क्या सचमुच तीन करोड़ घुसपैठिए हैं?

Amit Shah

अगर यह बात किसी और ने कही होती तो शायद हंसी में उड़ा दिया जाता। लेकिन देश के गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि भारत में तीन करोड़ घुसपैठिए हैं। उन्होंने तेलंगाना में भाजपा के ‘संविधान बचाओ, अराजकता हटाओ’ मार्च में हिस्सा लेते हुए यह बात कही। इससे पहले उनकी पार्टी के नेता यह आरोप लगाते थे कि राहुल गांधी और विपक्षी पार्टियां घुसपैठियों को बचाने के लिए एसआईआर का विरोध कर रही हैं। लेकिन यह स्पष्ट आंकड़ा है कि 13 करोड़ से ज्यादा जो नाम कटे हैं उनमें तीन करोड़ घुसपैठियों के नाम हैं। देश के गृह मंत्री ने इस आंकड़ों की बारीकी में जाकर बताया कि 6.15 करोड़ के करीब नाम ऐसे लोगों के कटे हैं, जो कहीं दूसरी जगह शिफ्ट हो गए हैं। 2.80 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनकी मृत्यु हो गई है। इनके अलावा एक करोड़ लोग ऐसे हैं, जो डुप्लीकेट वोटर थे यानी जिनका नाम एक से ज्यादा जगहों पर था। इन तीन श्रेणी के अलावा तीन करोड़ और मतदाताओं के नाम कटे हैं। अमित शाह के मुताबिक ये तीन करोड़ लोग बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं।

यह आंकड़ा बता कर अमित शाह ने राहुल गांधी पर हमला किया और लोगों से पूछा कि क्या तीन करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठियों का नाम मतदाता सूची से नहीं काटना चाहिए? सोचें, इस सवाल का क्या कोई दूसरा जवाब हो सकता है? हर व्यक्ति कहेगा कि निश्चित रूप से इनके नाम काटने चाहिए। लेकिन सवाल है कि क्या सिर्फ नाम काट देने से घुसपैठियों की समस्या का समाधान हो जाएगा? असल में गृह मंत्री का यह बयान इस सरकार के कामकाज पर बहुत गंभीर सवाल उठाता है। पता नहीं उन्होंने इस पहलू पर सोचा या नहीं लेकिन वास्तविकता तो यही है कि इन तीन करोड़ कथित घुसपैठियों के मतदाता सूची में होने के बावजूद नरेंद्र मोदी और अमित शाह की कमान में भारतीय जनता पार्टी तीन बार लोकसभा का चुनाव जीती है। घुसपैठ प्रभावित असम में तीसरी बार जीती है और पश्चिम बंगाल में भी जीत गई है। इसका अर्थ है कि घुसपैठियों का इतना बड़ा वोट आधार विपक्ष के बहुत काम नहीं आ रहा था। फिर भी मान लेते हैं कि चुनाव की शुद्धता के लिए जरूरी है कि ऐसे मतदाता हटाए जाएं। इसलिए हटा भी दिए गए तो कोई बात नहीं है।

लेकिन इसके आगे क्या? क्या मतदाता सूची से नाम हटा कर सरकार की जिम्मेदारी पूरी हो गई? अगर अमित शाह की बात सही है तो इसका मतलब है कि देश में इस समय तीन करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं। यानी देश की दो फीसदी आबादी घुसपैठियों की है। हर सौ में से दो व्यक्ति बांग्लादेशी घुसपैठिया है! क्या इस बात की गंभीरता को अमित शाह समझ रहे हैं? यह कितनी हैरानी की बात है कि घुसपैठियों को निकालना भाजपा का अपने जन्म के समय से एजेंडा रहा है और 12 साल तक देश में और 10 साल तक असम व त्रिपुरा जैसे सीमावर्ती राज्यों में लगातार सरकार चलाने के बावजूद घुसपैठ नहीं रूकी और न घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें देश से निकाला गया। अगर देश में मोदी की सरकार बनने पर यानी 2014 में तीन करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिए तो सरकार उनकी पहचान करके उसमें से 10 परसेंट को भी नहीं निकाल सकी तो यह सरकार की बड़ी विफलता है। और अगर सरकार बनने के बाद पिछले 12 साल में घुसपैठियों की संख्या बढ़ी है तो यह और भी बड़ी विफलता है। मतदाता सूची में नाम होना चुनाव जीतने, हारने के लिहाज से अहम हो सकता है लेकिन तीन करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठियों का देश में होना देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। सारे काम छोड़ कर सरकार को उन्हें निकालने का काम करना चाहिए। लेकिन सरकार ऐसा करती दिख नहीं रही है। सवाल है कि उसे इसकी परवाह नहीं है या ये आंकड़ा राजनीतिक है?