Donald Trump: ‘मुझे हराने और इस्तीफा दिलाने के लिए साजिश रची, 22 करोड़ अमेरिकी वोटर का डेटा चुराया’, डोनाल्ड ट्रंप ने चीन पर लगाए गंभीर आरोप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस से राष्ट्र के नाम संबोधन में चीन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि चीन ने 2020 के अमेरिका राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें हराने के लिए बड़ी साजिश रची थी। ट्रंप ने दावा किया कि चीन ने इतिहास का सबसे बड़ा डेटा उल्लंघन किया

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ट्रम्प का चुनावों पर राष्ट्र के नाम संबोधन शुरू:दावा- विदेशी दखल पर खुलासा करेंगे, ईरान-इकोनॉमी पर भी बोल सकते हैं

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चुनाव सुरक्षा पर राष्ट्र को संबोधित कर रहे हैं। व्हाइट हाउस के अनुसार, उनके भाषण का मुख्य फोकस अमेरिकी चुनावों में विदेशी दखल की कोशिशों पर है। ट्रम्प ईरान और अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी सरकार का पक्ष रख सकते हैं। व्हाइट हाउस प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने दावा किया है कि ट्रम्प अपने संबोधन में ऐसे दस्तावेज और निष्कर्ष पेश करेंगे, जो “लोगों को चौंका देंगे।” ट्रम्प प्रशासन चीन और अमेरिकी चुनावों से जुड़े कुछ दस्तावेज सार्वजनिक करने पर भी विचार कर रहा है। ट्रम्प लंबे समय से 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में धांधली और विदेशी दखल के आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों, राज्यों की ऑडिट रिपोर्ट और अदालतों को अब तक वोटिंग या मतगणना में किसी विदेशी छेड़छाड़ का सबूत नहीं मिला है। ऐसे में माना जा रहा है कि ट्रम्प अपने संबोधन में एक बार फिर इन मुद्दों को प्रमुखता से उठा सकते हैं। ट्रम्प के इस संबोधन पर इसलिए भी नजर रहेगी क्योंकि हाल के दिनों में उन्होंने चुनावी सुरक्षा, ईरान और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर लगातार आक्रामक रुख अपनाया है। विदेशी दखल की कोशिश, वोटों में छेड़छाड़ का सबूत नहीं न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस, ईरान समेत कई देशों ने सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार, साइबर हमलों और हैक-लीक अभियानों के जरिए अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की। हालांकि, किसी भी जांच में यह साबित नहीं हुआ कि इन कोशिशों से वोटिंग, मतगणना या चुनावी नतीजों में कोई छेड़छाड़ हुई। अमेरिकी अधिकारियों और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशी नेटवर्क लंबे समय से सोशल मीडिया के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन इन अभियानों का मतदाताओं के फैसलों पर कितना असर पड़ा, इसका कोई ठोस आकलन अब तक सामने नहीं आया है। ट्रम्प के संबोधन से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए….

कनाडा सरकार का पंजाबियों को झटका:PR होने पर भी पेरेंट्स, दादा-दादी को साथ नहीं बसा पाएंगे; अब सिर्फ सुपर वीजा का सहारा

