
तालिबान के सामने सीधे लड़ाई करने में नुकसान उठा रहे पाकिस्तान ने अब नई तकनीक अपनाई है। आसिम मुनीर अब अफगान सेना के पुराने सैनिकों और अफगान लोगों को ट्रेनिंग देकर तालिबान के खिलाफ गृहयुद्ध जैसे हालात बनाने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए मुनीर अफगानिस्तान के खिलाफ नापाक प्लान बना रहा है।
बता दें कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान तालिबान के बीच हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। शुरुआत में आमने-सामने की लड़ाई लड़ रही पाकिस्तानी सेना को तालिबान लड़ाकों के हाथों बेहद परेशानी का सामना करना पड़ा था। इस युद्ध में सैंकड़ों सैनिक मारे जा चुके हैं। लेकिन अब पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने अफगानिस्तान को बड़ी परेशानी में डालने का क्रम शुरू कर दिया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तानी आर्मी अफगान सेना के लड़ाकों और स्थानीय इस्लामिक कट्टर पंथियों को तालिबान के खिलाफ हथियार उठाने के लिए एकत्र कर रही है। न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान तालिबान के खिलाफ युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए पाकिस्तानी सेना ने बलोचिस्तान में एक ट्रेनिंग कैंप भी लगाया हुआ है। यहां से ट्रेनिंग लेने के बाद इन लड़ाकों को अफगानिस्तान वापस भेजा जाएगा। यह दावा ऐसे समय में सामने आया है, जब तालिबान में अफगानिस्तान शासन शुरू होने के बाद दोनों ही देश एक दूसरे के ऊपर विरोधी गुटों को मदद करने का आरोप लगा रहे हैं।
लड़ाकों को एकत्र करना शुरू : एक बलोच रिपोर्टर के मुताबिक, पाकिस्तानी आर्मी ने तालिबान हमले के बाद बिखर चुकी अफगान सेना के लड़ाकों को एकत्र करना शुरू किया है। इसके अलावा कई स्थानीय नेता भी हैं, जिनके आदमियों को इस काम में लगाया गया है। इन सभी को नए सिरे से ट्रेनिंग देने के लिए पाकिस्तान ने बलोचिस्तान के दालबानदिन में कैंप लगाया हुआ है। ऐसे ही और कैंप जल्दी ही कुचलाक और क्वेटा में भी लगने की आशंका है। अपनी जनता को खाना खिलाने में मोहताज पाक आर्मी इन लड़ाकों को 15,000 से 20,000 रुपए महीने की तनख्वाह भी दे रही है।
बता दें कि ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है, जब पाकिस्तानी आर्मी अफगानिस्तान में इस तरह से दखलअंदाजी कर रही है। अमेरिका के पैसों के लालच में भी पाकिस्तान ने ही तालिबान लड़ाकों को सोवियत रूस के खिलाफ लड़ने के लिए ट्रेनिंग दी थी। अब जबकि तालिबान सत्ता में काबिज है, तो पाकिस्तान उसके खिलाफ लड़ाकों को ट्रेनिंग दे रहा है। अफगानी लोगों के बीच में इस वजह से भी पाकिस्तान के प्रति नफरत का माहौल रहता है, क्योंकि जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मानता है कि वह पाकिस्तान ही था, जिन्होंने अफगानिस्तान में कट्टरता और आतंक को बढ़ावा दिया था। बाद में पाकिस्तान ने अमेरिकी डॉलर्स के लालच में आकर तालिबान के खिलाफ उसकी लड़ाई में मदद करनी शुरू कर दी। इससे हुआ यह को कट्टरपंथी और लिबरल दोनों ही अफगानी पाकिस्तान के खिलाफ हो गए।
पाकिस्तान शुरुआत से ही तालिबान को अपने इशारों पर नचाने का सपना देखता रहा है। शुरुआत में जब तालिबान ने पहली बार अफगानिस्तान पर अपनी सत्ता काबिज की, तो पाकिस्तान के साथ उनके अच्छे संबंध थे। लेकिन बाद में अमेरिकी हमला और पाकिस्तान का उसके पीछे जाने ने पूरी कहानी पलट दी। 20 के खून खराबे के बाद जब अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से वापस लौटे, तो पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने इसे गुलामी की जंजीरों का टूटना करार दिया। हालांकि, तालिबान ने उनकी तरफ से आए दोस्ती के हाथ को पूरी तरह से ठुकरा दिया।


