पत्नी का खौफनाक खेल! पहले खीर में मिलाई नींद की गोलियां, फिर बाथरूम में पति को दफनाया

उत्तर प्रदेश में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि 40 वर्षीय रूबी ने अपने 44 वर्षीय पति सुरेंद्र की हत्या कर दी। पुलिस के मुताबिक, वारदात से पहले उसने पति को नींद की गोलियां मिलाकर खीर खिलाई थी। इसके बाद शव को घर के बाथरूम के फर्श के नीचे दबा दिया और ऊपर से सीमेंट डालकर नई टाइलें लगवा दीं। हैरानी की बात यह है कि वह कई हफ्तों तक उसी घर में रहती रही और लोगों से कहती रही कि उसके पति अचानक लापता हो गए हैं।

दर्ज कराई थी लापता की रिपोर्ट

यह मामला तब सामने आया जब 26 मई को सिकंदरा थाने में सुरेंद्र के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई गई। पुलिस ने जांच शुरू की तो परिवार के लोगों के बयानों में कई विरोधाभास मिले। साथ ही, परिवार के बैंक खाते से हुए कुछ संदिग्ध लेन-देन ने भी पुलिस का शक बढ़ा दिया। जांच आगे बढ़ने पर पुलिस आगरा के देहतोरा इलाके में स्थित रेणुका धाम कॉलोनी के घर पहुंची। वहां बाथरूम का फ़र्श तोड़ने पर नीचे से कंकाल जैसे अवशेष मिले, जिन्हें सुरेंद्र का माना जा रहा है। पुलिस ने मौत की असली वजह जानने के लिए इन अवशेषों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।

बाथरूम में दफनाई लाश

इस मामले की जानकारी देते हुए एसीपी अमीषा ने बताया कि जांच में पता चला कि सुरेंद्र की हत्या उनकी पत्नी रूबी ने की थी। आरोप है कि हत्या के बाद उसने शव को घर के बाथरूम के फ़र्श के नीचे दबा दिया और ऊपर से सीमेंट डालकर उसे ढक दिया। पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद फ़र्श तुड़वाकर शव बरामद किया और पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। फिलहाल रूबी पुलिस हिरासत में है। उससे पूछताछ की जा रही है और मामले में आगे की कार्रवाई जारी है।

पत्नी ने किया खौफनाक खुलासा

पुलिस के अनुसार, पूछताछ के दौरान रूबी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया। जांच में सामने आया कि सुरेंद्र कुछ समय से बेरोजगार थे और उन्हें शराब की लत थी। आरोप है कि वह शराब के लिए अक्सर रूबी से पैसे मांगते थे और पैसे न मिलने पर उसके साथ मारपीट करते थे। पड़ोसियों ने भी पुलिस को बताया कि दोनों के बीच आए दिन झगड़े होते रहते थे। पुलिस के मुताबिक, सुरेंद्र और रूबी की शादी को करीब 16 साल हो चुके थे और उनकी दो बेटियां हैं। परिवार का खर्च सुरेंद्र के दिवंगत पिता की पेंशन से चलता था, जिसे सुरेंद्र और उनके भाई अनिल के बीच बांटा जाता था। शुरुआती जांच के आधार पर पुलिस का मानना है कि यह वारदात 18 मई को हुई थी।

खीर में मिलाई नींद की गोली

पुलिस के मुताबिक, रूबी ने खीर में काफी मात्रा में नींद की गोलियां मिलाकर सुरेंद्र को खिलाई थीं। जांच में यह भी सामने आया कि जब उनकी बेटियों ने सुरेंद्र को लंबे समय तक बेहोश पड़ा देखा, तो उन्हें कोई शक नहीं हुआ, क्योंकि वह शराब पीने के बाद अक्सर कई घंटों तक सोए रहते थे। पुलिस का मानना है कि सुरेंद्र की हत्या उनके बेहोश होने के बाद की गई। हालांकि, मौत की असली वजह का पता पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही चल सकेगा। जांच के अनुसार, अगले दिन रूबी अपनी बेटियों को उनके मामा के घर छोड़ आई। इसके बाद उसने घर के बाथरूम में गड्ढा खोदा, सुरेंद्र के शव को उसमें दबा दिया और ऊपर से सीमेंट डालकर नई टाइलें लगवा दीं, ताकि किसी को इस वारदात की भनक न लगे।

