Gajab Raat Review: हम काफी समय से नीरज पांडे की फिल्म जैसी थ्रिलर का इंतजार कर रहे थे। एक ऐसी फिल्म जो एक बहुत ही साधारण सी लगने वाली कहानी से आपको बांध ले और फिर हर नए खुलासे के साथ सस्पेंस को और गहरा करती जाए। रितेश शाह के निर्देशन में बनी फिल्म ‘गजब रात’ (जिसका पुराना नाम ‘घूसखोर पंडित’ था) बिल्कुल ऐसा ही अनुभव देती है।
नीरज पांडे द्वारा प्रोड्यूस की गई यह फिल्म एक बेहतरीन मिस्ट्री थ्रिलर है, जो सिर्फ एक रात में घटती है। कहानी तब शुरू होती है जब दिल्ली की सड़कों पर एक अनजान युवती लहूलुहान और बुरी तरह घायल हालत में मिलती है और एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी सरकारी तंत्र की खींचतान में फंस जाता है। मनोज बाजपेयी, नुसरत भरूचा, मेघना अग्रवाल, दिव्या दत्ता, अक्षय ओबेरॉय और अन्य कलाकारों से सजी यह फिल्म चालाकी से भरी है। इसमें बीच-बीच में कॉमेडी भी है। यह शुरू से अंत तक भरपूर मनोरंजन करती है।
फिल्म की कहानी
यह कहानी लगभग पूरी तरह से एक ही रात के दौरान घटती है। इसकी शुरुआत दिल्ली के कनॉट प्लेस के बीचों-बीच एक होटल में की गई छापेमारी से होती है। इस छापेमारी का नेतृत्व अजय निर्वित (मनोज बाजपेयी) करते हैं, जो एक कुख्यात और भ्रष्ट पुलिसकर्मी हैं। दिल्ली पुलिस उन्हें ‘गिरगिट’ (Chameleon) कहकर बुलाती है। उनके करियर में कई बार सस्पेंशन, डिमोशन और संदिग्ध आचरण देखने को मिले हैं। और हां, उन पर औरतों के पीछे भागने (womaniser होने) का भी आरोप है।
कहानी तब और भी गंभीर हो जाती है, जब फिल्म का सीन एक ऐसी महिला पर आता है, जिसे बेहोश कर दिया गया है और वह कार की पिछली सीट पर लेटी है, जबकि उसके बगल में एक आदमी बैठा है। आधी रात को दिल्ली की लगभग सुनसान सड़कों पर जब यह गाड़ी चुपके-चुपके आगे बढ़ रही होती है तो महिला को कुछ पल के लिए होश आता है। वह दरवाजा खोलती है और चलती कार से बाहर गिर जाती है।
इससे पहले कि वह आदमी या गाड़ी में मौजूद अन्य लोग उसे वापस पकड़ पाते, पास ही चल रही किसी फिल्म स्क्रीनिंग से अचानक लोगों की भीड़ बाहर निकल आती है। खून से लथपथ और मौत से जूझ रही उस महिला को देखकर, भीड़ उसके चारों ओर जमा हो जाती है। लोग तुरंत अपने फोन निकाल लेते हैं। तस्वीरें खींची जाती हैं, वीडियो रिकॉर्ड किए जाते हैं और कुछ ही मिनटों में यह फुटेज सोशल मीडिया पर फैलने लगता है। यह घटना पूरे देश में वायरल हो जाती है, जिससे दिल्ली पुलिस को तुरंत स्थिति को संभालने (डैमेज-कंट्रोल) के लिए हरकत में आना पड़ता है।
होटल में की गई छापेमारी से बाहर निकलते ही, निर्वित को पुलिस स्टेशन से अपने एक भ्रष्ट सीनियर का फोन आता है, जो अपराध में उसका पुराना साथी भी है। वह निर्वित से उस जगह पर जाने को कहता है, जहां महिला कार से गिरी थी। साथ ही वह बड़ी सहजता से यह भी कहता है कि यह मामला निर्वित के लिए एक ऐसा मौका हो सकता है, जिससे वह इतने पैसे कमा ले कि सूरजकुंड में अपना मनपसंद घर खरीद सके।
