
पंचतंत्र में एक बेहद शिक्षाप्रद कहानी दो बिल्लियों और एक बंदर की है। पता नहीं प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल आदि ने वह कहानी पढ़ी है या नहीं। दिवंगत अजित पवार की पार्टी एनसीपी के सभी गैर मराठा नेता अपनी पार्टी की पंचायत कराने अमित शाह के पास पहुंचे थे। उनको सुनेत्रा पवार से शिकायत है। इन नेताओं को लग रहा है कि अजित पवार के निधन के बाद सुनेत्रा ने इन सबको किनारे कर दिया। खुद सत्ता और संगठन दोनों पर कब्जा कर लिया। अब उनके बेटे पार्थ पवार पार्टी का कामकाज संभालते हैं। सवाव है कि इसमें नया क्या है? इस तरह की पार्टियों में परिवार ही संगठन और सत्ता हासिल करता है।
असल में प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, सुनील तटकरे आदि नेता शरद पवार की पार्टी टूटने पर अजित पवार के साथ चले गए थे। शरद पवार के समय भी इनको खूब आजादी थे क्योंकि शरद पवार इन्हें अपने लिए कोई खतरा नहीं मानते थे। अजित पवार ने भी इन्हें आजादी दी क्योंकि वे भी इन नेताओं को कुछ नहीं समझते थे और जानते थे कि ये सब उनके नाम पर राजनीति कर रहे हैं। लेकिन सुनेत्रा और पार्थ पवार उतने पावरफुल नहीं हैं। इसलिए उनको चिंता है और इसलिए उन्होंने इन सभी नेताओं को किनारे कर दिया।
सो, अब प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, सुनील तटकरे, धनंजय मुंडे, हसन मुश्रीफ आदि अमित शाह से मिल कर पार्टी का झगड़ा सुलझाने की अपील कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि सुनेत्रा पवार की पार्टी का शरद पवार की पार्टी में विलय कराने की बात हो रही है। लेकिन सवाल है कि शरद पवार की पार्टी में भी अब क्या बचा? वे खुद बहुत उम्र के हैं और बीमार हैं। उनकी बेटी सुप्रिया सुले को मराठा समाज अपना नेता मान लेगा इसमें संदेह है। फिर वहां क्या ये सब रोहित पवार का नेतृत्व स्वीकार कर लेंगे? असल में सत्ता में हिस्सेदारी की बेचैनी है, जिसके लिए ये नेता परेशान हैं। उधर सुनेत्रा पवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस का समर्थन मिला हुआ है।