कनाडा में रह रहे लाखों भारतीयों, खासकर पंजाबी समुदाय को बड़ा झटका लगा है। कनाडा सरकार ने 15 जुलाई 2026 से पेरेंट्स एंड ग्रैंडपेरेंट्स प्रोग्राम (PGP) के तहत नई स्पॉन्सरशिप अर्जियाें पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। इससे अब कनाडा में PR हासिल कर चुके नए आवेदक अपने माता-पिता और दादा-दादी को स्थायी निवास (PR) दिलाने के लिए आवेदन नहीं कर सकेंगे। हालांकि, 15 जुलाई या उससे पहले जमा किए गए आवेदनों की प्रोसेसिंग पहले की तरह जारी रहेगी। इसका सबसे ज्यादा असर पंजाब पर पड़ेगा, क्योंकि कनाडा में बसे भारतीयों में बड़ी हिस्सेदारी पंजाबियों की है। दोआबा और मालवा के हजारों परिवारों के सदस्य कनाडा में रहते हैं और PGP उनके लिए माता-पिता को स्थायी रूप से साथ बसाने का सबसे बड़ा माध्यम रहा है। 4 पॉइंट में समझिए पूरा फैसला क्यों लिया गया फैसला
IRCC के मुताबिक PGP में आवेदन की मांग लगातार उपलब्ध जगहोंसे ज्यादा रही है। इससे हजारों आवेदन वर्षों से लंबित हैं। विभाग का कहना है कि नई स्पॉन्सरशिप पर रोक लगाने का उद्देश्य मौजूदा बैकलॉग कम करना, प्रोसेसिंग तेज करना और इमिग्रेशन सिस्टम को व्यवस्थित रखना है। सरकार ने 2026-2028 इमिग्रेशन लेवल प्लान के तहत 2026 में 15 हजार पेरेंट्स-ग्रैंडपेरेंट्स आवेदनों को स्थायी निवास (PR) देने का लक्ष्य रखा है। पंजाबियों पर सबसे ज्यादा असर क्यों
कनाडा में पढ़ाई और रोजगार के लिए सबसे ज्यादा जाने वालों में पंजाबियों की बड़ी हिस्सेदारी रही है। बड़ी संख्या में लोग PR मिलने के बाद अपने माता-पिता और दादा-दादी को PGP के जरिए स्थायी रूप से बुलाने की योजना बनाते थे। इस फैसले के बाद 3 बड़े असर हो गए हैं। पहला- हजारों परिवारों की फैमिली सेटलमेंट योजना फिलहाल रुक गई। दूसरा- नए आवेदकों के लिए PR स्पॉन्सरशिप का रास्ता बंद हो गया। तीसरा- अब परिवारों को सुपर वीजा पर ही निर्भर रहना होगा। इस फैसले के बाद अब क्या विकल्प बचा?
इसका जवाब है सुपर वीजा, एक बार में 5 साल तक कनाडा में रह सकते हैं। वीजा 10 साल तक वैध रहता है। इसमें मल्टीपल एंट्री की सुविधा मिलती है। जरूरत पड़ने पर कनाडा में रहते हुए रहने की अवधि बढ़ाने यानी एक्सटेंशन के लिए आवेदन किया जा सकता है। इससे PR नहीं मिलता, बल्कि लंबे समय तक रहने की अनुमति मिलती है। इस फैसले से किन लोगों को राहत?
15 जुलाई 2026 या उससे पहले आवेदन कर चुके लोगों को राहत दी गई है। पहले से प्रोसेसिंग में चल रहे सभी आवेदन जारी रहेंगे। कनाडा सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन आवेदनों को रद्द नहीं किया जाएगा। कनाडा में पंजाबी समुदाय करीब साढ़े 9 लाख
2021 की जनगणना के अनुसार पंजाबी मूल के 9.42 लाख लोग कनाडा में रहते थे। यह कनाडा की कुल आबादी का करीब 2.6% है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीयों, खासकर पंजाबियों का कनाडा पलायन तेजी से बढ़ा है। दोआबा और मालवा के हजारों परिवारों के सदस्य कनाडा में बसे हुए हैं, इसलिए इस फैसले का असर पंजाब में व्यापक रूप से महसूस किया जाएगा। पंजाबियों के लिए क्यों अहम है फैसला?
फैमिली रीयूनिफिकेशन कनाडा की इमिग्रेशन नीति का अहम हिस्सा है। PGP पर रोक से हजारों भारतीय और पंजाबी परिवारों की फैमिली सेटलमेंट योजना प्रभावित होगी। फिलहाल माता-पिता और दादा-दादी को लंबे समय के लिए कनाडा बुलाने का सबसे बड़ा कानूनी विकल्प सुपर वीजा ही है। एक्सपर्ट बोले- स्थायी तौर पर बंद नहीं
इमिग्रेशन एजुकेशन कंसलटेंट राजवीर चहल का कहना है कि यह PGP प्रोग्राम की स्थायी समाप्ति नहीं है। अगर भविष्य में लंबित आवेदनों का बैकलॉग कम होता है और कनाडा सरकार इमिग्रेशन लक्ष्य बढ़ाती है तो नई स्पॉन्सरशिप प्रक्रिया दोबारा शुरू की जा सकती है। फिलहाल IRCC ने इसे लेकर कोई समयसीमा तय नहीं की है।

बांग्लादेश ने भारत की जगह चीन को सौंपा तीस्ता प्रोजेक्ट:बदले में ₹7 हजार करोड़ का सॉफ्ट लोन; भारत ने ₹9 हजार करोड़ का ऑफर दिया था

