आज के दौर में मोबाइल फोन ने पर्स की जगह काफी हद तक ले ली है। अब कई लोग घर से निकलते समय सिर्फ मोबाइल और चाबी साथ रखते हैं, क्योंकि पेमेंट से लेकर आइडेंटिटी से जुड़े कई काम फोन से ही हो जाते हैं। लेकिन क्या यह आदत सिर्फ सुविधा का हिस्सा है या फिर आपकी सोच और लाइफस्टाइल के बारे में भी कुछ संकेत देती है?
मिनिमलिस्ट सोच की झलक

अगर आप बिना पर्स के बाहर निकलते हैं, तो हो सकता है कि आपको सिर्फ जरूरी सामान साथ रखना पसंद हो। साइकोलॉजी के अनुसार ऐसे लोग अक्सर सिम्पलिसिटी और ऑर्गनाइज़्ड लाइफ को महत्व देते हैं। वे मानते हैं कि कम सामान के साथ चलने से जिंदगी आसान और कम उलझन वाली रहती है।
नई टेक्निक पर ज्यादा भरोसा

UPI, मोबाइल बैंकिंग, डिजिटल वॉलेट और डिजिटल आईडी ने लोगों की आदतें बदल दी हैं। जो लोग नई टेक्निक को जल्दी अपनाते हैं, वे मोबाइल से पेमेंट और दूसरे डिजिटल काम करने में सहज महसूस करते हैं। इसलिए उन्हें हर समय पर्स साथ रखने की जरूरत नहीं लगती।
सुविधा और समय को देते हैं प्रायोरिटी

कुछ लोग हर काम सबसे आसान और तेज तरीके से करना चाहते हैं। जब एक ही मोबाइल से बैंकिंग, टिकट बुकिंग और पेमेंट हो सकता है, तो अलग से पर्स रखना उन्हें एक्स्ट्रा बोझ लगता है। ऐसे लोग अपनी डेली लाइफ को सिंपल और कम्फर्टेबल रखना पसंद करते हैं।
हर सिचुएशन में खुद को ढालने की क्षमता

साइकोलॉजी के अनुसार कई लोग बिना पर्स के इसलिए भी निकलते हैं क्योंकि वे छोटी-छोटी परेशानियों को लेकर ज्यादा स्ट्रेस नहीं लेते। जरूरत पड़ने पर वे हालात के अनुसार जल्दी फैसला लेने और खुद को ढालने में सक्षम होते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि वे लापरवाह हैं।
सिर्फ इस आदत से पर्सनैलिटी डिसाइड नहीं होती

एक्सपर्ट का कहना है कि पर्स रखना या न रखना किसी व्यक्ति डिसाइड नहीं होता है। यह आदत उसकी जरूरतों, काम और लाइफस्टाइल पर भी डिपेंड करती है। साथ ही, पूरी तरह मोबाइल पर डिपेंड रहने के बजाय थोड़ा कैश और आइडेंटिटी कार्ड साथ रखना हमेशा समझदारी माना जाता है।
बिना पर्स के घर से निकलना आज की डिजिटल लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है, लेकिन इससे किसी का नेचर डिसाइड नहीं किया जा सकता। लेकिन पूरी तरह मोबाइल पर डिपेंड रहने के बजाय थोड़ा कैश और वैलिड आइडेंटिटी कार्ड साथ रखना हमेशा बेहतर माना जाता है।

