हिंदी साहित्य में पहेली के रूप में लिखी जाने वाली एक लयात्मक कविता: कह मुकरियां

Illustration based on Hindi poetry

 

मुझको देता शीतल छाया।

देख उसे मन बहुत लुभाया।

वर्षा देने में वह दक्ष।

क्या सखि साजन? ना सखि ‘वृक्ष’।।

 

उसकी छटा श्याम सुखकारी।

सावन में उसकी बलिहारी।

धरा को जो कर देता मादल।

क्या सखि साजन? ना सखि बादल।।

 

मुझको हरदम राह दिखाता।

तम के भीतर दीप जलाता।

वह मेरे जीवन का रक्षक।

क्या सखि साजन? ना सखि शिक्षक।।

 

उसकी सूरत अति मनभावन।

वह लगता तुलसी सा पावन।

वह मेरी गोदी में लेटा।

क्या सखि साजन? ना सखि बेटा।।

 

मंद-मंद मुस्काता रहता।

शीतल रश्मि बहाता रहता।

उसके आगे फीके इंद्र।

क्या सखि साजन? ना सखि चन्द्र।

 

वह मेरा साथी है सच्चा।

मन उसका जैसे हो बच्चा।

भोली सूरत उच्च चरित्र 

क्या सखि साजन? ना सखि मित्र।

 

उसकी महिमा बड़ी निराली।

भर दे जीवन में हरियाली।

महक उठे जिससे मेरा तन।

क्या सखि साजन? ना सखि उपवन।।

 

मेरे मन का वही सहारा।

दुख में बन जाता रखवारा।

दुखों को करता है वह राई 

क्या सखि साजन? ना सखि भाई।।

 

उसकी धुन में सपने बुनती।

मन की गोपी उसको सुनती

तान सुने कान्हा का अंशी।

क्या सखि साजन? ना सखि वंशी।।

 

मुझको सबसे अधिक दुलारा।

उसने जीवन खूब सँवारा।

रोम-रोम उपजे उत्कर्ष

क्या सखि साजन? ना सखि ‘हर्ष’।।

 

चाचा से मिलने गया था खिलाड़ी, अब कंगारू टीम से खेलने का मिला मौका, 60 साल में पहली बार होगा कुछ ऐसा [VIDEO]

Nikhil Chaudhary Australia Team : क्रिकेट में किस्मत कब और कैसे पलट जाए, इसका ताजा उदाहरण हैं निखिल चौधरी। दिल्ली में जन्मे और पंजाब के लिए घरेलू क्रिकेट खेल चुके निखिल को ऑस्ट्रेलिया ने बांग्लादेश के खिलाफ आगामी टी20 सीरीज के लिए अपनी राष्ट्रीय टीम में शामिल किया है। अगर उन्हें प्लेइंग इलेवन में मौका मिलता है तो वह 60 साल से भी अधिक समय बाद ऑस्ट्रेलिया के लिए खेलने वाले पहले भारत में जन्मे पुरुष क्रिकेटर बन जाएंगे।

 

निखिल चौधरी का चयन सिर्फ उनके लिए ही नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के इतिहास के लिए भी खास है। ऑस्ट्रेलिया की ओर से गुरिंदर संधू और तनवीर संघा जैसे भारतीय मूल के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल चुके हैं, लेकिन भारत में जन्मे किसी पुरुष क्रिकेटर को कंगारू टीम में जगह मिले छह दशक से ज्यादा समय बीत चुका है। इससे पहले गुजरात में जन्मे लेग स्पिनर रेक्स सेलर्स (Rex Sellars) ने 1964 में ऑस्ट्रेलिया के लिए खेला था। वहीं महिला क्रिकेट में पुणे में जन्मी दिग्गज क्रिकेटर लिसा स्थालेकर (Lisa Sthalekar) ऑस्ट्रेलिया का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं और उन्हें देश की महानतम महिला क्रिकेटरों में गिना जाता है।

 

ऑस्ट्रेलिया ने ट्रेविस हेड की अनुपस्थिति में निखिल को टीम में जगह दी है। चयनकर्ताओं का कहना है कि बिग बैश लीग में उनके लगातार अच्छे प्रदर्शन ने उन्हें इस मौके का हकदार बनाया है।

 चाचा से मिलने गए, जिंदगी ने बदल दी दिशा

 

निखिल चौधरी की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। साल 2020 में वह अपने चाचा से मिलने ऑस्ट्रेलिया पहुंचे थे। लेकिन तभी कोरोना महामारी (Covid 19 Pandemic) के कारण अंतरराष्ट्रीय सीमाएं बंद हो गईं और उन्हें वहीं रुकना पड़ा। शुरुआती दिनों में उन्होंने कई छोटे-मोटे काम किए, यहां तक कि पोस्टमैन की नौकरी भी की।

 

इसी दौरान उन्होंने स्थानीय क्रिकेट खेलना शुरू किया। उनकी प्रतिभा पर ऑस्ट्रेलिया के पूर्व ऑलराउंडर जेम्स होप्स की नजर पड़ी, जिन्होंने उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया। धीरे-धीरे निखिल ने ग्रेड क्रिकेट, राज्य क्रिकेट और फिर बिग बैश लीग में अपनी पहचान बना ली।