बांग्लादेश और चीन के संबंधों में ‘चीनी’ कुछ ज्यादा ही घुलने लगी है। बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने तीस्ता नदी प्रोजेक्ट में भारत के इन्वेस्टमेंट ऑफर को ना कर इसे चीन को सौंप दिया है। चीन लगभग 9 हजार करोड़ रुपए के तीस्ता रिवर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट (TRMP) में ₹7 हजार करोड़ सॉफ्ट लोन के रूप में देगा। बांग्लादेश को इसे 50 साल में चुकाना होगा। जबकि भारत ने चीन को बाहर रखने के लिए 2024 में तत्कालीन शेख हसीना सरकार को 9 हजार करोड़ का प्रस्ताव भेजा था। हालांकि हसीना सरकार के पतन के बाद मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने इस पर कोई फैसला नहीं किया। अब रहमान सरकार ने चीन की सरकारी कंपनी पावर चाइना से समझौता किया है। इस जीटूजी एग्रीमेंट के तहत चीन के इंजीनियरों का दल पिछले हफ्ते ही बांग्लादेश आया था। लगभग 50 इंजीनियरों और टेक्नीकल स्टाफ ने तीस्ता कैचमेंट एरिया का सर्वे किया। इस मानसून में तीस्ता नदी का सर्वे करेगा चीन सूत्रों के अनुसार इस मानसून के दौरान चीन का दल तीस्ता नदी के फ्लो का आकलन कर बांध, जेट्‌टी और अन्य निर्माण कार्यों का प्लान तैयार करेगा। साथ ही इस सीजन में तीस्ता कैचमेंट एरिया में सिल्ट (तलछट) की सफाई में भी चीन ने सहयोग का वादा किया है। बांग्लादेश की मांग थी कि तीस्ता के रन ऑफ (अतिरिक्त बहाव) को चीन इसी मानसून में रोके। जिससे कि अगले साल से प्रस्तावित प्रोजेक्ट के निर्माण से पहले ही बांग्लादेश तीस्ता नदी के पानी का खरीफ ​की बुआई के लिए ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर सके। चीन सेना के इंजीनियर भी प्रोजेक्ट कंपनी में 1. पूर्वोत्तर का एंट्री पॉइंट: परियोजना क्षेत्र (नीलफामारी और रंगपुर) भारतीय सीमा से 10-12 किमी जबकि सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) से 22 किमी दूर है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की मुख्य भूमि को पूर्वोत्तर के 7 राज्यों को जोड़ता है। पूर्वोत्तर के एंट्री पॉइंट के लिए खतरा हो सकता है। 2. पावर चाइना कंपनी सेना से जुड़ी: पावर चाइना स्वतंत्र व्यावसायिक कंपनी नहीं, बल्कि चीन की सैन्य-नागरिक फ्यूजन नीति से गहराई से जुड़ी सरकारी कंपनी है। ये कंपनी एशिया और अफ्रीका में कई मल्टी पर्पज प्रोजेक्ट्स काे चला रही है। कंपनी में चीन सेना की इंजीनियरिंग काेर के भी लाेग होते हैं। 3. दो-मोर्चों पर चुनौती: सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता है कि सैकड़ों चीनी इंजीनियरों और तकनीशियनों की भारत की पूर्वोत्तर की संवेदनशील सीमा पर लंबे समय तक मौजूदगी भारत के लिए बड़ी चुनौती होगी। भारत के पूर्वी मोर्चे पर चीन अपनी पैठ को और बढ़ाने में जुट सकता है। बड़ी डिफेंस डील की तैयारी, चीन फाइटर जेट देगा सूत्रों के अनुसार पीएम तारिक रहमान के रक्षा सलाहकार ब्रिगेडियर जनरल शमशुल इस्लाम ने हाल में चीन के राजदूत के साथ मुलाकात की थी। इसमें बांग्लादेश को चीन के साथ जे सीरीज फाइटर जेट्स देने पर चर्चा हुई। बताया जाता है कि चीन अक्टूबर में 12 जेट्स की पहली खेप देने वाला है। ————————- भारत-बांग्लादेश से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… बांग्लादेश ने भारत से छीनकर चीन को दिया मोंगला पोर्ट; सिर्फ 80 किमी दूर बैठेगा चीन, ये कितनी बड़ी चिंता 22 से 26 जून 2026 तक बांग्लादेशी पीएम तारिक रहमान चीन में थे। इसी दौरान बांग्लादेश ने अपने मोंगला पोर्ट का प्रोजेक्ट भारत से छीनकर चीन को दे दिया। यानी हमारे तट से महज 80 किमी दूर मोंगला पोर्ट पर चीन बैठेगा। पूरी खबर पढ़ें…

बांग्लादेश ने भारत की जगह चीन को सौंपा तीस्ता प्रोजेक्ट:बदले में ₹7 हजार करोड़ का सॉफ्ट लोन; भारत ने ₹9 हजार करोड़ का ऑफर दिया था