पुलिस के मुताबिक, हत्या के बाद रूबी खुद थाने पहुंची और सुरेंद्र के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई, ताकि लोगों को लगे कि वह कहीं गायब हो गए हैं। मामले में नया मोड़ तब आया, जब सुरेंद्र के भाई अनिल ने देखा कि उनके लापता होने के बाद भी पेंशन वाले खाते से पैसे निकाले जा रहे हैं। एटीएम कार्ड सुरेंद्र के पास ही रहता था, इसलिए अनिल को शक हुआ और उन्होंने इसकी जानकारी पुलिस को दी। इसके बाद पुलिस ने दोबारा घर की गहन जांच की और मामला खुल गया।

फर्श तोड़कर निकाली लाश

जब पुलिस ने घर की गहन तलाशी ली, तो बाथरूम के नए बने फर्श को तोड़ने पर नीचे से दफनाया गया कंकाल मिला। इसके बाद पुलिस ने उसे कब्जे में लेकर आगे की जांच शुरू कर दी। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इस वारदात में रूबी अकेली शामिल थी या किसी और ने भी उसका साथ दिया। पुलिस अधिकारी सैयद अली अब्बास ने कहा कि किसी महिला के लिए अकेले एक व्यक्ति की हत्या करना और फिर घर के अंदर शव को दफनाना आसान नहीं लगता। इसलिए पुलिस इस मामले में दूसरे लोगों की भूमिका की भी जांच कर रही है।

Maatrubhumi: सलमान खान की ‘मातृभूमि’ पर मंडराया खतरा, टाइटल बदलने के बावजूद सेंसर बोर्ड ने रिलीज पर लगाई रोक

Maatrubhumi: सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (CBFC) ने सलमान खान की फ़िल्म ‘मातृभूमि’ (जिसका पहले नाम ‘बैटल ऑफ़ गलवान’ था) के लिए क्लीयरेंस सर्टिफ़िकेट को अगले आदेश तक रोक दिया है। भारतीय सेना और चीनी सैनिकों के बीच 2020 में हुई गलवान घाटी की झड़प पर आधारित यह फ़िल्म पहले ईद से ठीक पहले 17 अप्रैल को रिलीज़ होने वाली थी। हालांकि, रिलीज़ की तारीख़ को आगे बढ़ा दिया गया था और इसके अगस्त में रिलीज़ होने की उम्मीद थी।

NDTV के अनुसार, फ़िल्म अगस्त की तारीख़ पर रिलीज नहीं हो पाएगी। ‘मातृभूमि’ का निर्देशन अपूर्व लाखिया ने किया है और इसे सलमान खान फ़िल्म्स बैनर के तहत सलमा खान ने प्रोड्यूस किया है। इसमें चित्रांगदा सिंह भी हैं। फिल्म रिलीज होने से पहले ही चीन में कुछ वर्गों ने इसकी आलोचना की है।

टीजर ऑनलाइन प्रसारित होने के बाद, चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो पर कई उपयोगकर्ताओं ने फिल्म पर गलवान घाटी संघर्ष से संबंधित घटनाओं को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। जनवरी में, विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत में फिल्म निर्माण से संबंधित मामलों का निपटारा “संबंधित अधिकारियों” द्वारा किया जाता है, और विदेश मंत्रालय की इस या इसी तरह की परियोजनाओं में “कोई भूमिका नहीं” है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से उन खबरों पर टिप्पणी करने को कहा गया, जिनमें दावा किया गया था कि मंत्रालय ने छह साल पहले गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई झड़प पर आधारित फिल्म पर “आपत्ति जताई” है। उन्होंने कहा, “हमें पता है कि इस तरह की फिल्म बनाने की योजना है। जैसा कि आप जानते हैं, भारत में फिल्म निर्माण से जुड़े मामलों को संबंधित अधिकारी देखते हैं। और जहां तक ​​हमारी बात है, विदेश मंत्रालय की ऐसी फिल्मों या प्रोजेक्ट्स में कोई भूमिका नहीं होती है।”

सूत्रों ने बताया, “हाल ही में फिल्म का टाइटल ‘बैटल ऑफ गलवान’ से बदलकर ‘मातृभूमि’ कर दिया गया है। उसी के अनुसार बदलाव किए जा रहे हैं। संभावना है कि फिल्म की रिलीज में और देरी हो सकती है। इसे अगस्त में स्वतंत्रता दिवस के आसपास रिलीज किए जाने की उम्मीद है।”

फिल्म के निर्माताओं ने सलमान खान के 60वें जन्मदिन के मौके पर 27 दिसंबर, 2025 को फिल्म का टीज़र जारी किया था। इस फ़िल्म में सलमान खान 16 बिहार रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफ़िसर कर्नल संतोष बाबू का किरदार निभा रहे हैं। उन्होंने बॉर्डर पर डिसइंगेजमेंट एग्रीमेंट लागू करते समय हुई झड़प के दौरान भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया था।