 

बिग बैश में चमके, चयनकर्ताओं का जीता भरोसा

 

30 वर्षीय निखिल लेग स्पिन गेंदबाजी के साथ उपयोगी बल्लेबाजी भी करते हैं। होबार्ट हरिकेंस के लिए खेलते हुए उन्होंने बिग बैश लीग के पिछले सीजन में शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने आक्रामक बल्लेबाजी करते हुए 300 से अधिक रन बनाए और टीम के खिताब जीतने में अहम भूमिका निभाई।

राष्ट्रीय चयनकर्ता टोनी डोडेमेड ने कहा कि निखिल लंबे समय से चयनकर्ताओं की नजर में थे और बांग्लादेश दौरा उनके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को साबित करने का बड़ा अवसर होगा।

 

भारत में खेल चुके हैं घरेलू क्रिकेट

 

निखिल का जन्म 4 मई 1996 को दिल्ली में हुआ था। ऑस्ट्रेलिया जाने से पहले वह पंजाब के लिए घरेलू क्रिकेट खेल चुके हैं। उन्होंने सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी और विजय हजारे ट्रॉफी में पंजाब का प्रतिनिधित्व किया था। क्रिकेट जगत में यह भी चर्चा है कि वह अपने शुरुआती दिनों में शुभमन गिल के साथ ड्रेसिंग रूम साझा कर चुके हैं।

 

 बिना नागरिकता के भी खेल सकेंगे ऑस्ट्रेलिया के लिए

 

दिलचस्प बात यह है कि निखिल अभी ऑस्ट्रेलियाई नागरिक नहीं हैं। हालांकि उनके पास परमानेंट रेजिडेंसी है और वह पांच साल से अधिक समय से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे हैं। ICC के नियमों के अनुसार वह ऑस्ट्रेलिया का प्रतिनिधित्व करने के लिए पूरी तरह पात्र हैं।

 

ऑस्ट्रेलिया और बांग्लादेश के बीच तीन मैचों की टी20 सीरीज 17 जून से शुरू होगी। क्रिकेट प्रशंसकों की नजर अब इस बात पर होगी कि क्या दिल्ली में जन्मा यह खिलाड़ी कंगारू टीम की जर्सी पहनकर इतिहास रच पाता है या नहीं।

Australia T20I squad: Mitchell Marsh (c), Xavier Bartlett, Nikhil Chaudhary, Cooper Connolly, Tim David, Joel Davies, Nathan Ellis, Cameron Green, Aaron Hardie, Travis Head, Josh Inglis, Spencer Johnson, Matthew Kuhnemann, Riley Meredith, Josh Philippe, Matthew Renshaw, Adam Zampa.

 

बाल एकांकी: काला सोना

A scene from a childrens play featuring a character dressed as crude oil, in a short drama centered on petrol, diesel, gas, and kerosene

पात्र –
1- एक बालक आयु लगभग 15 वर्ष- काले लबादे में {क्रूड ऑयल के वेश में}

2- एक बालक रूद्र आयु लगभग 12 वर्ष
3- एक बालिका आद्या आयु लगभग 10 वर्ष
4- चार अन्य बच्चे आयु 10 से 12 वर्ष के बीच

 

मंच का परदा खुलता है और उस पर एक आकृति काला लबादा ओढ़े दिखाई देती है। वह आकृति नाचते हुए गा रही है।

 

      काला सोना काला सोना,

 

      नाम हमारा काला सोना।

 

      हमसे ही संचालित होता,

 

      है धरती का कोना-कोना।

 

      काला सोना काला सोना…….का….ला …

 

{तभी मंच के एक तरफ से आद्या का प्रवेश}

 

आद्या –ये भाई …. क्यों शोर मचा रहे हो, कौन हो तुम और ये काला सोना काला सोना, क्या है सब ये……..।

 

काली आकृति –लो जी लो, अब सुन लो इनकी बात, ये काला सोना भी नहीं जानते। सारी दुनिया में हल्ला है और ये मेम साब पूछती हैं काला सोना क्या है।

 

{तभी दूसरी तरफ से रूद्र का प्रवेश}

 

रूद्र–अरे भाई शांत ..शांत रहो भाई काले आदमी। एक तो यहां हल्ला मचा रहे हो और ठीक से अपना परिचय भी नहीं दे रहे हो।

 

काली आकृति–

 

     पेट्रोल हैं,  डीज़ल हैं हम, 

 

     हम हैं गैस रसोई वाली।

 

     नींद नहीं आती है घर को,

 

     पडा सिलेंडर हो जब खाली।

 

     बिना हमारे जले न चूल्हा,

 

     गरम न होता हाय भगौना

 

     काला सोना काला सोना …..