बांग्लादेश और चीन के संबंधों में ‘चीनी’ कुछ ज्यादा ही घुलने लगी है। बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने तीस्ता नदी प्रोजेक्ट में भारत के इन्वेस्टमेंट ऑफर को ना कर इसे चीन को सौंप दिया है। चीन लगभग 9 हजार करोड़ रुपए के तीस्ता रिवर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट (TRMP) में ₹7 हजार करोड़ सॉफ्ट लोन के रूप में देगा। बांग्लादेश को इसे 50 साल में चुकाना होगा। जबकि भारत ने चीन को बाहर रखने के लिए 2024 में तत्कालीन शेख हसीना सरकार को 9 हजार करोड़ का प्रस्ताव भेजा था। हालांकि हसीना सरकार के पतन के बाद मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने इस पर कोई फैसला नहीं किया। अब रहमान सरकार ने चीन की सरकारी कंपनी पावर चाइना से समझौता किया है। इस जीटूजी एग्रीमेंट के तहत चीन के इंजीनियरों का दल पिछले हफ्ते ही बांग्लादेश आया था। लगभग 50 इंजीनियरों और टेक्नीकल स्टाफ ने तीस्ता कैचमेंट एरिया का सर्वे किया। इस मानसून में तीस्ता नदी का सर्वे करेगा चीन सूत्रों के अनुसार इस मानसून के दौरान चीन का दल तीस्ता नदी के फ्लो का आकलन कर बांध, जेट्‌टी और अन्य निर्माण कार्यों का प्लान तैयार करेगा। साथ ही इस सीजन में तीस्ता कैचमेंट एरिया में सिल्ट (तलछट) की सफाई में भी चीन ने सहयोग का वादा किया है। बांग्लादेश की मांग थी कि तीस्ता के रन ऑफ (अतिरिक्त बहाव) को चीन इसी मानसून में रोके। जिससे कि अगले साल से प्रस्तावित प्रोजेक्ट के निर्माण से पहले ही बांग्लादेश तीस्ता नदी के पानी का खरीफ ​की बुआई के लिए ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर सके। चीन सेना के इंजीनियर भी प्रोजेक्ट कंपनी में 1. पूर्वोत्तर का एंट्री पॉइंट: परियोजना क्षेत्र (नीलफामारी और रंगपुर) भारतीय सीमा से 10-12 किमी जबकि सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) से 22 किमी दूर है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की मुख्य भूमि को पूर्वोत्तर के 7 राज्यों को जोड़ता है। पूर्वोत्तर के एंट्री पॉइंट के लिए खतरा हो सकता है। 2. पावर चाइना कंपनी सेना से जुड़ी: पावर चाइना स्वतंत्र व्यावसायिक कंपनी नहीं, बल्कि चीन की सैन्य-नागरिक फ्यूजन नीति से गहराई से जुड़ी सरकारी कंपनी है। ये कंपनी एशिया और अफ्रीका में कई मल्टी पर्पज प्रोजेक्ट्स काे चला रही है। कंपनी में चीन सेना की इंजीनियरिंग काेर के भी लाेग होते हैं। 3. दो-मोर्चों पर चुनौती: सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता है कि सैकड़ों चीनी इंजीनियरों और तकनीशियनों की भारत की पूर्वोत्तर की संवेदनशील सीमा पर लंबे समय तक मौजूदगी भारत के लिए बड़ी चुनौती होगी। भारत के पूर्वी मोर्चे पर चीन अपनी पैठ को और बढ़ाने में जुट सकता है। बड़ी डिफेंस डील की तैयारी, चीन फाइटर जेट देगा सूत्रों के अनुसार पीएम तारिक रहमान के रक्षा सलाहकार ब्रिगेडियर जनरल शमशुल इस्लाम ने हाल में चीन के राजदूत के साथ मुलाकात की थी। इसमें बांग्लादेश को चीन के साथ जे सीरीज फाइटर जेट्स देने पर चर्चा हुई। बताया जाता है कि चीन अक्टूबर में 12 जेट्स की पहली खेप देने वाला है। ————————- भारत-बांग्लादेश से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… बांग्लादेश ने भारत से छीनकर चीन को दिया मोंगला पोर्ट; सिर्फ 80 किमी दूर बैठेगा चीन, ये कितनी बड़ी चिंता 22 से 26 जून 2026 तक बांग्लादेशी पीएम तारिक रहमान चीन में थे। इसी दौरान बांग्लादेश ने अपने मोंगला पोर्ट का प्रोजेक्ट भारत से छीनकर चीन को दे दिया। यानी हमारे तट से महज 80 किमी दूर मोंगला पोर्ट पर चीन बैठेगा। पूरी खबर पढ़ें…

विश्व कप मैच के बाद फॉकलैंड पर फिर भिड़े अर्जेंटीना-ब्रिटेन:ब्रिटिश वॉरशिप के समुद्री इलाके में घुसने का आरोप; खिलाड़ियों के बैनर से विवाद बढ़ा

फीफा विश्व कप 2026 के सेमीफाइनल में इंग्लैंड को 2-1 से हराने के कुछ घंटों बाद अर्जेंटीना और ब्रिटेन के बीच फॉकलैंड द्वीप को लेकर नया विवाद शुरू हो गया। अर्जेंटीना ने आरोप लगाया कि ब्रिटेन की रॉयल नेवी का वॉरशिप HMS मेडवे बिना अनुमति उसके समुद्री क्षेत्र में घुस आया।