‘मातृभूमि’ में अभिलाष चौधरी और अंकुर भाटिया भी अहम भूमिकाओं में नज़र आएंगे। इस फ़िल्म का संगीत हिमेश रेशमिया ने दिया है। सलमान खान को आख़िरी बार ए.आर. मुरुगाडोस की फ़िल्म ‘सिकंदर’ में देखा गया था, जिसमें रश्मिका मंदाना भी हैं।

Baby Do Die Do Review: क्राइम, सस्पेंस और इमोशन से भरपूर है ‘बी डू डाई डू’ , हुमा कुरैशी का कतिलाना अंदाज जीत लेगा दिल

फिल्म- बेबी डू डाई डू

कलाकार- हुमा कुरैशी, सिकंदर खेर, चंकी पांडे, सीमा पाहवा, विद्या मालवड़े, हिमांशु मलिक, रूपेश बाने, अरुण कुशवाह, मरुधर शेखावत, रचित सिंह

निर्देशक- नचिकेत सामंत

निर्माता- साकिब सलीम

रेटिंग- 3.5/5

Baby Do Die Do Review: क्राइम थ्रिलर फिल्मों में अक्सर बदले की कहानी देखने को मिलती है, लेकिन ‘बेबी डू डाई डू’ उसी पुराने विषय को नए अंदाज में पेश करती है। फिल्म की नायिका न सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट किलर है, बल्कि वह बोल और सुन भी नहीं सकती। यही बात इस फिल्म को बाकी थ्रिलर्स से अलग बनाती है। फिल्म में सस्पेंस, एक्शन, रोमांस और डार्क ह्यूमर का बैलेंस्ड मिक्चर देखने को मिलता है।

कहानी

फिल्म की शुरुआत एक दर्दनाक हादसे से होती है। बचपन में बेबी और उसकी जुड़वा बहन एक सुनसान होटल में एक मर्डर देख लेती हैं। अपनी पहचान छिपाने के लिए अपराधी बेबी की बहन की जान ले लेता है। इस घटना के बाद बेबी का पूरा जीवन बदल जाता है।

वह धीरे-धीरे अपराध की दुनिया का हिस्सा बन जाती है और पीएम जैन के मार्गदर्शन में सुपारी किलर के रूप में काम करने लगती है। उसकी पहचान उसका अलग अंदाज है, जिसमें वह छाते को हथियार बनाकर अपने टारगेट खत्म करती है। हालांकि उसके लिए हर हत्या सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि अपनी बहन के कातिल तक पहुंचने का रास्ता भी है। कहानी आगे बढ़ते हुए कई ट्विस्ट लेकर आती है और क्लाइमेक्स तक दर्शकों को लगातार बांधे रखती है।

अभिनय

हुमा कुरैशी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। बिना संवादों के अभिनय करना आसान नहीं होता, लेकिन उन्होंने अपने चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज के जरिए हर भावना को बखूबी दर्शाया है। बदले की आग, प्रोफेशनल किलर की ठंडक और निजी रिश्तों की संवेदनाएं- तीनों रूपों में उनका अभिनय प्रभाव छोड़ता है।

सिकंदर खेर ने अपने किरदार को गंभीरता और आत्मविश्वास के साथ निभाया है। चंकी पांडे अपने अलग अंदाज से चौंकाते हैं, जबकि सीमा पाहवा अपने अनुभव के दम पर हर दृश्य को विश्वसनीय बनाती हैं। विद्या मालवड़े, हिमांशु मलिक और बाकी कलाकार भी कहानी को मजबूती देते हैं।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

निर्देशक नचिकेत सामंत ने फिल्म को सिर्फ एक एक्शन थ्रिलर नहीं रहने दिया, बल्कि उसमें इमोशनल लेयर भी जोड़ी है। फिल्म का स्क्रीनप्ले तेज है और कहानी बिना भटके आगे बढ़ती है। डार्क ह्यूमर और सस्पेंस का इस्तेमाल भी संतुलित तरीके से किया गया है।

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी मुंबई के अंडरवर्ल्ड के माहौल को प्रभावी ढंग से पेश करती है। बैकग्राउंड म्यूजिक कई दृश्यों का प्रभाव बढ़ाता है और एक्शन सीक्वेंस स्टाइलिश लगते हैं। एडिटिंग की वजह से फिल्म कहीं भी जरूरत से ज्यादा लंबी महसूस नहीं होती।

