
-ओंकार सिंह जनौटी
पश्चिम की पांच सबसे बड़ी तेल कंपनियों को 2026 की तीसरी तिमाही में 53 अरब डॉलर का मुनाफा होने जा रहा है। यह मुनाफा, साल की दूसरी तिमाही (अप्रैल-जून) में हुए 48 अरब डॉलर के प्रॉफिट से भी ज्यादा है। साल भर पहले की तुलना में यह दोगुने से भी ज्यादा है। मुनाफे का यह अनुमानित आंकड़ा आरबीसी कैपिटल मार्केट्स ने दिया है। ALSO READ: चीन ने क्यों बढ़ाई टेक कंपनियों और टैलेंट की यात्रा पर सख्ती
मुनाफा कमाने वाली इन तेल कंपनियों में ब्रिटेन की ब्रिटिश पेट्रोलियम (बीपी), अमेरिका की शेवरॉन और एक्सॉन मोबिल, ब्रिटेन और नीदरलैंड्स की शेल और फ्रांसीसी तेल कंपनी टोटल एनर्जी शामिल हैं। इस दौरान 40 लाख बैरल तेल की रिफाइनिंग कैपासिटी वाली कंपनी, एक्सॉन मोबिल को सबसे ज्यादा फायदा हुआ।
28 फरवरी 2026 को शुरू हुए ईरान युद्ध के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें महंगी बनी हुई हैं। युद्ध से पहले कच्चे तेल के दाम 68 से 72 डॉलर प्रति बैरल थे। सितंबर 2026 के आखिर में यह दाम 94 से 106 डॉलर प्रति बैरल बने हुए हैं।
मांग और सप्लाई का संतुलन गड़बड़ाया
इस साल अमेरिका और इस्राएल ने ईरान के शीर्ष धार्मिक-राजनीतिक नेतृत्व, मिसाइल व परमाणु ठिकानों के साथ साथ ऊर्जा ठिकानों पर भी हमले किए। 28 फरवरी को हुए शुरुआती हमलों में ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातोल्लाह अली खमेनेई की मौत हो गई। इसके बाद ईरान ने भी सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और ऊर्जा संयंत्रों पर भीषण हमले किए।
पलटवार के दौरान ही ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले दुनिया के सबसे अहम जलमार्ग को बंद कर दिया। दोनों पक्षों ने होर्मुज शिपिंग रूट पर तेल टैंकरों और कई कार्गो जहाजों को निशाना बनाया। दुनिया की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाले पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का 25 फीसदी हिस्सा इसी रूट से गुजरता था। हर दिन दो करोड़ बैरल कच्चे तेल की सप्लाई के बजाए अब वहां से 1.3 करोड़ बैरल तेल भी बड़ी मुश्किल से निकल पा रहा है। सप्लाई में आई इस कमी और इस जोखिम का असर भारत, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया और खुद अमेरिका पर भी पड़ रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में जहाजों पर मंडराते खतरे के बीच, कई तेल टैंकर अब अफ्रीकी महाद्वीप का लंबा चक्कर काटकर एशिया से यूरोप या उत्तरी अमेरिका रवाना हो रहे हैं। इस लंबी यात्रा के चलते भी तेल के दाम बढ़े हैं। ALSO READ: भारत की तेज आर्थिक वृद्धि में भी युवा क्यों परेशान हैं
मुनाफे के बावजूद तेल कंपनियों की हिचक
तेल कंपनियां, मुनाफे की इस रकम का इस्तेमाल घाटा भरने के लिए कर रही हैं। इस साल की पहली तिमाही में इन तेल कंपनियों का कुल घाटा 200 अरब डॉलर था, जो घटकर 150 अरब डॉलर रहने का अनुमान है।
दूसरी तरफ तेल कंपनियां नए निवेश को भी टालती दिख रही हैं। बीते 10 साल में बड़ी तेल कंपनियों ने अपनी रिफाइनिंग की क्षमता को बढ़ाने के बजाए घटाया है। पर्यावरणीय चिंताओं और जीवाश्म ईंधन के कमजोर भविष्य को इसकी बड़ी वजह बताया जाता है। स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती मांग के चलते तेल कंपनियों को यह पता नहीं चल पा रहा है कि भविष्य में जीवाश्म ईंधन की मांग कितनी स्थिर रहेगी। मध्य पूर्व के संकट ने इस सोच पर डाला है।
तेल कंपनियां अब यूरोप या उत्तरी अमेरिका में निवेश करने के बजाए एशिया और अफ्रीका में नई रिफाइनरियां लगाने की योजनाएं बना रही हैं। ईरान युद्ध के बाद बड़ी तेल कंपनियां मध्य पूर्व में निवेश करने में भी हिचक रही हैं। एशिया में पेट्रोल, डीजल और गैस की मांग अभी कम से कम दो दशकों तक बनी रहेगी। इस बीच नामीबिया, ब्राजील, अंगोला और वेनेजुएला तेल कंपनियों की आंखों में चमक रहे हैं। ALSO READ: एआई के डर से अब चीन भी अछूता नहीं, पर ट्रंप नहीं मान रहे
कैसे देशों की नींद उड़ा रहा है महंगा डीजल
दुनिया भर में सप्लाई होने वाला करीब 90 फीसदी सामान, डीजल मोटर पर निर्भर है। ऑयल टैंकर, कार्गो शिप, ट्रक, मालगाड़ियां और हेवी ड्यूटी वाहन डीजल से चलते हैं। महंगा डीजल, सप्लाई चेन कम से कम दो मुख्य बिंदुओं पर प्रभावित करता है। पहला शिपिंग की लागत बढ़ जाती है, दूसरा माल को आखिरी कोने तक पहुंचाने वाला परिवहन भी महंगा हो जाता है। माल भाड़े में होने वाली इस वृद्धि का असर इस परिवहन पर निर्भर हर उत्पाद और सेवा पर पड़ता है।