अर्जेंटीना ने इसे सैन्य घुसपैठ करार दिया। विदेश मंत्री पाब्लो क्विर्नो ने कहा कि इस मामले में ब्रिटिश दूतावास के सामने औपचारिक विरोध दर्ज कराया गया है। वहीं ब्रिटेन ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि यात्रा की जानकारी पहले ही अर्जेंटीना सरकार को दे दी गई थी और यह अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप थी। यह विवाद उस समय और बढ़ गया जब इंग्लैंड को हराकर फाइनल में पहुंचने के बाद अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने मैदान पर ‘लास माल्विनास सन अर्जेंटीना’ (माल्विनास अर्जेंटीना का है) लिखा बैनर लहराया। अर्जेंटीना में फॉकलैंड को माल्विनास कहा जाता है। इस घटना के बाद दोनों देशों का पुराना विवाद फिर चर्चा में आ गया। अर्जेंटीना की उपराष्ट्रपति ने इंग्लैंड को समुद्री लुटेरा कहा मैच से पहले अर्जेंटीना की उपराष्ट्रपति विक्टोरिया वियारुएल ने इंग्लैंड को आक्रमणकारी और कब्जा करने वाले समुद्री लुटेरे तक कहा था। मैच जीतने के बाद उन्होंने खिलाड़ियों की तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “फॉकलैंड अर्जेंटीना का है। हमें स्टेडियम में यह बैनर ले जाने से रोका गया, लेकिन वे भूल गए कि माल्विनास हमारे खून और हमारे दिल में बसता है।” ब्रिटेन ने नाराजगी जताई, कहा- खेल में राजनीति न हो वहीं, ब्रिटेन के बिजनेस सेक्रेटरी पीटर काइल ने खिलाड़ियों के बैनर को पूरी तरह अनुचित बताया। उन्होंने कहा कि फुटबॉल में राजनीति की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और फीफा को जांच करनी चाहिए कि कहीं खिलाड़ियों ने राजनीतिक संदेश देने संबंधी नियमों का उल्लंघन तो नहीं किया। उन्होंने कहा, “राजनीति को फुटबॉल से दूर रहना चाहिए। आगे क्या कार्रवाई होगी, इसका फैसला अब फीफा करेगा।” फॉकलैंड को लेकर अर्जेंटीना और ब्रिटेन में 44 साल से विवाद फॉकलैंड द्वीप का मामला ब्रिटेन और अर्जेंटीना दोनों के लिए बहुत बड़ा मुद्दा है। दोनों देश इस पर दावा करते हैं। अर्जेंटीना इस द्वीप को माल्विनास कहता है। फॉकलैंड दक्षिण अटलांटिक महासागर में स्थित हैं और अर्जेंटीना से सिर्फ 500 किमी दूर है। वहीं ब्रिटेन से यह 13,000 किमी दूर स्थित है। अर्जेंटीना ऐतिहासिक रूप से इस द्वीप को अपना बताता आया है। अर्जेंटीना का कहना है कि ये द्वीप उसके पास होने चाहिए, क्योंकि ये उसके इलाके के करीब हैं। वहीं ब्रिटेन कहता है कि वहां रहने वाले लोग खुद को ब्रिटिश मानते हैं और उन्होंने वोट करके भी ब्रिटेन के साथ रहने की इच्छा जताई है, इसलिए यह उसका क्षेत्र है। 1982 में अर्जेंटीना ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था, जिसके बाद ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने सेना भेजकर सिर्फ 10 हफ्ते में इन्हें वापस हासिल किया था। अर्जेंटीना के आत्मसमर्पण करने से पहले लगभग 650 अर्जेंटीनाई सैनिक और 255 ब्रिटिश सैनिक मारे गए थे। फॉकलैंड पर ब्रिटेन का रुख क्या है ब्रिटेन ने दोहराया कि फॉकलैंड द्वीप के लोगों ने कई बार जनमत के जरिए ब्रिटिश क्षेत्र बने रहने की इच्छा जताई है। डाउनिंग स्ट्रीट ने कहा- ब्रिटेन का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। फॉकलैंड द्वीप के लोग ब्रिटिश हैं और अपने भविष्य का फैसला करने का अधिकार उन्हीं के पास है।

बंगाल की खाड़ी में दो नावें डूबीं,500 मौतों की आशंका:ज्यादातर रोहिंग्या सवार थे, खराब मौसम की वजह से हादसा

