
‘पहला प्यार दूसरी बार’ में भी प्रेम को किसी आदर्शवादी, फूलों से सजे संसार की तरह देखने के बजाय रोज़मर्रा की उलझनों के बीच रखने की गुंजाइश है।… स्पर्श वालिया, अलीशा चोपड़ा, साक्षी वैद्य, कुणाल वैद, सर्गुन कौर लूथरा और तुषार छिब्बर इस फ़िल्म के छह प्रमुख चेहरे हैं। नए कलाकारों के साथ फ़िल्म बनाने का फ़ायदा यह हो सकता है कि दर्शक उन्हें किसी स्थापित स्टार की पुरानी छवि के साथ जोड़कर नहीं देखते।
प्यार पहली बार हो या दूसरी बार, दिल की धड़कन का हिसाब लगाना आसान नहीं होता। ख़ासकर तब, जब सामने वही चेहरा हो, जिसे कभी देखकर दिल की दुनिया बदल जाया करती थी। वक़्त गुज़र जाता है, लोग बड़े हो जाते हैं, स्कूल-कॉलेज की यादें पुरानी पड़ जाती हैं, लेकिन कुछ अधूरे क़िस्से मन के किसी कोने में अपनी जगह बनाए रखते हैं। फिर कभी कोई मुलाक़ात, कोई पुरानी तस्वीर या दोस्तों की महफ़िल उन क़िस्सों को दोबारा ज़िंदा कर देती है।
लव रंजन की फ़िल्म ‘पहला प्यार दूसरी बार’ इसी भावनात्मक ज़मीन पर खड़ी है। अनुज सैनी के निर्देशन में बनी इस हिंदी रोमांटिक कॉमेडी की कहानी तीन दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो स्कूल के दिनों के लगभग दस साल बाद एक रीयूनियन में मिलते हैं। उनके मन में एक पुरानी ख़्वाहिश है कि अपने पहले क्रश के सामने अपनी भावनाएं ज़ाहिर करना। लेकिन तब तक ज़िंदगी बदल चुकी है। पुरानी यादों और आज की हक़ीक़त के बीच पैदा होने वाली उलझनें उनकी मोहब्बत को एक नए मोड़ पर ले जाती हैं।
फ़िल्म में स्पर्श वालिया, अलीशा चोपड़ा, साक्षी वैद्य, कुणाल वैद, सरगुन कौर लूथरा और तुषार छिब्बर प्रमुख भूमिकाओं में हैं। लेखन की ज़िम्मेदारी लव रंजन, अनुज सैनी और जहान हांडा ने संभाली है। लव रंजन और अंकुर गर्ग इसके निर्माता हैं। फ़िल्म का निर्माण लव फ़िल्म्स के बैनर तले हुआ है। लेकिन इस फ़िल्म पर बात करते हुए एक सवाल कहानी से भी पहले पूछा जाना चाहिए।
क़ाबिल-ए-ग़ौर है कि आर्थिक असुरक्षा से भरे फ़िल्म निर्माण के कारोबार में, जब बड़े-बड़े सितारों को लेकर फ़िल्में बनाने की होड़ लगी है, तब ‘पहला प्यार दूसरी बार’ छह नए कलाकारों के साथ आई है। और वह भी सीधे सिनेमाघरों में! यह फ़ैसला अपने आप में उल्लेखनीय है। आज किसी फ़िल्म के बजट, उसकी रिलीज़ और दर्शकों की प्रतिक्रिया को लेकर निर्माताओं की चिंताएं बढ़ी हुई हैं। स्थापित सितारों के साथ फ़िल्म बनाने के पीछे एक व्यावसायिक तर्क होता है। उनका नाम दर्शकों को आकर्षित कर सकता है, वितरकों का भरोसा बढ़ा सकता है और फ़िल्म को शुरुआती पहचान दिला सकता है। हालांकि गारंटी तो उनकी भी नहीं है। ऐसे माहौल में छह नए चेहरों पर भरोसा करना जोखिम से भरा फ़ैसला है।