 

आद्या –रूद्र {एक साथ}-आंय! पेट्रोल, डीज़ल, गैस …..अरे तो क्या आप क्रूड ऑयल हैं -क्रूड ऑयल, काले-काले अंकल। आप यहां क्या कर रहे हैं? {दोनों चहकते हैं}

 

काली आकृति –क्या कर रहे हैं! आश्चर्य मेरे कारण दुनिया में इतनी मारा-मारी मची है और तुम लोग पूछ रहे हो कि यहां क्या कर रहे हो।

 

आद्या –अरे अंकल, अब ठीक से बताओ भी, इतने काले और अकड़ …काले को तो काला ही कहेंगे ना। अच्छा अपने बारे में ठीक से बताओ। यह तो मैंने भी पढ़ा कि पेट्रोल, डीज़ल, गैस इत्यादि क्रूड ऑयल से ही बनता है। लेकिन कैसे, कहां? ठीक से नहीं मालूम। अब आप बताओ। आपका जन्म स्थान कहां है, कैसे इस धरती पर आते हो और कैसे डीज़ल, पेट्रोल, गैस बन जाते हो? ज़रा ठीक से बताओ।

 

काली आकृति –ये बड़ी लम्बी दास्तान है बच्चों। कितनी पीड़ा होती है हमें है, धरती के भीतर, बाहर आने में और फिर बाहर आकर भी।

 

रूद्र –अंकल पूरी कथा सुनाओ प्लीज, बिना रुके, बिना कुछ छुपाए चटपट और झटपट।

 

काली आकृति–बताता हूं, बताता हूं, ध्यान से सुनो-बात करोड़ों साल पुरानी है।समुद्र के नीचे करोड़ों करोड़ सूक्ष्म जीव और वनस्पतियों का जमावड़ा था, जमावड़ा होता रहता था। समय के साथ ये जीव और वनस्पतियां नष्ट होती जाती थीं और समुद्र की तह में जमा होती जाती थीं। धीरे-धीरे उनके ऊपर गाद मिटटी और धूल जमती गई। चट्टानें बनती गईं और ये जीवाश्म तलछट में दबते रहे।

 

आद्या –फिर पेट्रोल कैसे बन गए ?

 

काली आकृति –अरे सुनो भी, कहानी जरा लम्बी है ना ज़रा धैर्य रखो। हां तो जब उन जीवाश्मों पर जब धरती का भारी दबाव पडा और भीतर का तापमान बढ़ा तो ये जीव/पौधे एक चिप चिपे गीले पदार्थ में परिवर्तित हो गए। यह मोम सरीखा पदार्थ केरोसिन कहलाता है और वह क्रिया जिससे यह पदार्थ बनता है, डायजे नेसिस क्रिया कहलाती है।

 

रूद्र –लेकिन ..लेकिन इतना, कितना केरोसिन कहां बनता होगा, ये तो सारी दुनिया में…..कितनी अधिक खपत है पेट्रोल, डीज़ल, गैस की। फिर केरोसिन से पेट्रोल कैसे बना।

 

काली आकृति –फिर जल्द बाजी, बेटे धीरज रखो थोड़ा। असीमित मात्रा में हमारी उपस्थति धरती के भीतर है। लाखों साल पहले जब ये सूक्ष्म पौधे प्रकाश संश्लेषण क्रिया से भोजन बनाते थे ऊर्जा पाते थे और जीवित रहते थे। छोटे छोटे करोड़ों जीव इस वनस्पति को खाकर जीवित रहते थे। इन जीवों का जीवन बहुत छोटा होता था लेकिन ये करोड़ों अरबों की मात्रा में पैदा होते मरते रहते थे। और सागर की तलहटी में डूब जाते थे। भारी दबाव और तापमान से बने केरोसिन भी केटाजेनिस क्रिया से तरल रूप में बदल जाते थे और यही तरल पदार्थ ही कच्चा तेल या क्रूड ऑयल कहलाया, मतलब हम कहलाए।

 

आद्या–लेकिन ..लेकिन यह क्रूड ऑयल, मतलब अंकल आप केरोसिन के वंशज हो, ऊपर धरती पर कैसे आते हो?

 

काली आकृति -गुरुत्वाकर्षण के कारण, धरती का दबाव नीचे की तरफ होने से, हम तरल कम दबाव की तरफ मतलब ऊपर की तरफ आना चाहते हैं लेकिन भारी चट्टानें हमें रोक लेती हैं और, और हम क्रूड ऑयल तरल के रूप में चट्टानों के बीच खाली जगह में एकत्रित होते रहते हैं। और अभी भी करोड़ों लीटर कच्चे तेल के रूप में हमारे भाई वंशज जमीन में चट्टानों के नीचे दबे पड़े हैं। कहीं-कहीं जहां चट्टानें हमारी बाधा नहीं बनतीं,  मिट्‍टी को भेदता हुआ ये तरल मतलब क्रूड ऑयल मतलब हम धरती के ऊपर बिना रोक टोक के आ जाते हैं। यथार्थ में तकनीकी भाषा में हमारे इस क्रूड ऑयल रूप को हाइड्रो कार्बन कहते हैं।

 

रूद्र-तभी तो मजा है ना,  हम लोग खूब सारा पेट्रोल भरवाकर कारों में यहां वहां घूमते हैं। जितना चाहे क्रूड ऑयल धरती से निकालो। आप तो सब जगह हैं न धरती पर-धरती के नीचे अंकल?