म्यांमार में हिंसा से बचकर भाग रहे 500 से ज्यादा लोगों के समुद्र में लापता होने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र की दो एजेंसियों के मुताबिक, म्यांमार के तट के पास खराब मौसम में दो नावें गायब हो गईं। इनमें सवार ज्यादातर लोग रोहिंग्या समुदाय के थे। अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने संयुक्त बयान में बताया कि दोनों नावें जून के आखिर में म्यांमार के पश्चिमी रखाइन राज्य से रवाना हुई थीं। पहली नाव में करीब 250 लोग सवार थे। रवाना होने के कुछ ही समय बाद उससे संपर्क टूट गया। दूसरी नाव में करीब 280 यात्री सवार थे और माना जा रहा है कि वह 8 जुलाई को म्यांमार के अयेयारवाडी तट के पास डूब गई। रोहिंग्या लोगों के पास किसी देश की नागरिकता नहीं रोहिंग्या म्यांमार के रखाइन राज्य का एक मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय है। दशकों से यह समुदाय सरकारी उत्पीड़न, हिंसा और भेदभाव का सामना कर रहा है। म्यांमार की बौद्ध बहुसंख्यक सरकार और वहां के स्थानीय लोग रोहिंग्याओं को म्यांमार का मूल निवासी नहीं मानते। उनका दावा है कि ये लोग ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बांग्लादेश (तत्कालीन बंगाल) से आए अवैध अप्रवासी हैं। उन्हें आधिकारिक तौर पर ‘बंगाली’ कहकर पुकारा जाता है। रोहिंग्या समुदाय का कहना है कि वे रखाइन क्षेत्र में आठवीं सदी या उससे भी पहले से रह रहे हैं और वे वहीं के मूल निवासी हैं। साल 1982 में रोहिंग्याओं को नागरिकता देने से इनकार कर दिया गया। इसके कारण वे बिना किसी देश के नागरिक बन गए। उन्हें बुनियादी अधिकार जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, यात्रा और शादी करने तक की आजादी नहीं है। करीब 12 लाख रोहिंग्या फिलहाल बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। ये लोग म्यांमार की सेना की हिंसा से बचकर वहां पहुंचे थे। हाल के वर्षों में अमेरिका और अन्य देशों की विदेशी सहायता में कटौती के कारण इन शिविरों में खाद्य राशन भी कम कर दिया गया है। रोहिंग्या शरणार्थियों के पास सुरक्षित तरीके से म्यांमार लौटने का कोई रास्ता नहीं है। 2017 में म्यांमार की सेना पर रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा करने के आरोप लगे थे, जिसे कई देशों ने नरसंहार (जेनोसाइड) माना है। जो रोहिंग्या अब भी म्यांमार में रह रहे हैं, उन्हें कड़ी पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें से कई लोग नजरबंदी शिविरों में रहने को मजबूर हैं। मलेशिया पहुंचने के लिए उठा रहे जानलेवा जोखिम आमतौर पर रोहिंग्या इस मौसम में समुद्र के रास्ते यात्रा करने से बचते हैं, क्योंकि मानसून के दौरान समुद्र बेहद खतरनाक हो जाता है। हालांकि म्यांमार में हिंसा और बांग्लादेश के भीड़भाड़ वाले शरणार्थी शिविरों में खराब हालात के कारण रोहिंग्या समुदाय के लोग वर्षों से जर्जर लकड़ी की नावों में बैठकर मलेशिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों तक पहुंचने की कोशिश करते रहे हैं। खराब परिस्थितियों के कारण बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोग जर्जर नावों के जरिए मलेशिया पहुंचने की कोशिश करते हैं। इस दौरान हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें नवजात बच्चे, बच्चे और गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि कई बार स्थानीय समुद्री एजेंसियां संकट में फंसी नावों की मदद भी नहीं करतीं। दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री रास्तों में एक संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2025 में अंडमान सागर और बंगाल की खाड़ी में करीब 900 रोहिंग्या शरणार्थी मारे गए या लापता हो गए थे। यह दुनिया में शरणार्थियों और प्रवासियों के लिए सबसे खतरनाक समुद्री मार्ग माना जाता है। IOM और UNHCR ने कहा कि यह संभावित हादसा दिखाता है कि रोहिंग्या संकट का अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों की मदद बढ़ाने की अपील की। एजेंसियों ने कहा कि दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री मार्गों में से एक पर और लोगों की जान जाने से रोकने के लिए खोज एवं बचाव अभियान मजबूत करना, शरण देने की व्यवस्था बेहतर करना और मानव तस्करी के नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है। UNHCR के अनुसार, 2025 में 6,500 से ज्यादा रोहिंग्या समुद्र के रास्ते भागने की कोशिश कर रहे थे। इनमें से करीब 900 लोग मारे गए या लापता हो गए। यह रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए अब तक का सबसे घातक साल था और दुनिया के किसी भी प्रमुख शरणार्थी समुद्री मार्ग पर सबसे अधिक मृत्यु दर दर्ज की गई। भारत में कितने रोहिंग्या हैं? नोट: रोहिंग्याओं की संख्या को लेकर भारत सरकार और UNHCR के आंकड़े अलग-अलग हैं। UNHCR केवल अपने यहां पंजीकृत शरणार्थियों और शरण मांगने वालों की संख्या बताता है, जबकि भारत सरकार का अनुमान देश में मौजूद कुल रोहिंग्या आबादी पर आधारित है।