फाइनल वर्डिक्ट

‘बेबी डू डाई डू’ एक प्रयोगधर्मी और मनोरंजक क्राइम थ्रिलर है, जो अपनी कहानी, सस्पेंस और दमदार परफॉर्मेंस की वजह से अलग पहचान बनाती है। हुमा कुरैशी का अभिनय इसकी सबसे बड़ी यूएसपी है, जबकि फिल्म का अनएक्सपेक्टेड क्लाइमेक्स इसे यादगार बनाता है। अगर आप कुछ नया और रोमांच से भरपूर देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म एक अच्छा विकल्प साबित हो सकती है।

Ishq Kameena 2.0: ‘हमने नकल करने की कोशिश नहीं…’, शाहरुख खान-ऐश्वर्या राय का ‘इश्क कमीना’ गाना रिक्रिएट करने में बेहद नर्वस थी हुमा कुरैशी

Ishq Kameena 2.0: ‘बेबी डू डाई डू’ (Baby Do Die Do) का नया गाना ‘इश्क कमीना’ रिलीज हो गया है। इस गाने में बॉलीवुड के सबसे पसंदीदा डांस ट्रैक में से एक को एक स्टाइलिश और नया रूप दिया गया है। यह डांस नंबर मूल रूप से 2002 में फिल्म ‘शक्ति: द पावर’ में शाहरुख खान और ऐश्वर्या राय बच्चन पर फिल्माया गया था। अब यह नए विज़ुअल, ज़बरदस्त कोरियोग्राफ़ी और मॉडर्न अंदाज़ के साथ वापस आया है। इस नए ‘इश्क कमीना’ गाने में हुमा कुरैशी और रचित सिंह नजर आ रहे हैं।

X (पहले ट्विटर) पर हुमा कुरैशी ने क्लिप शेयर करते हुए लिखा- “दिल्ली के बच्चों के तौर पर हम 90 के दशक के इन गानों पर नाचते हुए बड़े हुए हैं… यकीन नहीं हो रहा कि मुझे इसे फिर से करने का मौका मिला है… हम आपसे बहुत प्यार करते हैं @iamsrk और ऐश्वर्या मैम #IshqKameena”

इस मशहूर गाने को फिर से बनाने के बारे में बात करते हुए हुमा कुरैशी ने कहा, “जब यह गाना हमारे पास आया, तो हम इसे वापस लाने के लिए बहुत उत्साहित थे। ‘इश्क कमीना’ एक बहुत बड़ा गाना है, लगभग हर कोई कभी न कभी इस पर नाचा है और इसके साथ एक बड़ी ज़िम्मेदारी भी आती है।

हम नर्वस थे, सच में नर्वस थे। लेकिन हम ओरिजिनल गाने की नकल करने की कोशिश नहीं कर रहे थे। हम अपना खुद का अंदाज़ लाना चाहते थे और साथ ही उन सभी चीज़ों का जश्न मनाना चाहते थे, जिन्होंने इसे इतना मशहूर बनाया। और रेमो सर का हमारे लिए इसे कोरियोग्राफ करना, इसने इसे और भी खास बना दिया। मुझे सच में उम्मीद है कि लोगों को यह उतना ही पसंद आएगा जितना हमें इसे बनाने में मज़ा आया।”

रचित सिंह ने आगे कहा, “यह मेरा पहला कमर्शियल प्रोमो हिंदी गाना है, और सच कहूं तो, मुझे हर दिन खुद को यकीन दिलाना पड़ता है कि यह सच में हो रहा है। यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी है, उम्मीद है सब अच्छा होगा। लेकिन मैं बहुत खुश हूं कि मुझे हुमा के साथ यह करने का मौका मिला। हमारे बीच की एनर्जी बहुत नैचुरल थी, कभी ऐसा नहीं लगा कि हम काम कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह स्क्रीन पर भी दिखता है।”

इस नए वर्शन की कोरियोग्राफ़ी फ़िल्ममेकर और कोरियोग्राफ़र रेमो डिसूज़ा ने की है। उन्होंने ओरिजिनल गाने की आत्मा को बनाए रखते हुए इसे एक नया, मॉडर्न लुक देने की कोशिश की है। गाने की कोरियोग्राफ़ी के बारे में बात करते हुए रेमो डिसूज़ा ने कहा, “जब साकिब मेरे पास आए और कहा कि वह अपनी फ़िल्म के लिए ‘इश्क़ कमीना’ को फिर से बनाना चाहते हैं, तो हमने बैठकर इस बात पर काम किया कि कैसे वही एहसास भी मिले और ओरिजिनल गाने का मज़ा भी बना रहे। जब आप किसी कल्ट गाने को फिर से बनाते हैं, तो सबसे बड़ी चुनौती पुरानी यादों और नएपन के बीच सही तालमेल बिठाना होती है। हम चाहते थे कि यह वर्शन मॉडर्न लगे, लेकिन साथ ही उस भावना को भी बनाए रखे जिसने ओरिजिनल गाने को इतना यादगार बनाया था। हुमा ने डांस फ़्लोर पर ज़बरदस्त एनर्जी दिखाई, और हमने मिलकर कुछ ऐसा बनाया है जिसे देखकर दर्शकों को बहुत मज़ा आएगा।”