 

काली आकृति –अरे ना- ना- ना बच्चों। बहुत कम स्थानों पर निकलते हैं हम। वे क्षेत्र भाग्यवान हैं जहां की धरती में हमारी मौजूदगी रहती है।

 

       जिस धरती के नीचे हैं हम,

 

       लोग वहां के हैं आभारी।

 

       और हमारे कारण ही तो,

 

       लोग वहां के सब पर भारी।

 

       लोग सहेजे रखते हमको, 

 

       जैसे हम हैं मृग का छौना|

 

       काला सोना ….

 

आद्या –अरे यार अंकल आप तो फिर गाने लगे। आपने क्रूड ऑयल की बात तो बताई लेकिन ये क्रूड ऑयल पेट्रोल, डीज़ल, गैस में कैसे बदलता है ये तो बताया ही नहीं। हां अंकल एक बात और आपके वंशज आजकल सबसे ज्यादा किस क्षेत्र में उपलब्ध हैं ?

 

काली आकृति — हम तो बेताज बादशाह हैं बच्चों। जिस क्षेत्र में हम हैं तो हम ही हम हैं। वहां के लोगों की बल्ले-बल्ले है। जिस-जिस की धरती से हम निकले वह देश देखते ही देखते धनवान हो गए। अमेरिका-रूस बहुत से अरब देश, जहां-जहां हम प्रकट हुए वहां धन की कोई कमी नहीं है।

 

मेरे कारण ही दुनिया में,

 

मची हुई है बहुत लड़ाई।

 

बड़े देश छोटे देशों पर,

 

करते बम से हाथापाई।

 

मैं हूं सच में बड़ा कीमती,

 

मैं हूं अब लड्डू का दौना।

 

काला सोना………….

 

रूद्र –और हमारे अपने देश भारत में आप धरती से क्यों नहीं बाहर आते?

 

काली आकृति –बड़े नादान हो बालक, हम जब यहां धरती के नीचे होंगे तब ही तो बाहर आएंगे। लेकिन फिर भी असम, राजस्थान, गुजरात और मुंबई के पास समुद्र के नीचे से हम क्रूड ऑयल बनकर निकल रहे हैं। हमारी तेजी से खोजबीन भी हो रही है, शायद और कई स्थानों पर हम धरती में छुपे मिल जाएं। लेकिन इस देश की मांग दिन पर दिन बढ़ रही है और इतनी कम मात्रा का उत्पादन देश की आपूर्ति नहीं कर सकता आपको बाहरी देशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

 

आद्या –ठीक है, ठीक है अब बताओ आप काले से गोरे और चमकदार मतलब पेट्रोल कैसे बने और रोज लाखों करोड़ों लीटर की मात्रा में कैसे बन जाते हो? 

 

काली आकृति –ये हुई ना काम की बात। तो सुनो बच्चों- बड़ी-बड़ी मशीनों से धरती को ड्रिल करके कई हज़ार फुट नीचे से कच्चा तेल मतलब हमें बाहर निकाला जाता है। फिर हमें सेपरेशन टेंकों में एकत्रित करते हैं। और बाद में रिफायनरी में भेज दिया जाता है।

 

रूद्र- रिफायनरी मतलब शोधन शाला ना?

 

काली आकृति –हां-हां वही जगह जहां हमारे शरीर से काम के अवयव अलग-अलग कर दिए जाते हैं। शोधन शाला में  बहुत बड़े-बड़े चेंबरनुमा संयंत्र लगे होते हैं। जिनको डिस्टिलेशन टावर कहते हैं। जिसमें हमें बहुत अधिक तापमान पर, लगभग 400 डिग्री सेल्सियस पर गर्म किया जाता है। और गरमी पाकर हम भाप बनने लगते हैं। हमारे जिस-जिस अवयव का बोइलिंग पॉइंट मतलब क्वथनांक सबसे कम होता है वह जल्दी भाप बनकर चेंबर के सबसे ऊपरी भाग में एकत्रित हो जाता है उससे थोडा अधिक क्वथनांक वाला उसके नीचे और अधिक क्वथनांक वाले अवयव क्रमशःनीचे के खण्डों में एकत्रित होते रहते हैं।

 

आद्या– फिर अंकल, फिर क्या होता है?

 

काली आकृति– फिर क्या, सबसे ऊपरी भाग में हमारा एक विशेष रूप एलपीजी उसके नीचे नेप्था उसके नीचे गेसोलीन मतलब पेट्रोल फिर केरोसिन फिर और नीचे डीज़ल फिर फ्यूल आयल और अंत में सबसे नीचे बिटूमिन मतलब डामर अलग होकर एकत्रित हो जाता है। यह क्रिया चलती रहती है। और पेट्रोलियम मतलब मेरे इन उत्पादों का अलग-अलग भण्डारण कर और शुद्धिकरण एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा बाजारों में विक्रय के लिए भेज दिया जाता है। पेट्रोल, डीजल मोबिल आयल इत्यादि पेट्रोल पम्पों पर और अन्य सामान उचित भंडारण घरों अथवा दुकानों पर भेज दिया जाता है|

 

रूद्र–अंकल हवाई जहाज वाला ईंधन इनमें कौन सा वाला है?

