
रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली हो गई। दस-राजाजी मार्ग पर जन-संसद में मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर महाभियोग प्रस्ताव भी पारित हो गया। इंडिया समूह के सभी 22 राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी एकजुटता ज़ाहिर करने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी। द्रमुक, आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल और यूनाइटेड जनता दल समेत इंडिया समूह के छह पुराने साथी इस बीच छिटक चुके हैं। फिर भी विपक्ष के इन दोनों आयोजनों ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार में ख़ासी थरथराहट पैदा कर दी है।
अब तक राहुल गांधी को इंडिया समूह का निर्विवाद नेता माने जाने पर सवाल उठते रहते थे। रविवार की रैली और शनिवार की जन-संसद के बाद अब वे ज़रा थमने लगेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के बरक्स राहुल खड़े तो पिछले बारह बरस से थे, मगर उन की अविचलता और अनवरतता ने अंततः उन्हें ठोस विकल्प की तरह स्थापित कर दिया है। भाजपा के भीतर इस से जन्मी छटपटाहट उस के हर झरोखे से झांकती साफ़ दिखाई दे रही है। केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा में भाजपा के नेता जगत प्रकाश नड्डा ने रामलीला मैदान की तरफ़ बढ़ते लोगों के सैलाबी दृश्यों के बीच टीवी-हस्तक्षेप कर जिस तरह प्रतिपक्षी रैली को सिखों के ज़ख़्म कुरेदने का अपकर्म बताया और आजकल रहस्यमयी अपयश के थपेड़े झेल रहे केंद्रीय मंत्री ने दिल्ली के हरिनगर में सिखों का जुलूस निकाला, उस ने भाजपा की बिलबिलाहट को उमूमी कर डाला।
रैली में राहुल के इस उद्घोष से सत्तासीनों में खलबलाहट मचनी स्वाभाविक है कि वोट-चोरी के गु़नाहगारों को न तो बख़्शा जाएगा, न भागने दिया जाएगा और न कभी भूला जाएगा। ऐसे ऐलान राजनीतिक जनसभाओं में आमतौर पर होते हैं। हुक़ूमत में बैठे कर्णधार भी यह जुमलेबाज़ी करते हैं और विपक्ष के सक्कान-गीर भी। इस तरह की बातें, सुनने वालों पर तात्कालिक प्रभाव तो छोड़ती हैं, लेकिन उन पर होने वाला अमल समय के साथ जुगाड़ू परिस्थितियों के हवाले हो जाता है। मगर राहुल के रुख में निर्णायक गाढ़ेपन के जैसे नज़ारे पिछले बाईस बरस में दिखे हैं, वे नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह की आज की भाजपा की चिंता बढ़ा रहे हैं। वे समझ गए हैं कि जिस दिन केंद्र की सत्ता से भाजपा जाती रहेगी, क़ानून का बघनखा उसे और उस के अनुचरों को कैसे-कैसे दिन दिखाएगा।
दिन-रात विपक्ष मुक्त भारत की स्थापना का अपना ख़्वाब पूरा करने की तिकड़मों में लगे रहने वाले और तरह-तरह के विमर्श गढ़ कर उन का सक्रिय साथ देने वाले भी यह जानते हैं कि यह सपना पूरा होना कितना मुश्क़िल है। अगर 2014 में और उस के बाद 2019 में, विपक्ष तो छोड़िए, कांग्रेस का भी पूरा सफ़ाया नरेंद्र भाई के रणबांकुरे नहीं कर पाए तो अब 2024 के बाद तो उन के नाखून वैसे ही घिस-घिसा चुके हैं। सम्राट की मूंछों का ताव देख-देख कर कंपकंपा रहा मुल्क़ अब ‘राजा नंगा है’ कहने को पुनर्जीवित हो गया है। सो, वो दिन हवा हुए, जब सुल्तान अपनी चुटकी में सब-कुछ मसल देने की ताक़त के अहसास से लबरेज़ थे। खलीफा भी समझ गए हैं कि अब वे ‘ख़तम खलीफा‘ हो चुके हैं।