प्रोड्यूसर साकिब सलीम ने कहा कि मशहूर गाने को फिर से बनाना, फिल्म की असली पहचान को बनाए रखते हुए उसे ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने का एक तरीका था। प्रोड्यूसर साकिब सलीम ने कहा, ” ‘इश्क कमीना’ गाने को फिर से बनाने का मकसद ‘बेबी डू डाई डू’ को ज़्यादा लोगों तक पहुंचाना था, साथ ही उन लोगों को भी जोड़े रखना था जिनके लिए यह फिल्म बनी है। मुझे बहुत खुशी है कि वीडियो में ये दोनों दुनियाएँ कितनी अच्छी तरह से मिल गई हैं। और हुमा और रचित ने जिस तरह से इसमें जान डाली है, उससे बेहतर की मैं उम्मीद नहीं कर सकता था। कुमार जी, हमारे म्यूज़िक पार्टनर ‘टिप्स’ और रेमो सर का बहुत-बहुत शुक्रिया कि उन्होंने हमारी जैसी इंडिपेंडेंट फिल्म के लिए यह मुमकिन किया।”

‘बेबी डू डाई डू’ के डायरेक्टर नचिकेत सामंत हैं और इसे ‘पुणे 04 फिल्म’ के साथ मिलकर ‘सलीम सिब्लिंग्स’ बैनर के तहत साकिब सलीम ने प्रोड्यूस किया है। फिल्म में सिकंदर खेर, चंकी पांडे, रचित सिंह, मरुधा शेखावत, विद्या मालवड़े, अरुण कुशवाहा और हिमांशु मलिक भी हैं। यह फिल्म 3 जुलाई, 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज़ होगी।

Sant Kabir: अनपढ़ थे कबीर, फिर कैसे डिगा दी बड़े-बड़े पंडितों की गद्दी? सिकंदर लोदी भी टेक चुका था घुटने!

A photograph of Saint Kabir Das- a great poet, social reformer, and spiritual thinker of the Indian saint tradition

Kabir Jayanti: कवि संत कबीर दास जी की जयंती हर साल ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इस साल यह शुभ तिथि 29 जून 2026 (सोमवार) को पड़ रही है। आज से सदियों पहले, जब समाज जात-पांत, छुआछूत, पाखंड और सांप्रदायिकता के दलदल में धंसा हुआ था, तब एक ऐसी आवाज़ उठी जिसने व्यवस्था की जड़ों को हिलाकर रख दिया। वह आवाज़ किसी राजा या बड़े पंडित की नहीं, बल्कि काशी के जुलाहे कबीर दास की थी। कबीर सिर्फ एक संत नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास के पहले ऐसे 'क्रांतिकारी' थे जिन्होंने धर्म के ठेकेदारों को सरेआम चुनौती दी।

 

आइए जानते हैं क्रांतिकारी संत कबीर की अनसुनी दास्तान…

 

लहरतारा से जुलाहे के घर तक का सफर

कहा जाता है कि काशी के लहरतारा तालाब में एक नवजात शिशु तैरता हुआ मिला था। नीरू और नीमा नाम के एक गरीब और वंचित मुस्लिम जुलाहा दंपत्ति ने उस बच्चे को अपनाया और नाम रखा- कबीर। कबीर ने खुद लिखा कि उन्होंने कभी कागज या कलम को हाथ नहीं लगाया, लेकिन समाज को देखकर उन्होंने जो कड़वे और प्रामाणिक अनुभव कहे, उन्हें सुनकर बड़ी-बड़ी पोथियां रटने वाले विद्वान भी बगलें झांकने लगे।

 

जब सिकंदर लोदी के सामने नहीं झुका कबीर का 'एटीट्यूड'

कबीर की खरी-खरी बातों से जब पंडितों और मौलवियों की 'दुकानें' बंद होने लगीं, तो दोनों ने मिलकर दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी से शिकायत कर दी। कबीर को दरबार में हाजिर किया गया और सुल्तान को सलाम करने को कहा गया।

