Donald Trump Challenges: कहते हैं कि शक्ति का अहंकार इंसान को अंधा बना देता है, लेकिन जब वही शक्ति छिनती है, तब आईना उस व्यक्ति को उसकी असली औकात दिखाता है। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों (US Midterm Elections 2026) में रिपब्लिकन पार्टी को मिली करारी शिकस्त के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की स्थिति भी कुछ ऐसी ही हो गई है। जिस व्यक्ति ने अपनी ताकत के मद में पूरी दुनिया में अस्थिरता का माहौल पैदा कर दिया था, अब उन्हीं ट्रंप के दूसरे कार्यकाल पर संकट के काले बादल मंडराने लगे हैं।
जैसी करनी, वैैैसी भरनी
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट दोनों जगह बहुमत गंवाने के बाद ट्रंप की प्रशासनिक ताकत काफी हद तक कमजोर पड़ गई है। आने वाले दो वर्षों में ट्रंप को न केवल अपनी ही पार्टी के भीतर बगावती सुरों से निपटना होगा, बल्कि विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाली कांग्रेस द्वारा शुरू की जाने वाली कड़ी संसदीय जांचों, उनके परिवार के व्यावसायिक हितों और पाकिस्तान के साथ विवादित क्रिप्टो सौदों जैसे गंभीर आरोपों का सामना भी करना पड़ सकता है।
दरअसल, ट्रंप ने तो अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों को भी नहीं बख्शा। उनका मजाक उड़ाया। ट्रंप ने जो बाइडेन को चिढ़ाने के लिए ‘स्लीपी जो’ उपनाम दिया और अक्सर उनकी मानसिक तीक्ष्णता, याददाश्त और शारीरिक क्षमता पर सवाल उठाए। ट्रंप कई बार रैलियों में बाइडेन के बोलने या चलने के तरीके की नकल उतारकर उनका मजाक उड़ाते भी दिखे। इतना ही नहीं ट्रंप ने कई मौकों पर बाइडेन को ‘अमेरिकी इतिहास का सबसे भ्रष्ट और अक्षम राष्ट्रपति’ करार दिया।
ढीले पड़ेंगे ट्रंप के तेवर
इतना ही नहीं, राजनीति में आने के शुरुआती दौर में ट्रंप ने एक बड़ा विवाद खड़ा किया था, जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि बराक ओबामा का जन्म अमेरिका में नहीं बल्कि केन्या में हुआ है, इसलिए वे राष्ट्रपति बनने के योग्य नहीं हैं। हालांकि बाद में उन्होंने इस दावे को वापस ले लिया था। ट्रंप की इन पुरानी हरकतों को देखकर लगता है कि इतिहास खुद को दोहराता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिन तेवरों के साथ उन्होंने राष्ट्रपति पद संभाला था, उसके कहीं ज्यादा बुरी उनकी विदाई हो सकती है।
ट्रंप के सामने 4 बड़ी चुनौतियां
अमेरिकी संसद में बहुमत खोने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए अगला दो साल का कार्यकाल राजनीतिक और व्यक्तिगत रूप से बेहद मुश्किल भरा साबित होने जा रहा है। अमेरिकी इतिहास गवाह है कि जब भी किसी राष्ट्रपति की पार्टी मध्यावधि चुनावों में अपना नियंत्रण खोती है, तो व्हाइट हाउस के पास कार्यकारी फैसले पारित करने के अलावा विकल्प सीमित हो जाते हैं। हालांकि ट्रंप के पास वीटो पॉवर का विकल्प भी है। अमेरिकी विश्लेषकों के अनुसार, चुनावों में हार के बाद कमजोर पड़े ट्रंप को आने वाले दिनों में बड़े राजनीतिक संकटों से जूझना पड़ सकता है-