विपक्ष की ऐसी मरघिल्ली हालत में भी इंडिया समूह के लोकसभा में 184 और राज्यसभा में 63 सदस्य हैं। यानी 247 सांसद। यह संसद का एक तिहाई से थोड़ा ज़्यादा हिस्सा है। एनडीए के पास दोनों सदनों में मिला कर सांसदों का 58 फ़ीसदी हिस्सा ज़रूर है, मगर भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि संसद में उस का ख़ुद का तो हिस्सा 45 प्रतिशत ही है। देश भर में इंडिया समूह के राजनीतिक दलों के 1221 विधायक हैं और विधान परिषदों में उन के 97 सदस्य हैं। सवा तेरह सौ की इस संख्या को नगण्य मानने वाले भले ही उपेक्षा भाव से देखें, लेकिन हक़ीक़त तो यही है कि प्रदेशों की विधानसभाओं और विधानपरिषदों में भी एक तिहाई हिस्सा इंडिया समूह की झोली में है।
2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र भाई की भाजपा को 17 करोड़ 16 लाख 60 हज़ार 230 वोट मिले थे। तब 53 करोड़ 38 लाख 1 हज़ार 801 मतदाताओं ने मतदान किया था। यानी 36 करोड़ 21 लाख 41 हज़ार 571 मतदाता ऐसे थे, जिन्होंने नरेंद्र भाई का समर्थन नहीं किया था। सवा सत्रह करोड़ लोगों ने उन्हें वोट दिए और, इस से दुगने से भी ज़्यादा, सवा छत्तीस करोड़ ने उन्हें वोट नहीं दिए। फिर आया 2019 का चुनाव और नरेंद्र भाई को 22 करोड़ 90 लाख 76 हज़ार 879 वोट मिले। तब 61 करोड़ 36 लाख 57 हज़ार 105 लोग वोट देने गए थे। यानी 38 करोड़ 45 लाख 80 हज़ार 226 मतदाताओं ने भाजपा के ख़िलाफ़ अपनी राय ज़ाहिर की थी। तो जिस चुनाव में नरेंद्र भाई को 303 सीटों की मोटी गठरी मिली थी, उस में भी भाजपा का साथ देने वाले मतदाताओं के बनिस्बत तक़रीबन पौने दो गुने ज़्यादा मतदाता ऐसे थे, जो ख़िलाफ़ थे।
फिर आया 2024 का चुनाव, जिस में नरेंद्र भाई ने ‘अब की बार, चार सौ पार’ का नारा बुलंद किया था। इस चुनाव में भाजपा को 23 करोड़ 59 लाख 74 हज़ार 144 वोट मिले थे। कुल 64 करोड़ 64 लाख 20 हज़ार 869 वोट पड़े थे। यानी 41 करोड़ 4 लाख 46 हज़ार 725 मतदाता भाजपा के विरोध में वोट दे कर लौटे थे। नरेंद्र भाई को पसंद करने वाले मतदाताओं की तुलना में पौने दो गुने से ज़्यादा मतदाता ऐसे थे, जिन्हें वे पसंद नहीं थे। तो 2014 से ले कर 2024 तक के चुनावों में साढ़े 63 से ले कर साढ़े 68 प्रतिशत मतदाता अगर भाजपा के ख़िलाफ़ वोट देते रहे हैं तो 2029 आते-आते होने वाले हालात के आसार क्या नरेंद्र भाई को समझ में नहीं आ रहे होंगे?
चुनावों में गुप्त मतदान के बावजूद अगर ऐसी कोई तकनीकी होती, जो यह पता कर सकती कि देश भर की मतदाता सूचियों से गहन पुनरीक्षण के बहाने बाहर किए गए साढ़े 13 करोड़ मतदाताओं में उन 41 करोड़ में से कितने शामिल हैं, जिन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के ख़िलाफ़ वोट दिया था, तो आप-हम एक बहुत ही दिलचस्प दृश्य से रू-ब-रू हो रहे होते। राहुल चूंकि चुनाव प्रबंधन के इस तहखाने में घुस गए हैं, इसलिए विपक्ष की रैली में आए लोगों की तादाद को कम-से-कम दिखाने के लिए भाजपा तो भाजपा, उस से नत्थी विचार-केंद्रों के प्रमुख तक, रामलीला मैदान की नपती कर के देश को यह बताने में जुटे हुए हैं कि एक व्यक्ति को खड़े रहने और बैठने के लिए कितने वर्ग फुट की जगह लगती है।
मगर मुद्दा अब प्रति व्यक्ति बनाम वर्ग फुट का नहीं, प्रति व्यक्ति एक वोट की सुरक्षा का हो गया है। सो, रामलीला की रैली में 75 हज़ार लोग आए हों तो, एक लाख लोग आए हों तो और पांच लाख लोग आए हों तो – अहमियत इस बात की है कि लोगों का हुजूम आया, पड़ौसी राज्यों से ही नहीं, पूरब, पश्चिम और दक्षिण के दूरदराज़ प्रदेशों से भी ‘न भूतो’ अंदाज़ में दिल्ली आया। चोरी-सीनाज़ोरी से अंतिम युद्ध छेड़ने का संकल्प ले कर लौटा। इस बार के रामलीला मैदान ने इसी वज़ह से नरेंद्र भाई का चैन छीन लिया है।