 

काली आकृति–अरे! सॉरी बच्चे, वैरी सॉरी, हम तो भूल ही गए केरोसिन और डीज़ल के बीच का उत्पाद ए.टी. ऍफ़. मतलब एविएशन टरबाइन फ्यूल कहलाता है, काले कलूटे हमारे रूप का नया स्वरूप -जो हवाई जहाज उड़ा देता है।

 

स्वच्छ हमारे रंग रूप से,

 

दुनिया के वाहन चल पाते।

 

हमें पेट में भर लेते जब,

 

वायुयान नभ में उड़ पाते।

 

हम हैं तो ही पहुंच सरल है,

 

लंदन, पेरिस, वार्सीलोना।

 

काला सोना ………

 

आद्या –इन्हीं गानों के चक्कर में आप काम की बात भी भूल जाते हैं। काले अंकल, ये जो डामर है जिसे आप सभ्य भाषा में बिटुमिन कहते हैं मुझे बहुत गन्दा लगता है और प्लास्टिक छी-छी …चिपचिपा सा ….

 

काली आकृति –-

 

सड़कों पर जो चम-चम करता,

 

वह डामर भी हम हैं भाई।

 

और प्लास्टिक- पॉलीथिन भी,

 

तो हमने ही है उपजाई।

 

इनकी बनी थैलियां डिब्बे,

 

बच्चों के हैं बने खिलौना।

 

रूद्र -–अरे यार फिर गाना, क्या आप गवैए हो।

 

काली आकृति –हां हां गवैया हूं गवैया। आजकल सारी दुनिया मुझे ही तो गा रही है। एक तो हमारे बिना काम नहीं चलता, हमारा अंधाधुंध उपयोग होता है और जब प्रदूषण होता है गाली भी सब हमें ही देते हैं।

 

होने लगी रोज ही अब तो,

 

घर-घर बात प्रदूषण वाली।

 

जुम्मेवारी इसकी सिर पर,

 

लोगों ने बस हम पर डाली।

 

उनकी गलती का अपने सिर,

 

दोष पड़ रहा हमको ढोना।

 

काला सोना…………...

 

आद्या –क्या बात है काले अंकल, आप क्रूड ऑयल कम और कवि ज्यादा लग रहे हैं।

 

काली आकृति –क्या कहूं यातनाएं सहते-सहते आलोचनाएं सुनते-सुनते जैसे आदमी कवि बन जाता है तो हम भी बन गए। आप लोग दस कदम पैदल नहीं चल सकते, हाथ में कपडे की या कागज़ की थैली लेकर नहीं चल सकते और प्रदूषण के लिए दोष डीज़ल का, पेट्रोल का, पॉलीथिन का और प्लास्टिक का, वाह क्या गजब की सोच है।

 

क्यों उपयोग बढाए जाते,

 

लोग हमारा हर दिन भाई।

 

पैदल दस गज चलने में ही,

 

उन्हें हो रही क्यों कठिनाई।

 

कपड़े वाली थैली हाथों,

 

में लगती क्यों भारी ढोना।

 

काला सोना …………..

 

रूद्र –क्षमा करें अंकल। हमें नहीं मालूम था कि आपको भी आम आदमियों के सेहत की इतनी चिंता है। गलतियां आदमियों से हो रहीं हैं और दोष हम कारखानों को, पेट्रोल को, डीज़ल को,पॉलीथिन को दे रहे हैं। पेट्रोलियम के लिए युद्ध हो रहे हैं, निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं, करोड़ों की संपत्ति नष्ट हो रही है और देश इसके अधिपत्य के लिए अरबों खरबों रुपयों के हथियार बना रहे हैं, बेच रहे हैं और खरीद रहे हैं।

 

अंधाधुंध दोहन धरती का,

 

धरती होती जाती खाली।

 

हुई मानसिकता लोगों की,

 

ज्यादा धन सुविधाओं वाली।

 

बढ़ते रोग अस्थमा दिल के,

 

फैला करता यहां करोना।

 

काला सोना…..

 

आद्या –रूद्र भैया इन अंकल ने तो हमारी आंखें खोल दीं। मुझे भी माफ़ करना मेरे प्रिय काले अंकल। आप काले हैं तो क्या हुआ। आप सच में काला सोना कहलाने के हकदार हैं। आप सोने के सामान कीमती हैं लेकिन आपका ह्रदय पेट्रोल सरीखा चमकदार और ऊर्जावान है।

 

हमें ही सुधरना होगा। हम बच्चों को सोचना होगा। हम ही तो हैं प्रदूषण के हरकारे।

 

{आद्या और रूद्र गाते हैं}

 

पेट्रोल, डीज़ल, पॉलीथिन,

 

घोर प्रदूषण हैं फैलाते।

 

पता नहीं क्यों नहीं नियंत्रण,

 

थोड़ा भी इन पर कर पाते।

 

आम हमे पाना है तो फिर,

 

बीज बबूलों के क्यों बोना।

 

काला सोना….

 

आद्या –रूद्र भैया क्यों न हम अपने मित्रों को भी बुलाकर काले अंकल की बातों का समर्थन कर उनका अभिनन्दन करें?

