
जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस की सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती फिलहाल विपक्ष नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर पनपता असंतोष बनता जा रहा है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के मंत्रिमंडल विस्तार ने जहां सरकार में नए चेहरों को जगह दी, वहीं कई वरिष्ठ विधायकों की नाराजगी भी खुलकर सामने आ गई। सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी के साथ पहले से जारी मतभेदों ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
मंगलवार को चार नए मंत्रियों को शामिल कर मंत्रिमंडल की संख्या अधिकतम नौ तक पहुंचा दी गई। लेकिन इस फेरबदल का राजनीतिक लाभ लेने के बजाय पार्टी को असंतोष संभालने की चुनौती मिल गई। वरिष्ठ विधायक मुबारक गुल को मंत्री नहीं बनाए जाने पर उनके समर्थकों ने श्रीनगर स्थित पार्टी मुख्यालय में प्रदर्शन किया। दक्षिण कश्मीर के विधायक अब्दुल मजीद लार्मी ने भी अपनी नाराजगी सार्वजनिक की। गुल को पार्टी महासचिव बनाकर मनाने की कोशिश हुई, लेकिन इससे असंतोष पूरी तरह थमता नहीं दिख रहा।
यह सच हे कि रुहुल्लाह का असंतोष इस संकट को और गंभीर बनाता है। अनुच्छेद 370 के मुद्दे और सरकार की कार्यशैली को लेकर उनके सवाल पार्टी नेतृत्व के लिए लगातार असहज स्थिति पैदा करते रहे हैं। अब मंत्रिमंडल से बाहर रह गए नेताओं की नाराजगी यदि व्यक्तिगत शिकायत से आगे बढ़कर सामूहिक बगावत में बदलती है, तो नेकां की संगठनात्मक पकड़ कमजोर हो सकती है।
भाजपा इस असंतोष का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने उन विधायकों को सार्वजनिक रूप से समर्थन देने की पेशकश की है जो खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इन विधायकों के “आंसू पोंछेगी।” ऐसे बयानों से साफ है कि भाजपा, नेशनल कांफ्रेंस के आंतरिक मतभेदों को एक राजनीतिक मौके में बदलना चाहती है। हालांकि, विधायकों के पाला बदलने की खबरों को अभी पक्की सच्चाई सामने नहीं आई है।
राजनीतिक पंडितों के बकौल, आने वाले हफ्ते नेतृत्व के लिए एक परीक्षा होंगे। उन्हें अलग-अलग महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना होगा, प्रतिनिधित्व को लेकर उठ रही चिंताओं को दूर करना होगा और अपने विधायकों का भरोसा बनाए रखना होगा। यह देखना अहम होगा कि क्या यह असंतोष आगे चलकर पार्टी छोड़ने (पाला बदलने) में बदलता है, या फिर यह सिर्फ एक आंतरिक विवाद बनकर रह जाता है। पार्टी की एकजुटता और सरकार की स्थिरता के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण होगा।