 

कबीर का जवाब इतिहास में दर्ज हो गया- उन्होंने कहा:

 

'मैं सिर्फ उस एक परमात्मा को सलाम करता हूं जिसने ब्रह्मांड बनाया है, मिट्टी से बने किसी इंसान को नहीं।'

 

नाराज सुल्तान ने कबीर को हाथी के पैरों तले कुचलवाने और जंजीरों में बांधकर गंगा में डुबाने जैसे कई मृत्युदंड दिए, लेकिन कबीर हर बार चमत्कारिक रूप से बच निकले। अंततः सिकंदर लोदी को उनके अलौकिक व्यक्तित्व के आगे घुटने टेकने पड़े।

 

गुरु रामानंद को जब कबीर ने दिखाया आईना

कबीर स्वामी रामानंद से दीक्षा लेना चाहते थे, लेकिन जुलाहा होने के कारण उन्हें पात्र नहीं माना गया। एक दिन जब कबीर का स्पर्श स्वामी रामानंद से हुआ, तो उन्होंने खुद को अपवित्र मानकर दोबारा गंगा स्नान करने की बात कही।

 

तब कबीर ने भावुक होकर एक गहरी बात कही:

 

'गुरुदेव, आपकी पवित्रता मुझे पावन न कर सकी, लेकिन मेरी अपावनता ने आपको दोबारा नहाने पर मजबूर कर दिया? सुना था देवताओं के छूने से पापी तर जाते हैं, आज एक देवता इंसान के छूने से अपवित्र हो गया!' इस सत्य ने रामानंद जी की आंखें खोल दीं और उन्होंने कबीर को तुरंत गले लगा लिया।

 

पाखंड पर करारी चोट और 'मजहब-ए-इंसानियत'

कबीर ने धर्म के नाम पर होने वाले हर दिखावे की धज्जियां उड़ाईं। उन्होंने हिंदुओं की मूर्ति पूजा को आड़े हाथों लिया, तो मुसलमानों की हिंसात्मक प्रवृत्ति और मस्जिद की बांग पर भी सवाल उठाए। उनका एक ही मूलमंत्र था- 

 

'जाति-पांति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि को होई।'

 

स्वर्ग-नरक के अंधविश्वास को चुनौती: काशी छोड़ मगहर प्रस्थान

उस दौर में अंधविश्वास था कि काशी में मरने वाला सीधे स्वर्ग जाता है और मगहर में मरने वाला नरक। कबीर ने इस ढोंग को तोड़ने की ठानी। जीवन के आखिरी दिनों में उन्होंने अपने बेटे कमाल से कहा कि मुझे मगहर ले चलो। जब लोगों ने टोकते हुए कहा कि वहां तो नरक मिलेगा, तो कबीर हंसे और बोले-

 

'स्वर्ग और नरक केवल मन का भ्रम हैं। अगर मेरे कर्म पवित्र हैं, तो मैं मगहर में मरकर भी भगवान से अपना हक (स्वर्ग) छीन लूंगा।'

 

मौत के बाद भी एकता का संदेश: चादर उठाई तो मिले सिर्फ फूल!

कबीर ताउम्र हिंदू-मुस्लिम को एक करने में जुटे रहे और मौत के वक्त भी उन्होंने यही किया। जब मगहर में उन्होंने प्राण त्यागे, तो हिंदू उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे और मुस्लिम उन्हें दफनाना चाहते थे। दोनों आपस में लड़ने लगे।

 

लेकिन जैसे ही उनके शव से चादर हटाई गई, वहां कोई मृत शरीर नहीं था; वहां सिर्फ कुछ ताजे फूल बिखरे पड़े थे। दोनों धर्मों ने आधे-आधे फूल बांटे- हिंदुओं ने समाधि बनाई और मुसलमानों ने मज़ार। आज भी मगहर में ये दोनों अगल-बगल मौजूद हैं।

 

आज की सीख: कबीर आज भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका लिखा 'बीजक' और उनके दोहे आज भी समाज को आईना दिखा रहे हैं। उनका संदेश साफ था- धर्म दिल की कशिश और इंसानी भलाई में है, खोखले कर्मकांडों में नहीं।

 

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ट्रंप का सर्टिफिकेट, अब बाजार बनना तय

