बाबरी विध्वंस देख कर रोई थीं सोनिया

Sonia Gandhi

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी ने राज्य की राजनीति पर बड़ा असर डालने वाला बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि छह दिसंबर 1992 को जब बाबरी मस्जिद का ढांचा टूट रहा था तब वे बहुत रोई थीं। ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ को दिए इंटरव्यू में सोनिया ने कहा है कि उनके आंसू नहीं थम रहे थे और उनको महात्मा गांधी और जहवाहरलाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को बचाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी।

असल में सोनिया गांधी की किताब ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ 10 नवंबर को रिलीज होने वाली है। उससे पहले उन्होंने किताब के प्रचार के लिए इटंरव्यू दिया है। उन्होंने अंग्रेजी के अखबार ‘द हिंदू’ को भी एक इंटरव्यू दिया है, जिसमें उन्होंने 2004 में प्रधानमंत्री का पद ठुकराने से लेकर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की विचारधारा और इमरजेंसी से जुड़े सवालों के जवाब दिए हैं। सोनिया गांधी ने राजीव गांधी से जुड़े एक सवाल पर, ‘राजीव से मुलाकात के 60 साल बाद भी मैं वही इंसान हूं, बस अब पहले जितना हंसती नहीं’।

अपनी किताब में सोनिया ने बताया है कि राहुल और प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि वे प्रधानमंत्री बनें। इंटरव्यू के दौरान उन्होंने यह बताया। इंटरव्यू में उन्होंने राजीव गांधी के साथ अपने रिश्ते, इमरजेंसी, कांग्रेस के भविष्य और देश की मौजूदा राजनीति पर बात की। उन्होंने कहा है कि भारत को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सोच अलग है। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि मोदी बिल्कुल अलग विचारधारा के साथ आए हैं।

सोनिया ने पिछले 12 साल में देश के लोकतंत्र और संस्थाओं को हुए नुकसान पर भी चिंता जताई। इमरजेंसी से जुड़े एक सवाल के जवाब में उन्होंने संजय गांधी का जवाब दिया और कहा, ‘इसके लिए सिर्फ संजय गांधी जिम्मेदार नहीं थे, हालांकि आम लोगों की नजर में अक्सर उनका नाम आपातकाल का पर्याय बन गया है। इंदिरा गांधी पर उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी काफी दबाव था’।

भाजपा, मोदी और आरएसएस से जुड़े सवाल पर सोनिया ने कहा, ‘यह सच है कि मोदी बिल्कुल अलग वैचारिक दुनिया से आते हैं। लेकिन राजनीति में सफलता हासिल करने के कई रास्ते होते हैं। कांग्रेस पार्टी के भीतर ही उदाहरण के तौर पर डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को देख सकते हैं। मुझे नहीं लगता कि हमें आरएसएस से कुछ सीखने की जरूरत है’। सांप्रदायिकता पर कांग्रेस के सख्त रुख के बारे में पूछे जाने पर सोनिया ने कहा, ‘मैं मानती हूं कि पार्टी के भीतर कुछ ऐसे लोग रहे हैं, जो महसूस करते थे कि धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर हमें इतना स्पष्ट और दो टूक रुख नहीं अपनाना चाहिए। लेकिन यह पार्टी का आधिकारिक नजरिया नहीं है’।