बंगाल की खाड़ी में दो नावें डूबीं,500 मौतों की आशंका:ज्यादातर रोहिंग्या सवार थे, खराब मौसम की वजह से हादसा

म्यांमार में हिंसा से बचकर भाग रहे 500 से ज्यादा लोगों के समुद्र में लापता होने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र की दो एजेंसियों के मुताबिक, म्यांमार के तट के पास खराब मौसम में दो नावें गायब हो गईं। इनमें सवार ज्यादातर लोग रोहिंग्या समुदाय के थे। अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने संयुक्त बयान में बताया कि दोनों नावें जून के आखिर में म्यांमार के पश्चिमी रखाइन राज्य से रवाना हुई थीं। पहली नाव में करीब 250 लोग सवार थे। रवाना होने के कुछ ही समय बाद उससे संपर्क टूट गया। दूसरी नाव में करीब 280 यात्री सवार थे और माना जा रहा है कि वह 8 जुलाई को म्यांमार के अयेयारवाडी तट के पास डूब गई। रोहिंग्या लोगों के पास किसी देश की नागरिकता नहीं रोहिंग्या म्यांमार के रखाइन राज्य का एक मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय है। दशकों से यह समुदाय सरकारी उत्पीड़न, हिंसा और भेदभाव का सामना कर रहा है। म्यांमार की बौद्ध बहुसंख्यक सरकार और वहां के स्थानीय लोग रोहिंग्याओं को म्यांमार का मूल निवासी नहीं मानते। उनका दावा है कि ये लोग ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बांग्लादेश (तत्कालीन बंगाल) से आए अवैध अप्रवासी हैं। उन्हें आधिकारिक तौर पर ‘बंगाली’ कहकर पुकारा जाता है। रोहिंग्या समुदाय का कहना है कि वे रखाइन क्षेत्र में आठवीं सदी या उससे भी पहले से रह रहे हैं और वे वहीं के मूल निवासी हैं। साल 1982 में रोहिंग्याओं को नागरिकता देने से इनकार कर दिया गया। इसके कारण वे बिना किसी देश के नागरिक बन गए। उन्हें बुनियादी अधिकार जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, यात्रा और शादी करने तक की आजादी नहीं है। करीब 12 लाख रोहिंग्या फिलहाल बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। ये लोग म्यांमार की सेना की हिंसा से बचकर वहां पहुंचे थे। हाल के वर्षों में अमेरिका और अन्य देशों की विदेशी सहायता में कटौती के कारण इन शिविरों में खाद्य राशन भी कम कर दिया गया है। रोहिंग्या शरणार्थियों के पास सुरक्षित तरीके से म्यांमार लौटने का कोई रास्ता नहीं है। 2017 में म्यांमार की सेना पर रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा करने के आरोप लगे थे, जिसे कई देशों ने नरसंहार (जेनोसाइड) माना है। जो रोहिंग्या अब भी म्यांमार में रह रहे हैं, उन्हें कड़ी पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें से कई लोग नजरबंदी शिविरों में रहने को मजबूर हैं। मलेशिया पहुंचने के लिए उठा रहे जानलेवा जोखिम आमतौर पर रोहिंग्या इस मौसम में समुद्र के रास्ते यात्रा करने से बचते हैं, क्योंकि मानसून के दौरान समुद्र बेहद खतरनाक हो जाता है। हालांकि म्यांमार में हिंसा और बांग्लादेश के भीड़भाड़ वाले शरणार्थी शिविरों में खराब हालात के कारण रोहिंग्या समुदाय के लोग वर्षों से जर्जर लकड़ी की नावों में बैठकर मलेशिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों तक पहुंचने की कोशिश करते रहे हैं। खराब परिस्थितियों के कारण बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोग जर्जर नावों के जरिए मलेशिया पहुंचने की कोशिश करते हैं। इस दौरान हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें नवजात बच्चे, बच्चे और गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि कई बार स्थानीय समुद्री एजेंसियां संकट में फंसी नावों की मदद भी नहीं करतीं। दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री रास्तों में एक संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2025 में अंडमान सागर और बंगाल की खाड़ी में करीब 900 रोहिंग्या शरणार्थी मारे गए या लापता हो गए थे। यह दुनिया में शरणार्थियों और प्रवासियों के लिए सबसे खतरनाक समुद्री मार्ग माना जाता है। IOM और UNHCR ने कहा कि यह संभावित हादसा दिखाता है कि रोहिंग्या संकट का अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों की मदद बढ़ाने की अपील की। एजेंसियों ने कहा कि दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री मार्गों में से एक पर और लोगों की जान जाने से रोकने के लिए खोज एवं बचाव अभियान मजबूत करना, शरण देने की व्यवस्था बेहतर करना और मानव तस्करी के नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है। UNHCR के अनुसार, 2025 में 6,500 से ज्यादा रोहिंग्या समुद्र के रास्ते भागने की कोशिश कर रहे थे। इनमें से करीब 900 लोग मारे गए या लापता हो गए। यह रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए अब तक का सबसे घातक साल था और दुनिया के किसी भी प्रमुख शरणार्थी समुद्री मार्ग पर सबसे अधिक मृत्यु दर दर्ज की गई।