सोचें, डोनाल्ड ट्रंप पर। अमेरिका का कैसा मजाक बना डाला है। चाहे जो कर रहे हैं मगर लोकतंत्र के तकाजे में कोई कुछ भी नहीं कर सकता। ईरान ने अमेरिका को हैसियत दिखा दी है। मेरा मानना है कि साठ दिनों  बाद ईरान ही खाड़ी का मालिक होगा। दुनिया का संकट बना रहेगा। बावजूद इसके ट्रंप के झूठ, झांसे हॉट केक की तरह हैं। इसलिए भारत में भी उनका यह कहा अमृत वाक्य है कि नरेंद्र मोदी एक “टफ नेगोशिएटर” हैं। मोदी देखने में देवदूत जैसे लगते हैं और वे राजनीति में “किलर” हैं।

सवाल है क्यों ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह ‘चरित्र प्रमाणपत्र’ दिया? इसलिए क्योंकि दुनिया जानती है कि ज्योंहि प्रमाणपत्र मिलेगा त्योंहि मोदी और उनका मीडिया हिंदू भक्तों के बीच ट्रंपजी के कहे का घर-घर पहुंचा देगा। देखों हमारे भगवान को अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी देवदूत जैसा कहा!

ध्यान रहे, ट्रंप अपने आपको धूर्त, मास्टर सौदेबाज कहते हैं। उन्हे हर किसी को बेवकूफ बनाना आता है। वे प्रोपर्टी डीलर हैं। मिट्टी को भी सोने के भाव बेच सकते हैं। अमेरिका को जैसा अभी चूना लगा रहे हैं, वैसा एक भी राष्ट्रपति अमेरिकी इतिहास में नहीं हुआ है। ऐसे व्यापारी, सौदेबाज की पहली कला यह होती है कि सौदा करने से पहले सामने वाले को उसकी कीमत से थोड़ा ज्यादा महान महसूस करा दिया जाए।

ट्रंप ने आज ही लिखा है कि वे अपने आपको हिटलर, स्टालिन, माओं, सिकंदर आदि से बड़ा शक्तिमान मानते हैं। उन्हे भी इतिहास ऐसे ही याद करेगा। ट्रंप और नरेंद्र मोदी में फर्क यह है कि ट्रंप का लक्ष्य पृथ्वी के इतिहास का नंबर एक युगपुरुष होना है वही नरेंद्र मोदी को कलियुगी भारत का सबसे बड़ा देवता कहलाना है। एक की महानता का लेवल पृथ्वी का आधुनिक इतिहास है। वही दूसरे का कलियुगी हिंदुओं का नंबर एक भगवान बनना है। बारह साल, बारह युग! भारत में कभी चंद्रशेखर नाम के एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे। उनके चेलों ने चालीस दिन बनाम चालीस साल के ऐसे नारे बनाए थे कि देश भर के चिरकूट उनका  कीर्तन करते थे।

भटक गया हूं। असल मुद्दा है कि जल्द भारत का बाजार अमेरिकी का कैप्टिव बाजार होगा। ट्रंप अमेरिका से भारत को पशुओं की खुराक भिजवाएँगे तो सोयाबीन, मक्का से लेकर वे सामान भी आएंगे, जिससे भारत के विदेश व्यापार की कंगाली में आटा और गीला होगा। अब अमेरिका का बनवाया समझौता आसानी से लापतागंज में बिकेगा। 140 करोड़ ग्राहकों के बाजार में अमेरिका की उपस्थिति इसलिए बड़ी होनी है क्योंकि अमेरिका यह भी वचन ले रहा है कि इतने वर्षों में इतना अमेरिकी सामान भारत को खरीदना ही है। सोचें, एक के बाद एक मुक्त व्यापार समझौतों की बाढ़ में फंसता बाजार। यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, ओमान, न्यूजीलैंड, अमेरिका से व्यापार (खरीद) के सौदे ही सौदे तो वही चीन बिना सौदे के पहले से ही सबसे बड़ा विक्रेता।

पता है व्यापारिक घाटे में सबसे बड़ा घाटे वाला कौन सा देश है? भारत। यों नंबर एक पर अमेरिका है। मगर वह इसलिए है क्योंकि अमेरिकी इतने अमीर है कि उन्हे काले हाथ करके सामान बनाना पसंद नहीं। अमेरिकियों की कमाई के असल जरिए दूसरे हैं। वह डॉलर छापता है। दुनिया को पूंजी, तकनीक देता है। अब वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भी मालिक है जिससे उसे डालर मिलेगा तो भारत की आईटी, सेवा क्षेत्र की डालर कमाई भी लापता होनीं है।

Salman Khan: ‘बाबा सिद्दीकी की मौत के बाद सलमान खान मानसिक और शारीरिक रूप से टूट गए थे’, सिकंदर को-स्टार ने कहा- वह बहुत दर्द में थे