यहां एक दिलचस्प विरोधाभास भी है। हिंदी फ़िल्म उद्योग लगातार नई कहानियों और नई प्रतिभाओं की ज़रूरत की बात करता है, लेकिन जब निवेश का सवाल आता है, तो अक्सर पुराने और आज़माए हुए नामों की तरफ़ लौट जाता है। नए कलाकारों को अवसर देने की बात और उन्हें बड़े पर्दे पर वास्तविक अवसर उपलब्ध कराने की बात में फ़र्क़ है।
ओटीटी ने नए कलाकारों और कहानियों के लिए कुछ दरवाज़े ज़रूर खोले हैं। मगर सिनेमाघर में रिलीज़ होने वाली फ़िल्म का मामला अलग है। वहां दर्शक टिकट ख़रीदकर आता है। निर्माता को उम्मीद होती है कि उसकी फ़िल्म लोगों को घर से निकलकर सिनेमाघर तक आने की वजह देगी। इस लिहाज़ से ‘पहला प्यार दूसरी बार’ का जोखिम ध्यान देने योग्य है। छह नए कलाकारों को एक साथ सामने लाना केवल कास्टिंग का फ़ैसला नहीं, बल्कि छह संभावित सिनेमाई व्यक्तित्वों पर दांव लगाना भी है।
हालांकि, नए कलाकारों को मौक़ा देना अपने आप में किसी फ़िल्म की गुणवत्ता का प्रमाणपत्र नहीं हो सकता। आख़िरकार, दर्शक को टिकट के बदले एक अच्छा सिनेमाई अनुभव चाहिए। नई प्रतिभाओं को अवसर देने का स्वागत होना चाहिए, लेकिन पटकथा, अभिनय और निर्देशन की आलोचनात्मक पड़ताल भी उतनी ही ज़रूरी है।
फ़िल्म का केंद्रीय विचार परिचित है। स्कूल के दिनों का पहला क्रश, उस समय की अधूरी भावनाएं और बरसों बाद उनसे दोबारा रूबरू होने की इच्छा। पहली नज़र में यह एक हल्की-फुल्की रोमांटिक कॉमेडी का विषय लगता है, लेकिन इसके भीतर भावनात्मक संभावनाएं भी हैं।
पहला प्यार हमेशा किसी सफल रिश्ते का नाम नहीं होता। कई बार वह केवल एकतरफ़ा आकर्षण होता है। कभी हम किसी को पसंद करते हैं, लेकिन कह नहीं पाते। कभी हिम्मत जुटाते-जुटाते वक़्त निकल जाता है। और कभी जिस व्यक्ति को हमने अपने मन में एक ख़ास जगह दे रखी होती है, उसे वास्तविक जीवन में दोबारा देखकर पता चलता है कि हमारी यादों का संसार और उसकी हक़ीक़त दो अलग चीज़ें हैं।
दस साल बाद अपने पहले क्रश से मिलने की कल्पना इसलिए आकर्षक है कि इसमें पुरानी उम्मीदों के साथ वर्तमान की अनिश्चितताएं भी शामिल हैं। क्या सामने वाला व्यक्ति हमें याद रखता होगा? क्या उसके मन में भी वैसी ही कोई स्मृति होगी? और अगर वह रिश्ता कभी शुरू ही नहीं हुआ था, तो क्या उसे दोबारा शुरू करने का सवाल बनता है?