Iran-US War: ईरान-अमेरिका युद्ध क्यों नहीं हो रहा खत्म? उप राष्ट्रपति जेडी वेंस का बड़ा आरोप, कहा- इजरायली सरकार के अंदर कुछ खास लोग…

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ कहा है कि इजरायल सरकार के कुछ लोग ईरान के साथ चल रहे संघर्ष को अनिश्चितकाल तक लंबा खींचना चाहते हैं। उन्होंने यह बात पॉडकास्टर जो रोगन के साथ हुए इंटरव्यू में कही।वेंस ने बताया कि इजरायल के कुछ तत्व अमेरिकी जनता की राय को प्रभावित करने की

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ड्रोन हमलों से रूस को पछाड़ने वाले रक्षामंत्री हटाए गए:जेलेंस्की के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतरे, इसी महीने प्रधानमंत्री को भी हटाया था

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रक्षा मंत्री मिखाइलो फेदोरोव को नियुक्ति के सिर्फ छह महीने बाद पद से हटा दिया। इस फैसले के बाद गुरुवार को युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार देश के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। राजधानी कीव में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। इसके अलावा ओडेसा, ल्वीव और रूस के हमलों का लगातार सामना कर रहे खारकीव शहर में भी लोगों ने प्रदर्शन किया। खारकीव में 300 से ज्यादा लोग हाथों में तख्तियां लेकर सड़कों पर उतरे और “शर्म करो, शर्म करो” के नारे लगाए। 35 साल के फेडोरोव यूक्रेन के ड्रोन युद्ध कार्यक्रम का सबसे बड़ा चेहरा माने जाते थे। उन्हें यूक्रेन में ड्रोन और रोबोट की मदद से युद्ध लड़ने की रणनीति का प्रमुख समर्थक माना जाता था। उनके हटने से अब यह सवाल उठने लगे हैं कि रूस जैसी बड़ी सेना का मुकाबला करने के लिए यूक्रेन की नई तकनीक और ड्रोन पर आधारित रणनीति आगे भी पहले की तरह जारी रहेगी या नहीं। फेडोरोव को हटाया जाना जेलेंस्की सरकार में बड़े बदलाव का हिस्सा है। इसी फेरबदल में प्रधानमंत्री को भी हटाया गया है। पहले डिजिटल मंत्री थे, फिर बने रक्षा मंत्री रक्षा मंत्री बनने से पहले फेडोरोव यूक्रेन के डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन (ई-गवर्नेंस) मंत्री थे। वे कई वर्षों तक जेलेंस्की के सबसे भरोसेमंद तकनीकी सलाहकार भी रहे। जनवरी में रक्षा मंत्री बनने के बाद उन्होंने सेना में नई तकनीक, ड्रोन और रोबोट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ाया। उसी दौरान यूक्रेन के कई पुराने ड्रोन प्रोजेक्ट सफल होने लगे। यूक्रेन ने रूस के अंदर सैकड़ों किलोमीटर दूर तक लगातार ड्रोन हमले किए और कब्जे वाले क्रीमिया को निशाना बनाकर वहां रूसी सेना की आपूर्ति और ठिकानों पर हमले किए। इन सफलताओं से यूक्रेन में लोगों का भरोसा बढ़ा कि नई तकनीक के जरिए रूस का मुकाबला किया जा सकता है। शुरुआत से ही सेना के जनरलों से मतभेद रहे कई रिपोर्ट्स के अनुसार, रक्षा मंत्री फेदोरोव को हटाने के पीछे भ्रष्टाचार या नाकामी नहीं, बल्कि सेना के शीर्ष जनरलों और कमांडर-इन-चीफ ओलेक्सांद्र सिरस्की के साथ उनका गहरा मतभेद था। जनवरी में रक्षा मंत्री बनने के तुरंत बाद से ही फेडोरोव की उनसे बहस होने लगी थी। फेडोरोव का मानना था कि भविष्य का युद्ध ड्रोन, रोबोट और नई तकनीक से लड़ा जाएगा। लेकिन सिरस्की का कहना था कि यह सोच पूरी तरह व्यावहारिक नहीं है। उनका मानना था कि युद्ध जीतने के लिए अब भी सैनिकों को मोर्चे पर जाकर लड़ना पड़ेगा। केवल ड्रोन से युद्ध नहीं जीता जा सकता। दोनों के बीच आपसी बातचीत भी बंद हो गई थी। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कमान के इस टकराव को सुलझाने के लिए सेना के जनरलों का पक्ष लिया और फेदोरोव को हटाने का फैसला किया।