां रोजगार पैदा होता है।”
भारत की अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ रही है, यह एक आंकड़ा है। लेकिन उस वृद्धि के साथ कितने युवा रोजगार, शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण से जुड़ पा रहे हैं, यह भारत के डेमोग्रैफिक डिविडेंड की असली परीक्षा हो सकती है।


