
पूर्वी लद्दाख में साल 2020 से जारी भारत और चीन के बीच सैन्य गतिरोध (India-China Face-Off) एक बार फिर चर्चा में है। इस बार चर्चा की वजह भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक (DG) का एक हालिया बयान और उस पर केंद्र सरकार द्वारा दी गई विस्तृत प्रतिक्रिया है। विपक्ष लगातार सीमा पर यथास्थिति और चीन द्वारा कथित अतिक्रमण को लेकर सरकार पर हमलावर है। ऐसे में, सरकार ने संसद और बाहरी बयानों के माध्यम से बॉर्डर की मौजूदा स्थिति स्पष्ट की है।
आइए जानते हैं कि आईटीबीपी प्रमुख ने क्या कहा, सरकार ने क्या जवाब दिया और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर जमीनी हकीकत क्या है।
चर्चा में क्यों? ITBP प्रमुख का कथित बयान
दरअसल, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में आईटीबीपी (जो चीन सीमा की रक्षा करने वाली प्राथमिक फोर्स है) के चीफ के हवाले से कहा गया था कि भारतीय सैनिक पूर्वी लद्दाख में कुछ पारंपरिक पेट्रोलिंग पॉइंट्स (गश्ती बिंदुओं) तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी, क्योंकि यह सीधे तौर पर सीमा पर भारतीय नियंत्रण की स्थिति पर सवाल उठाता था। विपक्ष ने इस बयान को लपकते हुए सरकार से पूछा कि क्या भारत ने अपनी जमीन खो दी है।
केंद्र सरकार का जवाब: “पीछे नहीं हटी भारतीय सेना”
आईटीबीपी चीफ के कथित बयान से उपजे विवाद और विपक्ष के तीखे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने स्थिति स्पष्ट की है। सूत्रों और रक्षा मंत्रालय की ओर से आए संकेतों के मुताबिक, सरकार ने उन दावों को खारिज कर दिया है जिनमें कहा गया था कि भारत ने नियंत्रण खो दिया है।
1. बफर जोन की हकीकत : सरकार का रुख है कि जिन पेट्रोलिंग पॉइंट्स की बात की जा रही है, वे दोनों सेनाओं के बीच हुए ‘डिसएंगेजमेंट’ (पीछे हटने) समझौतों के तहत अस्थायी रूप से ‘बफर जोन’ (मध्यवर्ती क्षेत्र) में आते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ने उस जमीन पर अपना दावा छोड़ दिया है। यह तनाव कम करने की एक रणनीतिक प्रक्रिया है।
2. गश्त पर कोई स्थायी रोक नहीं : सरकारी सूत्रों के अनुसार, सीमा पर तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए कुछ गश्ती बिंदुओं तक पहुंच को लेकर सुरक्षात्मक रणनीतियां अपनाई गई हैं, लेकिन इसे जमीन खोने या स्थायी तौर पर गश्त रोकने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भारतीय सेना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सभी क्षेत्रों पर मजबूत पकड़ बनाए हुए है।
3. चीन को कड़ा संदेश : संसद में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कई बार दोहराया है कि जब तक चीन सीमा पर अमन-चैन बहाल नहीं करता और ‘अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति’ (Status Quo Ante) पर नहीं लौटता, तब तक भारत के साथ रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते। सरकार का कहना है कि वे चीन के किसी भी एकतरफा प्रयास को स्वीकार नहीं करेंगे।
LAC पर अभी क्या हालात हैं? जमीनी तथ्य (Facts)
पूर्वी लद्दाख गतिरोध के करीब चार साल बाद भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। यहाँ वर्तमान हालात के प्रमुख बिंदु दिए गए हैं:
डिसएंगेजमेंट (Disengagement) कहाँ हुआ?
सैन्य और राजनयिक स्तर की कई दौर की वार्ताओं के बाद, दोनों सेनाएं प्रमुख फ्लैशपॉइंट्स से पीछे हटी हैं:
1. पैंगोंग त्सो (Pangong Tso): फरवरी 2021 में उत्तर और दक्षिण किनारों से सेनाएं पीछे हटीं।
2. ग्रा क (Gogra): अगस्त 2021 में पीपी-17ए (Patrolling Point-17A) से डिसएंगेजमेंट हुआ।
3. गलवान घाटी (Galwan Valley): जून 2020 की हिंसक झड़प के बाद, जहाँ भारत के 20 जवान शहीद हुए थे, यहाँ दोनों सेनाएं पीछे हटीं।
4. पेट्रोलिंग पॉइंट-15 (PP-15, हॉट स्प्रिंग्स): सितंबर 2022 में यहाँ से भी डिसएंगेजमेंट प्रक्रिया पूरी हुई।
डेपसांग (Depsang) और डेमचोक (Demchok) का पेंच:
सरकार ने स्वीकारा है कि डेपसांग मैदानों (Depsang Plains) और डेमचोक (Demchok) में अभी भी कुछ पुराने मुद्दे बने हुए हैं। यहाँ भारतीय सेना को पारंपरिक गश्ती बिंदुओं तक पहुँचने में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। इन दो क्षेत्रों पर डिसएंगेजमेंट के लिए बातचीत जारी है।
बफर जोन का निर्माण : प्रमुख संघर्ष क्षेत्रों से पीछे हटने के बाद, तनाव को रोकने के लिए कुछ क्षेत्रों को अस्थायी ‘नो-पेट्रोलिंग जोन’ या ‘बफर जोन’ में बदल दिया गया है। इसका मतलब है कि फिलहाल न भारतीय सेना और न ही चीनी पीएलए (PLA) उन विशिष्ट क्षेत्रों में गश्त कर रही है।
भारी सैन्य जमावड़ा (D escalation बाकी है) : भले ही कुछ जगहों से सेनाएं पीछे हटी हों, लेकिन पूरी तरह से ‘डी-एस्केलेशन’ (सैन्य जमावड़े को कम करना) अभी नहीं हुआ है। लद्दाख क्षेत्र में दोनों ओर से लगभग 50,000-60,000 सैनिक, टैंक, तोपखाने और उन्नत वायु रक्षा प्रणालियाँ तैनात हैं। सीमा पर स्थिति “तनावपूर्ण लेकिन स्थिर” बनी हुई है।
बुनियादी ढांचे का विकास : चीन लगातार सीमा के करीब बुनियादी ढांचे (सड़कें, पुल, हेलीपैड, गाँव) का निर्माण कर रहा है। इसके जवाब में, भारत सरकार ने भी सीमावर्ती बुनियादी ढांचे के विकास में तेजी लाई है। सेला सुरंग (Sela Tunnel) जैसी परियोजनाएं इसी दिशा में एक कदम हैं।
आईटीबीपी चीफ के कथित बयान और सरकार की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि सीमा पर स्थिति अत्यंत जटिल है। जहाँ सरकार डिसएंगेजमेंट के माध्यम से शांति का मार्ग तलाश रही है, वहीं रणनीतिक हितों और गश्ती बिंदुओं पर नियंत्रण को लेकर चिंताएं बरकरार हैं। जमीनी तथ्य बताते हैं कि भारत-चीन सीमा पर तनाव अभी खत्म नहीं हुआ है, और पूर्ण शांति बहाली के लिए अभी और वार्ताओं तथा विश्वास बहाली के उपायों की आवश्यकता है।


