फिल्म- दृश्यम द कन्क्लूजन
निर्देशक- अभिषेक पाठक
कलाकार- अजय देवगन, श्रिया सरन, तब्बू, प्रकाश राज, रजत कपूर, जयदीप अहलावत
रेटिंग-3/5
Drishyam The Conclusion Movie Review: फाइनली लंबे इंतजार के बाद अजय देवगन की पॉपुलर फ्रैंचाइजी का आखिरी पार्ट ‘दृश्यम द कन्क्लूजन’ रिलीज हो गया है। फिल्म ने रिलीज के पहले से काफी बज बनाया हुआ है। वहीं एंडवांस बुकिंग में भी अच्छा कलेक्शन किया हुआ है। लेकिन क्या वाकई फिल्म उम्मीदों पर खरी उतरी है, चलिए आपको बताते हैं।
फिल्म की कहानी
पार्ट वन से शुरू हुआ विजय सलगांवकर और पुलिस के बीच का खेल पार्ट 2 में बेहद इंट्रेस्टिंग हो जाता है। दूसरे पार्ट की कहानी ऐसे मोड़ पर खत्म होती है, जहां से दर्शकों का पार्ट 3 के लिए इंतजार चरम पर होता है। हर कोई जानने को बेताब था कि आखिरकार विजय का राज पुलिस के सामने खुल पाता है या फिर से वह बच जाएगा। वहीं विजय इस बार खुद नियति के भरोसे होता है। आर या पार…..। स्टोरी ‘दृश्यम 2’ की कहानी को आगे बढ़ाती हैं। ‘दृश्यम 3’ देखने से पहले पिछली फिल्मों की कहानी पता होना बेहद जरूरी है, वरना ये सिर के ऊपर जाएगी।
कहानी बेटे समीर को खोने और उसके कातिल को सजा न दिला पाने वाली पूर्व आईजी मीरा देशमुख यानी तब्बू के खुदखुशी करने से शुरू होती है। अपनी पत्नी को बुरे हाल में देखकर उसके पति महेश देशमुख यानी रजत कपूर बेटे के केस को री-ओपन करने की रिक्वेस्ट करता हैं। केस खुलने के बाद कहानी में एंट्री होती हैं क्राइम ब्रांच के एसपी राजवीर सिंह तोमर यानी जयदीप अहलावत की।
तोमर अपने आप को ‘शनि’ बताता है। राजवीर की पैनी नजरें विजय सलगांवकर और उसके परिवार पर गड़ी हैं। विजय का पूरा परिवार फिर से पुलिस, केस, कोर्ट के चक्कर में फंसने लगते हैं। पुलिस के पास विजय के झूठ का पर्दाफाश करने के लिए नए सबूत के साथ ही गवाह भी हैं। वहीं एक भी केस न हारने वाला वकील इंद्रजीत शेट्टी यानी प्रकाश राज का साथ भी है। अब ‘2 अक्टूबर को क्या हुआ था?’ के साथ-साथ ’23 जुलाई को किस जुर्म को अंजाम दिया गया?’ और विजय सलगांवकर इस बच पाता है या नहीं इन सब सवालों के जवाब के लिए आपको फिल्म को देखना होगा।
भागती हुई फिल्म की कहानी
इस बार कहानी कहने में अभिषेक पाठक ने थोड़ी जल्दबाजी कर दी है। अपने अंत तक पहुंचने में विजय काफी भागता हुआ नजर आता है। फिल्म ने ‘फैमिली मैन’ विजय को लगभग पूरी तरह से साइड कर दिया है। फिल्म के पहले हिस्से में श्रिया सरन और विजय की दोनों बेटियों (इशिता दत्ता और मृणाल जाधव) को बेहद कम स्क्रीन स्पेस और डायलॉग मिले हैं। यही बात कहानी को कमजोर करती है। ओरिजिनल ‘दृश्यम’ को इतना असरदार उसके परिवार ने बनाया था। विजय सिर्फ पुलिस को चकमा देने वाला आदमी नहीं था, वह एक ऐसा पति और पिता भी था जो अपने परिवार की हर तरह से सुरक्षा करता है। उसकी आम और प्यारी छोटी सी दुनिया ने ही उसके असाधारण कामों को और भी ज्यादा दिलचस्प बना दिया था। इस बार फिल्म सिर्फ विजय पर फोकस करती है। कहीं न कही जितनी जरूरत नहीं थी उससे ज्यादा तनाव के माहौल को क्रिएट किया गया है। मोटामोटी कहें तो फिल्म इससे बेहतरीन फेयलवेल डिजर्व करती थी।
कैसा है क्लाइमेक्स?
इस बार में सस्पेंस उम्मीद से कम है और ड्रामेबाजी ज्यादा है। क्लाइमेक्स आपको बहुत ज्यादा इंप्रेस नहीं कर पाता है। जैसे-जैसे फिल्म अपने क्लाइमेक्स की ओर जाती है, इसमें जबरदस्ती वाला ड्रामा देखने को मिलता है, जो आपको बड़े खुलासे के लिए थोड़ा उत्सुक बनाता है। लेकिन जब यह समझ आता है कि विजय जैसा स्कूल ड्रॉपआउट अपनी चालाकी को कैसे अंजाम देता है, तो फिल्म पूरी तरह से बेहद आम सी हो जाती है। वह शानदार प्लानिंग जिसने कभी हमें विजय के दिमाग़ की तारीफ करने पर मजबूर किया था, वह यहां आकर न के बराबर हो जाती है।
कलाकार
काम के मामले में अजय देवगन शानदार हैं इसमे कतई शक नहीं किया जा सकता है। अपनी आंखों से एक्टिंग करने के लिए मशहूर उन्होंने फिल्म में भी इसका जादू दिखाया हैं। नंदिनी के रोल में श्रिया सरन को अपनी छाप छोड़ने के लिए बस एक ही सीन मिला है। जयदीप अहलावत राजवीर के रोल में शानदार हैं। टॉप लॉयर इंद्रजीत शेट्टी के रोल में प्रकाश राज ठीक हैं। अमर मोहिले का बैकग्राउंड स्कोर ने फिल्म की शान को बरकरार रखा है।
फिल्म देखें या नहीं
‘दृश्यम: द कंक्लूजन’ में दर्शकों के लिए एक फिल्म कम और यादों का खजाना ज्यादा है। फ्रैंचाइजी को लोगों ने बहुत प्यार दिया। फिल्म बढ़िया है, लेकिन थोड़ा और शानदार तरीके से पेश की जा सकती थी। फिल्म को सिनेमाघरों में एक बार देखने जाना चाहिए। आखिर विजय के साथ क्या होता आपको भी तो जानना है।