पारिवारिक व्यवसाय और ‘इंट्रेस्ट ऑफ कॉन्फ्लिक्ट’ की कड़ी जांच : डोनाल्ड ट्रंप के बेटों— जूनियर ट्रंप, एरिक ट्रंप और दामाद जेरेड कुशनर पर पद का फायदा उठाकर निजी कारोबारी सौदों को बढ़ावा देने के आरोप लगातार लगते रहे हैं। संसद में बहुमत हासिल करने के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी अब ट्रंप परिवार की कंपनियों, विदेशी निवेशकों के साथ हुए रियल एस्टेट करारों और कुशनर के मध्य-पूर्व से जुड़े निवेशों को लेकर सीधे सबपीना (Subpoena – आधिकारिक समन) जारी कर सकती है और संसदीय जांच शुरू कर सकती है।
पाकिस्तान के साथ क्रिप्टो डील : ट्रंप परिवार की 60% हिस्सेदारी वाली क्रिप्टो कंपनी ‘वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल’ (World Liberty Financial) और पाकिस्तान के बीच हुए विवादित करारों पर अब कानूनी शिकंजा कसना तय माना जा रहा है। ट्रंप जूनियर, एरिक और जेरेड कुशनर से जुड़ी इस क्रिप्टो फर्म का ‘पाकिस्तान क्रिप्टो काउंसिल’ के साथ हुआ समझौता लगातार सवालों के घेरे में रहा है। डेमोक्रेट्स का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन अपनी विदेश नीति और मध्य-पूर्व या दक्षिण-एशियाई कूटनीति को अपने निजी वित्तीय फायदों के साथ मिला रहा है। कांग्रेस अब इस बात की विस्तृत जांच कराने की तैयारी में है कि क्या इस क्रिप्टो डील ने अमेरिकी विदेश नीति या राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों से कोई समझौता किया है।
पार्टी के अंदर बगावत और महाभियोग का खतरा : मध्यावधि चुनावों में हार का ठीकरा रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ही ट्रंप की नीतियों पर फोड़ा जा रहा है। रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता अब 2028 के राष्ट्रपति चुनाव को ध्यान में रखते हुए खुद को ट्रंप के उग्र रुख से अलग करने लगे हैं। खुद उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने हार के लिए ईरान युद्ध को जिम्मेदार ठहराया है। सदन में नियंत्रण हासिल करने के बाद डेमोक्रेटिक सांसद ट्रंप प्रशासन के फैसलों, कैबिनेट मंत्रियों की कार्यशैली और शक्तियों के दुरुपयोग को लेकर नए महाभियोग प्रस्तावों या महाभियोग जांच की शुरुआत कर सकते हैं।
बजट, कैबिनेट नियुक्तियों और विधेयकों पर लगेगा ब्रेक : अभी तक हर मामले में मनमानी करने वाले डोनाल्ड ट्रंप हाउस और सीनेट में बहुमत न होने से अपने मनमुताबिक बजट पारित नहीं करा पाएंगे। इसके अलावा किसी भी महत्वपूर्ण सरकारी योजना या रक्षा बजट के लिए उन्हें डेमोक्रेट्स से समझौता करना होगा। भविष्य में यदि किसी सुप्रीम कोर्ट जज या कैबिनेट मंत्री की नियुक्ति की नौबत आती है, तो सीनेट से उसकी मंजूरी पाना बेहद कठिन हो जाएगा। आयात शुल्क (Tariffs) और आव्रजन (Immigration) पर उनकी सख्त नीतियों को भी अदालत व संसद दोनों जगह कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
मध्यावधि चुनावों के इन नतीजों ने डोनाल्ड ट्रंप को अपने दूसरे कार्यकाल के अंतिम पड़ाव पर एक बेहद कमजोर स्थिति में ला खड़ा किया है। व्यावसायिक फायदों से जुड़े आरोप, पाकिस्तान क्रिप्टो डील का जिन्न और संसद का कड़ा रुख आने वाले दो सालों तक ट्रंप प्रशासन के लिए लगातार राजनीतिक भूचाल की वजह बना रहेगा।