 

रूद्र –हां हां बिलकुल बहन आद्या, बिलकुल ठीक कहा तुमने। हम अपने मित्रों को अभी बुलाते हैं।

 

{तभी मंच पर चार बच्चे और आ जाते हैं}

 

फिर काली आकृति सहित सब बच्चे गाते हैं –

 

अब हम सबने सोच लिया है,

 

आसपास पैदल जाएंगे।

 

दूर-दूर जाना होगा तो,

 

ही हम वाहन ले जाएंगे।

 

अब कपडे के थैलों का ही,

 

हम उपयोग करेंगे हरदिन।

 

जीना भी अब शुरू करेंगे,

 

बिना प्लास्टिक, पॉलीथिन बिन,

 

पैदल चलने में अब हमको,

 

नहीं आएगा बिलकुल रोना।

 

काला सोना काला सोना ……..

 

{धीरे- धीरे परदा बंद होता है}

(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है…)

श्रीलंका टूर के लिए भारतीय महिला अंडर-19 टीम में इंदौर की अनादि तागड़े का चयन, हार्दिक पंड्या हैं Idol

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने श्रीलंका महिला अंडर-19 टीम के खिलाफ होने वाली सीरीज के लिए भारतीय महिला अंडर-19 टीम की घोषणा कर दी है। इस टीम में इंदौर की प्रतिभाशाली तेज गेंदबाज अनादि तागड़े को वनडे और टी20 दोनों टीमों में जगह मिली है। खास बात यह है कि अनादि मध्य प्रदेश से चयनित होने वाली एकमात्र खिलाड़ी हैं।

 

अनादि के चयन से उनके परिवार, कोचों और इंदौर के क्रिकेट प्रेमियों में खुशी की लहर है। अनादि लंबे समय से अपनी शानदार गेंदबाजी के दम पर उम्र वर्ग क्रिकेट में पहचान बना रही हैं और अब उन्हें देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला है।

 

क्रिकेट अनादि को विरासत में मिला है। उनकी मां दीप्ति तागड़े स्वयं क्रिकेटर रह चुकी हैं और उन्होंने ही बेटी को शुरुआती प्रशिक्षण दिया था। बाद में अनादि ने क्लब क्रिकेट के जरिए अपने खेल को निखारा और लगातार मेहनत के दम पर चयनकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा।

अनादि इससे पहले भी अपनी घातक गेंदबाजी से सुर्खियां बटोर चुकी हैं। महिला अंडर-19 टी20 ट्रॉफी में उन्होंने सिक्किम के खिलाफ 4 ओवर में केवल 8 रन देकर 6 विकेट झटके थे, जिसमें हैट्रिक भी शामिल थी। इस प्रदर्शन ने उन्हें देश की उभरती हुई तेज गेंदबाजों में शामिल कर दिया।

 

अब श्रीलंका के खिलाफ आगामी सीरीज में अनादि तागड़े पर सभी की नजरें रहेंगी। इंदौर की यह युवा खिलाड़ी अपने प्रदर्शन से भारतीय टीम को मजबूती देने और भविष्य में सीनियर भारतीय महिला टीम में जगह बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ाने के लिए तैयार है। अनादि के प्रेरणा स्त्रोत हार्दिक पंड्या हैं! 

 

भारतीय अंडर-19 टीम में चयन से पहले अनादि तागड़े वेबदुनिया के विशेष इंटरव्यू में भी शामिल हुई थीं। इस दौरान उन्होंने अपने क्रिकेट करियर, मां से मिली प्रेरणा और भविष्य के लक्ष्यों को लेकर खुलकर बात की थी। अनादि की प्रेरणादायक कहानी जानने के लिए उनका पूरा वीडियो देखा जा सकता है।

 

नौसेना की पसंद बनी कानपुर की सुपर रैपिड गन, और मिले ऑर्डर; जानें क्या है खासियत?

कानपुर की फील्ड गन फैक्ट्री में बनी सुपर रैपिड गन माउंट (SRGM) भारतीय नौसेना की बड़ी ताकत बन रही है। एक मिनट में 120 गोले दागने वाली इस तोप की पांच में से तीन बैरल नौसेना को सौंपी जा चुकी हैं। रक्षा मंत्रालय ने सभी युद्धपोतों पर SRGM लगाने का फैसला किया है।

‘370 रुपए की बिरयानी’ के बाद अब डेड बॉडी के प्राइवेट पार्ट पर क्या बोल गई ये डॉक्टर? भड़के लोग

वीडियो क्लिप सामने आने के बाद लोगों ने हिमांशु जांगड़ा की तरह इस लड़की के खिलाफ एक्शन लेने की मांग की है। वहीं प्रणीत मोरे एक बार फिर इस तरह की चीजों को प्रमोट करने को लेकर सवालों के घेरे में आ गए हैं।

फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते

A scene in the picture depicting childhood memories

इंसान की ज़िन्दगी का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा बचपन ही होता है, क्योंकि बचपन हर फ़िक्र से आज़ाद और बेगाना होता है। बचपन की यादें हमारे दिलो-दिमाग़ पर ऐसे नक़्श हो जाती हैं कि उन्हें वक़्त की धूल भी मिटा नहीं पाती। और जब बात गर्मियों की छुट्टियों की हो, तो फिर कहना ही क्या। दूसरे बच्चों की तरह हमें भी सालभर गर्मियों की छुट्टी का इंतज़ार रहता था, क्योंकि गर्मियों की छुट्टियों में हमें अपनी नानी जान के घर जाने का मौक़ा मिलता था। हम नानी जान के घर जाते थे। 

 

इससे पहले बहुत-सी तैयारियां की जाती थीं। उस वक़्त बैग्स का चलन ज़्यादा नहीं था। इसलिए सन्दूक़ में कपड़े रखे जाते थे। प्लास्टिक की टोकरी में खाने-पीने का सामान होता था यानी रास्ते के लिए पूड़ी-सब्ज़ी और पानी की बोतलें होती थीं। सामान क़ुली उठाता था। उस वक़्त रेलगाड़ियों में आज जैसी भीड़-भाड़ नहीं होती थी।

रेल में हमें बहुत अच्छा लगता था। खिड़की की सीट हमें ही मिलती थी। खिड़की से भागते हुए दरख़्तों को देखना कितना भला लगता था। ख़ैर, आज भी उतना ही भला लगता है। रस्ते में गंगा आती, तो हम उसमें सिक्के डालते थे। हापुड़ के पापड़ और गजरौले के पेड़े खाते। सफ़र में खाने का भी अपना ही लुत्फ़ है।         

 

हमारे नाना के बाग़ थे, जिनमें आम, अमरूद, जामुन, शहतूत और शरीफ़े के अलावा और भी बहुत से फलों के दरख़्त थे। हम अपने भाइयों और मामाज़ाद बहनों के साथ दरख़्तों पर चढ़कर फल तोड़ते और खाते थे। दरख़्तों पर चढ़कर फल तोड़कर खाने के लुत्फ़ को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज भी फलों के दरख़्तों को देखकर बचपन में उन पर चढ़ना याद आता है।

बाग़ के पास एक बड़ा तालाब भी था। एक बार वहां खेलते हुए तालाब में गिर भी गए थे। अल्लाह का शुक्र है कि हमें पानी में से निकाल लिया गया। वहां का लज़ीज़ खाना, रबड़ी, छोले-समौसे, नारियल के बुरादे की कुल्फ़ी और बरगद के पत्तों पर रखी मलाई बर्फ़ बहुत याद आती है।      

 

जिस साल नानी के घर नहीं जाते, उस साल अपने ही घर में ख़ूब मज़े करते। हमारा घर बहुत बड़ा था। उसका आंगन भी बहुत बड़ा था। घर में बग़ीचा था। बग़ीचे में फलों के बहुत से दरख़्त थे। इनमें आम, अमरूद, जामुन, शहतूत और गूलर के कई दरख़्त थे।

गर्मियों की छुट्टियों में हम ख़ूब मस्ती करते, शरारतें करते, धमा चौकड़ी करते। दरख़्तों पर चढ़ते और फल तोड़ते। दादी जान कहती थीं कि जामुन और गूलर के दरख़्त पर नहीं चढ़ना चाहिए, क्योंकि इसकी लकड़ी कमज़ोर होती है। हमारे घर के पास एक बड़ा मैदान था। उस मैदान में बहुत से दरख़्त थे। वहां पीपल, बरगद, नीम, शीशम, करंद और खजूर आदि के भी बहुत से दरख़्त थे। शीशम की डालों पर झूला डालकर भी खूब झूलते थे।

 

हमारे घर में माशा अल्लाह फुलवारी भी बहुत थी। इनमें बेला, गुलाब, जूही, चम्पा, चमेली, मोगरा जैसे बहुत से फूलों के पौधे व बेलें थीं। हमारा घर ही नहीं, बल्कि आसपास का इलाक़ा भी इन फूलों की ख़ुशबू से महकता रहता था। अम्मी को मोगरा के फूल पहनने का बहुत शौक़ था। वे चांदी के तार की बालियों में बेला के फूलों को पिरोकर कानों में पहना करती थीं और बालों में बेला के गजरे भी लगाती थीं।

हमारी दादी जान भी कानों में फूल पहना करती थीं। वे मेज़ पर रखे पंखों पर फूलों के गजरे डाल देतीं, जिससे सारा घर-आंगन महक उठता था। हमारे घर से बहुत से लोग फूल ले जाते थे और फिर उनके गजरे व हार बनाते थे। घर के पास एक मन्दिर था। बहुत से लोग मन्दिर में देवी-देवताओं को चढ़ाने के लिए फूल लेकर जाते थे।  

 

हमें लू की वजह से गर्मियों की भरी दोपहरी में बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी। इसलिए हम घर के भीतर ही रहते और दोपहर ढलने का इंतज़ार करते थे। कई बार हम घरवालों की नज़र से बचकर बाहर खेलने चले जाते थे। आंगन में तख़्त बिछे होते थे। उन पर सफ़ेद चादरें बिछी होतीं और गाव तकिये क़रीने से लगे हुए होते थे। शाम को घर के सब लोग इन्हीं पर बैठते थे। शाम को दादी तरह-तरह के पकौड़े बनाती थीं। रूह अफ़ज़ा शर्बत भी बनता था। उसमें बहुत-सी बर्फ़ डाली जाती थी।    

