
Maharashtra MLC Election Results: महाराष्ट्र विधान परिषद (MLC) की 5 सीटों पर आए नतीजों ने राज्य की सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के भीतर जारी अंदरूनी कलह को सतह पर ला दिया है। कुल 5 सीटों में से गठबंधन को केवल 2 सीटों (भाजपा 1, शिवसेना 1) पर ही संतोष करना पड़ा, जबकि 3 सीटें विपक्ष के खाते में चली गईं। सबसे बड़ा झटका भाजपा को आरएसएस के गढ़ नागपुर में लगा, जहां कांग्रेस उम्मीदवार ने जीत हासिल की।
इस शिकस्त के बाद भाजपा और एकनाथ शिंदे नीत शिवसेना आमने-सामने आ गए हैं। भाजपा जहां शिवसेना पर ‘गठबंधन धर्म’ न निभाने का आरोप लगा रही है, वहीं शिवसेना नेताओं ने सीधे तौर पर राज्य के नेतृत्व में बदलाव करते हुए एकनाथ शिंदे को पुनः मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठाकर सियासी पारा चढ़ा दिया है।
क्या है भाजपा का आरोप?
भाजपा प्रवक्ता नवनाथ कमल ने आरोप लगाया है कि गठबंधन सहयोगी शिवसेना ने पुणे और नागपुर में उम्मीद के मुताबिक सहयोग नहीं किया। पुणे में शिवसेना द्वारा सचिन सनव को समर्थन देने और छत्रपति संभाजीनगर में अब्दुल सत्तार द्वारा एनसीपी के खिलाफ खुलकर प्रचार करने से महायुति को 3 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। ALSO READ: वाराणसी और नागपुर में भाजपा की हार! क्या 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए खतरे की घंटी हैं MLC नतीजे?
शिवसेना का भाजपा पर पलटवार
भाजपा के आरोपों पर शिवसेना नेता रवींद्र धंगेकर ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि शिक्षकों और स्नातकों में मौजूदा सरकार के प्रति असंतोष है। धंगेकर ने मांग की कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन कर एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए, क्योंकि वे सभी सहयोगियों को साथ लेकर चलने में सक्षम हैं।
क्या सत्तारूढ़ गठबंधन में गहरा सकते हैं मतभेद?
विधानसभा परिषद चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के बीच खींचतान और गहराने के संकेत मिल रहे हैं। नागपुर क्षेत्र मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और संघ (RSS) का गढ़ माना जाता है। वहां भाजपा की हार के बाद शिवसेना का सीधे मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर सवाल उठाना दोनों दलों के बीच विश्वास की कमी को दर्शाता है। एमएलसी चुनावों में भितरघात के आरोपों का असर आने वाले चुनावों पर पड़ सकता है। दोनों दल अब एक-दूसरे के प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार उतारने और दबाव बनाने की रणनीति अपना सकते हैं।
काडर के स्तर पर अविश्वास
शीर्ष नेतृत्व के साथ-साथ दोनों पार्टियों के जमीनी काडर के बीच दूरियां बढ़ रही हैं। भाजपा कार्यकर्ता शिवसेना को ‘अविश्वसनीय सहयोगी’ मान रहे हैं, जबकि शिवसैनिकों को लगता है कि सरकार में उन्हें वह तवज्जो नहीं मिल रही जिसके वे हकदार हैं।
विपक्ष को मिलेगी ऑक्सीजन
महायुति के इस अंदरूनी घमासान से महा विकास अघाड़ी (कांग्रेस, शिवसेना-UBT, एनसीपी-SP) को अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिल गया है, जिससे महायुति पर दबाव और बढ़ेगा। एमएलसी चुनाव के इन नतीजों ने महायुति की आंतरिक दरारों को उजागर कर दिया है। यदि भाजपा और शिवसेना का केंद्रीय नेतृत्व जल्द ही एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी पर रोक नहीं लगाता और आपसी मतभेदों को नहीं सुलझाता, तो यह दरार गठबंधन के अस्तित्व के लिए भी गंभीर खतरा बन सकती है।