घटनास्थल पर अजय बुरी तरह घायल और मरणासन्न हालत में पड़ी महिला को अस्पताल ले जाता है और उसकी पहचान पता करने की कोशिश शुरू कर देता है। उसी समय समाज सेविका नेहा प्रभु (जिसका किरदार श्रद्धा दास ने निभाया है) वहां पहुंचती है और जांच में शामिल होने की जिद करती है।
जैसे दो अलग-अलग पक्षों का होना ही काफी नहीं था, तभी एक तीसरा व्यक्ति भी मैदान में आ जाता है। अक्षय ओबेरॉय द्वारा निभाया गया नवीन मधोक किरदार। वह खुद को CBI का अधिकारी बताकर वहां पहुंचता है। यह वही आदमी है जो चलती गाड़ी से महिला के गिरने से कुछ पल पहले उसके बगल में बैठा था। मधोक निर्वित को बताता है कि घायल महिला नतालिया वाडोगोवा नाम की एक रूसी नागरिक है और दावा करता है कि वह एक ड्रग लॉर्ड से जुड़ी जासूस है। वह अजय से यह केस उसे सौंपने के लिए कहता है।
अजय, जो अपनी जिद पर अड़ा रहने वाला इंसान है और शायद स्वभाव से ही किसी ऐसे व्यक्ति पर शक करता है जो उससे केस का कंट्रोल छीनने की कोशिश करे, वह ऐसा करने से मना कर देता है।
‘गजब रात’ की कहानी इसी छोटे से लगने वाले घटनाक्रम से आगे बढ़ती है। इसमें एक ऐसे अधिकारी की कहानी दिखाई गई है, जिसके नैतिक उसूल काफी संदिग्ध हैं। वह सिस्टम की गहरी सड़ांध के नीचे दबी एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश करने की कोशिश करता है। एंड में निर्वित खुद को बचाने का रास्ता चुनता है, अपना फायदा देखता है, या फिर सही काम करता है—यह फैसला फिल्म दर्शकों पर छोड़ देती है।
फिल्म का निर्देशन
दिलचस्प बात यह है कि रितेश शाह ने नीरज पांडे की फिल्म ने कुछ जाना-पहचाना जॉनर को लिया है और उन्हें अपनी कहानी में इस तरह पिरोया है कि फिल्म सिर्फ उनकी नकल बनकर नहीं रह जाती। इसमें अफसरशाही के दांव-पेच हैं, ऐसे अधिकारी हैं, जिनके नैतिक उसूल हालात के हिसाब से बदल जाते हैं, अलग-अलग दफ्तरों के बीच तेजी से होती हलचल है, तनावपूर्ण पलों के बीच छिपे तीखे मजाक हैं। एक ऐसा अहसास है कि हर किरदार जितना बता रहा है, उससे कहीं ज्यादा जानता है। शाह ने इन जानी-पहचानी चीज़ों को अपनी समझ के साथ मिलाया है, जिससे एक आम सी लगने वाली मिस्ट्री फिल्म को एक अलग पहचान मिलती है और इसकी गहराई भी बनी रहती है।
विज़ुअल के मामले में भी ‘गजब रात’ एक बेहतरीन काम है। कई सीन्स को बहुत खूबसूरती से फिल्माया गया है। भले ही फिल्म का ज्यादातर हिस्सा रात के समय का है, फिर भी स्क्रीन पर सब कुछ साफ और अच्छी तरह से दिखता है। यह सुनने में एक मामूली बात लग सकती है, लेकिन इस तरह की फिल्मों में यह बहुत मायने रखती है, जहां अक्सर ‘डार्क’ सिनेमैटोग्राफी का मतलब सचमुच का अंधेरा हो जाता है और दर्शकों को ‘माहौल’ बनाने के नाम पर स्क्रीन को घूरने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यहां रात के सीन्स के रंग-ढंग कहानी के रहस्य को और बढ़ाते हैं, बिना कुछ छिपाए।
