वंदे मातरम पर शर्मिला टैगोर की टिप्पणी से भड़कीं कंगना रनौत, बोलीं- ‘कला और कविता को लेकर सोच इतनी छोटी कैसे?

वंदे मातरम पर शर्मिला टैगोर की टिप्पणी से भड़कीं कंगना रनौत, बोलीं- ‘कला और कविता को लेकर सोच इतनी छोटी कैसे?

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एक्ट्रेस शर्मिला टैगोर की वंदे मातरम पर टिप्पणी पर भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने कड़ी नाराजगी जताई है। शर्मिला टैगोर ने कहा था कि वंदे मातरम के कुछ हिस्से एक ईश्वर को मानने वाले लोगों की आस्था से मेल नहीं खा सकते। उन्होंने कहा कि गीत में कई देवताओं का जिक्र है। उन्होंने कहा कि हैरान हूं कि आपकी सोच इतनी छोटी है। ALSO READ: वंदे मातरम् पर कांग्रेस का बड़ा फैसला, 1937 के प्रस्ताव पर कायम, पार्टी कार्यक्रमों में गाए जाएंगे सिर्फ पहले दो अंतरे

 

कंगना ने शर्मिला टैगोर के इंटरव्यू का वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर करते हुए लिखा, 'मैं खुश हूं कि शर्मिला जी ने वंदे मातरम को लेकर अपनी आपत्ति के बारे में बात की। लेकिन एक कलाकार के तौर पर मैं हैरान हूं कि कला और कविता को लेकर उनकी सोच इतनी छोटी और बनावटी कैसे हो सकती है।'

 

भाजपा सांसद ने आगे लिखा कि किसी भी कविता या गीत में शब्द रूपक होते हैं। कवि या कलाकार मनचाहा असर पैदा करने के लिए हर तरह की कल्पना करता है और असंभव लगने वाली समानताएं खींचता है। विवेकानंद ने तौर पर कहा था कि मुझे ऐसे युवा चाहिए, जो लोहे जैसे बने हों, जिनकी हड्डियां फौलाद की हों और जिनकी नसों में बिजली दौड़ती हो। विवेकानंद मौसम का अनुमान नहीं बता रहे थे। वह केवल शक्ति को जगाने की मांग कर रहे थे। कृपया हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आइए।

 

आखिर में कंगना ने लिखा कि भले ही हम एक ईश्वर में विश्वास करते हों, डॉक्टर भी ताकत को शक्ति कहते हैं। आइए, एक-दूसरे को अपनों की तरह अपनाएं। मैं आपसे बहुत प्यार करती हूं और उस जोरदार गले मिलने से भी मुझे परेशानी नहीं है, जैसा आप हमेशा देती हैं। ALSO READ: मुकेश खन्ना ने 'जन गण मन' को हटाने की उठाई मांग, 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान बनाने की कही बात

 

क्या था शर्मिला का बयान?

शर्मिला टैगोर ने कहा कि मेरी राय यह है कि बहुत से धार्मिक लोग एक ही ईश्वर में विश्वास करते हैं, कई ईश्वरों में नहीं। वंदे मातरम में एक अंतरा है, जिसमें कई देवताओं का जिक्र है।
 

उन्होंने आगे कहा कि जो लोग एक धर्म में विश्वास करते हैं, उनके लिए ‘वंदे काली, वंदे दुर्गा’ कहना मुश्किल है। इसलिए, अगर हम भारत के सभी धार्मिक लोगों को साथ लेकर चलें, तो इसके पहले दो अंतरे बहुत अच्छे हैं।