 

गर्मियों में हम छत पर सोया करते थे। शाम को छत की साफ़-सफ़ाई की जाती। फिर पानी छिड़का जाता, ताकि छत ठंडी हो जाए। छत पर चटाइयां बिछाई जातीं। फिर उन पर दरियां बिछाई जातीं। दरियों पर रंग-बिरंगी कढ़ाई वाली चादरें बिछाई जातीं और तकिये रखे जाते। क़रीब में ही पानी से भरी मिट्टी की सुराहियां रखी जातीं, गिलास रखे जाते। हम बच्चे अपनी-अपनी छोटी सुराहियां अपने सिरहाने रख लिया करते थे, ताकि रात में प्यास लगे तो अपनी ही सुराही से पानी पी लें। हमें दादी-नानी ने ही नहीं, बल्कि पापा ने भी बचपन में कहानियां सुनाई हैं।   

 

हमारे घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था। ननिहाल और ददिहाल में सब लोग पढ़े-लिखे थे। नाना जान और दादा जान दोनों ही दानिशमंद थे। हमारी अम्मी को भी लिखने और पढ़ने का बहुत शौक़ था। वे शायरा थीं और बहुत शानदार लिखती थीं।

 

हमारे घर किताबों की एक अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी थी। उनमें अरबी, उर्दू, इंग्लिश और हिन्दी की किताबों की भरमार थी। आज भी यही हाल है। बरसों पहले इनमें पंजाबी की किताबें भी शामिल हो गईं। अम्मी की देखा-देखी हमें भी किताबों से मुहब्बत हो गई। बचपन में ही हमने लिखना शुरू कर दिया था। हमें डायरी लिखने का भी शौक़ था, जो आज भी है। डायरी में हम अपनी बातों के अलावा अपने पसंदीदा शायरों की ग़ज़लें, गीत और नज़्में लिखा करते थे। आज भी लिखते हैं।

हमारी डायरी में शायरा इशरत आफ़रीन की एक ग़ज़ल दर्ज है-

 

यूं ही किसी के ध्यान में अपने आप में गाती दोपहरें

 

नर्म गुलाबी जाड़ों वाली बाल सुखाती दोपहरें

 

सारे घर में शाम ढले तक खेल वो धूप और छांव का

 

लिपे पुते कच्चे आंगन में लोट लगाती दोपहरें

       

जीवन-डोर के पीछे हैरां भागती टोली बच्चों की

 

गलियों-गलियों नंगे पांव धूल उड़ाती दोपहरें

 

सरगोशी करते पर्दे कुंडी खटकाता नटखट दिन

 

दबे-दबे क़दमों से तपती छत पर जाती दोपहरें

 

कमरे में हैरान खड़े आईना जैसे हंसते दिन

 

ख़ुद से लड़कर गौरैया-सी शोर मचाती दोपहरें

 

वही मुज़ाफ़ातों के भेद भरे सन्नाटों वाले घर

 

गुड़ियों के लब सी कर उनका ब्याह रचाती दोपहरें

 

खिड़की के टूटे शीशों पर एक कहानी लिखती हैं

 

मंढे हुए पीले काग़ज़ से छनकर आती दोपहरें

 

नीम तले वो कच्चे धागे रंगती हुई पुरानी याद

 

घेरा डाले छोटी-छोटी हाथ बटाती दोपहरें

 

फटी-पुरानी कथरी ओढ़े धूप सेंकते बूढ़े दिन

 

पेशानी तक पल्लू खींचे चिलम बनाती दोपहरें

 

पानी की तक़सीम के पीछे जलते खेत सुलगते घर

 

और खेतों की ज़र्द मुंडेरों पर कुम्हलाती दोपहरें

 

पुरवाई से लड़ते कितने वर्क़ पुरानी यादों के

 

सौग़ातों के संदूक़ों को धूप दिखाती दोपहरें

 

दुखती आंखें ज़ख़्मी पोरें उलझे धागों जैसे दिन

 

बादल जैसी ओढ़नियों पर फूल खिलाती दोपहरें

 

ओढ़नियों के उड़ते बादल रंगों के बाज़ारों में

 

चूड़ी की दुकानों से वो हमें बुलाती दोपहरें

 

सुनते हैं अब उन गलियों में फूल शरारे खिलते हैं

 

ख़ून की होली खेल रही हैं रंग नहाती दोपहरें

 

ये तो मेरे ख़्वाब नहीं हैं ये तो मेरा शहर नहीं

 

किस जानिब से आ निकली हैं ये गहनाती दोपहरें         

 

वाक़ई, बचपन से वाबस्ता यादें बहुत दिलकश होती हैं। 

 

बशीर बद्र साहब ने क्या ख़ूब कहा है-

 

उड़ने दो परिन्दों को अभी शोख़ हवा में

फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते… 

 

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