Salman Khan: बॉलीवुड एक्टर सलमान खान ने ‘सिकंदर’ की शूटिंग के दौरान अपनी ज़िंदगी के सबसे मुश्किल दौर का सामना किया है। अक्टूबर 2024 में, अपने करीबी दोस्त और नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या से वे बुरी तरह टूट गए थे। इस घटना ने फिल्म इंडस्ट्री में हलचल मचा दी थी और एक्टर की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गईं थी। साथ ही, सलमान पसली की दर्दनाक चोट से भी जूझ रहे थे और इसके बावजूद फिल्म की शूटिंग जारी रखे हुए थे।

उस समय को याद करते हुए, ‘सिकंदर’ में उनके साथ काम करने वाले विशाल वशिष्ठ ने ‘फ्री प्रेस जर्नल’ को दिए एक हालिया इंटरव्यू में बताया कि इमोशनल उथल-पुथल और शारीरिक तकलीफ के बावजूद, सलमान काम के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे और अपनी पर्सनल लाइफ में मुश्किल दौर से गुजरने के बावजूद शूटिंग जारी रखी।

विशाल ने याद किया कि कैसे सलमान ने बेहद मुश्किल हालात में ‘सिकंदर’ की शूटिंग की। उन्होंने कहा, “वह मानसिक और भावनात्मक रूप से पूरी तरह थक चुके थे, और शारीरिक रूप से भी उन्हें काफी तकलीफ हो रही थी। हमने खुद यह सब देखा। यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं थी, बल्कि हकीकत थी। वह धीरे-धीरे चलते थे और किसी तरह सीन पूरा करते थे। जैसे ही डायरेक्टर ‘कट’ बोलते, वह वापस जाकर फिजियोथेरेपी करवाते थे। उन्हें चलते-फिरते रहना जरूरी था क्योंकि उन्हें वे सभी एक्शन सीक्वेंस करने थे। उन्हें दर्द हो रहा था, फिर भी वह काम करते रहे। बाहर जान का खतरा बना हुआ था, लेकिन फिर भी वह काम पर आते रहे। यह बहुत मुश्किल था।”

एक्टर ने बताया कि अपनी पर्सनल ज़िंदगी में चल रही तमाम मुश्किलों के बावजूद सलमान रोज़ सेट पर आते रहे। उन्होंने कहा कि सलमान की इस बात का उन पर गहरा असर पड़ा। विशाल ने यह भी याद किया कि कैसे सपोर्टिंग एक्टर्स और क्रू अक्सर सेट या अपनी वैनिटी वैन में घंटों इंतज़ार करते थे, लेकिन हर कोई उस स्थिति को समझता था जिससे वह गुज़र रहे थे।

विशाल ने आगे बताया कि फ़िल्म के एक्शन सीन बाद के लिए रखे गए थे क्योंकि सलमान को ठीक होने के लिए समय चाहिए था। उन्होंने कहा, “आख़िरी दिन तक उनकी सेहत में थोड़ा सुधार हुआ था। उससे पहले, घर वाले सीन के दौरान उन्हें काफ़ी तकलीफ़ हो रही थी। तकलीफ़ का मतलब है कि कुर्सी से उठना और बैठना भी उनके लिए बहुत मुश्किल था। बैकग्राउंड में जो कुछ भी हो रहा था, उसे देखते हुए यह आसान नहीं रहा होगा। हर समय अपने आस-पास इतने सारे सिक्योरिटी गार्ड्स के बीच रहना ही दम घोंटने वाला होता है। यह बहुत मुश्किल स्थिति थी।”

अक्टूबर 2024 में, 66 साल के बाबा सिद्दीकी की मुंबई के बांद्रा ईस्ट में उनके बेटे जीशान सिद्दीकी के ऑफ़िस के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई। सीने में दो गोलियां लगने के बाद उन्हें लीलावती अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। बताया जाता है कि तीनों हमलावरों का संबंध लॉरेंस बिश्नोई गैंग से था। यह गैंग लंबे समय से सलमान खान को निशाना बनाता रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूछताछ के दौरान एक आरोपी ने बताया कि सलमान खान भी गैंग की ‘हिट लिस्ट’ में थे, लेकिन कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के कारण उन तक पहुंचना मुश्किल था। बाबा सिद्दीकी की मौत के बाद, सलमान को जान से मारने की नई धमकियां मिलीं और इसके बाद उन्हें Y+ सुरक्षा कवर दिया गया। इसी दौरान, एक्टर ने यह भी बताया कि वह पसली की चोट से जूझ रहे थे, जिसकी वजह से ‘सिकंदर’ की शूटिंग में देरी हुई।