फिल्म का स्क्रीनप्ले
इसकी स्क्रीनप्ले को बहुत ही बारीकी और सफाई से लिखा गया है। भले ही कहानी कभी-कभी घिसे-पिटे फॉर्मूलों के करीब पहुंचती है, लेकिन इसे जिस तरह से पेश किया गया है वह दर्शकों को बांधे रखता है। फिल्म में कोई भी सीन इतना लंबा नहीं खिंचता कि वह उबाऊ लगने लगे। जानकारी को बहुत सोच-समझकर धीरे-धीरे सामने लाया जाता है, बातचीत के पीछे अक्सर कोई छिपा हुआ मकसद होता है और हर नया घटनाक्रम किरदारों के बारे में हमारी समझ को थोड़ा बदल देता है।
एक्टर्स का काम
अभिनय की बात करें तो मनोज बाजपेयी ने हमेशा की तरह ‘अजय निर्वित’ के किरदार को बहुत बारीकी और गहराई से निभाया है। उन्होंने पिछले कुछ सालों में कई बार पुलिस वाले का रोल किया है, लेकिन यहां उनके काम करने के तरीके में इतना नयापन है कि यह किरदार बिल्कुल भी पुराना या दोहराया हुआ नहीं लगता। वे निर्वित की चालाकी और भ्रष्टाचार को उतनी ही खूबी से दिखाते हैं, जितनी खूबी से वे उसके दयालु और संवेदनशील पहलू को सामने लाते हैं। उनकी एक तिरछी नजर, एक थका हुआ ठहराव या आवाज में अचानक आया बदलाव ही यह बताने के लिए काफी होता है कि अजय का कौन सा रूप इस समय सामने आया है।
एक और बेहतरीन परफॉरमेंस नुसरत भरूचा की है, जिन्होंने ‘रोजी’ का किरदार निभाया है। वह एक एस्कॉर्ट है जिसे होटल में हुई रेड के दौरान पकड़ा जाता है, लेकिन अजय उसे इस शर्त पर छोड़ देता है कि वह रात में उससे दोबारा मिल सकेगी। दिलचस्प बात यह है कि मुख्य रहस्य (मिस्ट्री) से रोजी का कोई सीधा लेना-देना नहीं है, फिर भी अजय के साथ उसकी बातचीत फिल्म के सबसे मजेदार हिस्सों में से एक बन जाती है।
दिव्या दत्ता का भी विशेष जिक्र होना चाहिए, जिन्होंने एक बार फिर ऐसे किरदार को अपनाया है जो उनकी आम छवि से बिल्कुल अलग है और उन्होंने इसे पूरी तरह से अपना बना लिया है। श्रद्धा दास, मेघना अग्रवाल, धीरू भोजवानी, सत्येन चतुर्वेदी, अक्षय ओबेरॉय, आलोक पांडे, कीकू शारदा, लीना शर्मा और बाकी सभी कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को बहुत अच्छे से निभाया है।
‘गजब रात’ यह समझती है कि एक बेहतरीन थ्रिलर के लिए हमेशा किसी बहुत बड़ी साजिश की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी बस एक धुंधली रात, एक घायल अजनबी, कुछ ऐसे लोग जिनकी अपनी मजबूरियां या राज हैं और ऐसे परस्पर विरोधी हित काफी होते हैं, जो सच को किसी प्रतिबंधित वस्तु जैसा बना देते हैं। हो सकता है कि हर मोड़ आपको चौंका न दे या हर घटना एकदम नई न लगे, लेकिन फिल्म को यह बखूबी पता है कि कहानी की रफ्तार कैसे बनाए रखनी है। सुबह होने तक ‘गजब रात’ अपनी बात बहुत असरदार ढंग से कह देती है—एक ऐसे सिस्टम में जहां लगभग हर किसी की एक कीमत है, असली रहस्य यह नहीं है कि कौन भ्रष्ट है, बल्कि यह है कि किसे अभी भी याद है कि लक्ष्मण रेखा कहां खींचनी है। फिल्म को हम 3.5 रोटिंग देते हैं।