फ़िल्म की कहानी इन सवालों को युवा प्रेम, दोस्ती और अलग-अलग रिश्तों के माध्यम से सामने लाती है। इसका आकर्षण इस बात में है कि पुरानी मोहब्बत की कल्पना और आज के रिश्तों की वास्तविकता के बीच कितना फ़र्क़ निकलता है। लेकिन किसी दिलचस्प विचार और एक प्रभावशाली फ़िल्म के बीच पटकथा की दूरी होती है। केवल पुरानी यादों को सामने रख देना पर्याप्त नहीं। दर्शक को किरदारों की भावनाओं और उनके फ़ैसलों में भी दिलचस्पी होनी चाहिए।
लव रंजन का नाम हिंदी सिनेमा में युवा रिश्तों और दोस्ती के बीच पैदा होने वाली उलझनों से जुड़ा रहा है। ‘प्यार का पंचनामा’ और ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ जैसी फ़िल्मों ने उनके सिनेमाई संसार को लोकप्रिय पहचान दी। इस दुनिया में मोहब्बत के साथ नोकझोंक, दोस्तों की राय, ग़लतफ़हमियाँ और रिश्तों को लेकर पैदा होने वाली हास्यास्पद परिस्थितियां भी महत्त्वपूर्ण होती हैं।
‘पहला प्यार दूसरी बार’ में भी प्रेम को किसी आदर्शवादी, फूलों से सजे संसार की तरह देखने के बजाय रोज़मर्रा की उलझनों के बीच रखने की गुंजाइश है। लेकिन रोमांटिक कॉमेडी की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हंसी और भावना के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। दर्शक किरदारों की नासमझी पर हंसना चाहता है, मगर किसी मोड़ पर उनकी बेचैनी को महसूस भी करना चाहता है। अगर कहानी केवल ग़लतफ़हमियां पैदा करने और उन्हें सुलझाने में लगी रहे, तो किरदारों की भावनात्मक यात्रा पीछे छूट सकती है।
स्पर्श वालिया, अलीशा चोपड़ा, साक्षी वैद्य, कुणाल वैद, सर्गुन कौर लूथरा और तुषार छिब्बर इस फ़िल्म के छह प्रमुख चेहरे हैं। इनके साथ फ़िल्म में कई सहायक कलाकार भी हैं, जिनमें मोहित चौहान, निकहत ख़ान और गोबिंद सिंह मेहता शामिल हैं। राजकुमार राव की कैमियो उपस्थिति भी फ़िल्म का हिस्सा है।
नए कलाकारों के साथ फ़िल्म बनाने का फ़ायदा यह हो सकता है कि दर्शक उन्हें किसी स्थापित स्टार की पुरानी छवि के साथ जोड़कर नहीं देखते। उनके किरदारों को अपनी अलग पहचान बनाने का अवसर मिलता है। युवा प्रेम की कहानी में यह बात विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि दर्शक को पात्रों में अपने दोस्तों, अपने सहपाठियों या अपने बीते हुए दिनों की झलक दिखाई दे सकती है। लेकिन नए कलाकारों के लिए यह चुनौती भी है। उन्हें केवल अपनी उपस्थिति से नहीं, बल्कि संवाद अदायगी, भावनात्मक सहजता और आपसी केमिस्ट्री से दर्शकों का भरोसा जीतना होता है।
छह प्रमुख कलाकारों वाली फ़िल्म में यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि हर किरदार की अपनी आवाज़ हो। कोई केवल हास्य पैदा करने के लिए मौजूद न हो और कोई केवल प्रेम त्रिकोण को आगे बढ़ाने के लिए। अगर दर्शक को हर किरदार की अपनी इच्छा, असुरक्षा और उलझन समझ आने लगे, तो सामूहिक अभिनय फ़िल्म की ताक़त बन सकता है।
इन कलाकारों के लिए यह फ़िल्म अपने सिनेमाई सफ़र में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव हो सकती है। आगे वे किस तरह की भूमिकाएं चुनते हैं और उन्हें कितना अवसर मिलता है, यह देखना दिलचस्प होगा।
फ़िल्म के संगीत पक्ष में रोचक कोहली और तनिष्क बागची के नाम दर्ज हैं। गीतों के बोल कुमार, राज शेखर और गुरप्रीत सैनी ने लिखे हैं। बैकग्राउंड म्यूज़िक की ज़िम्मेदारी हितेश सोनिक ने संभाली है।
रोमांटिक कॉमेडी में संगीत केवल मनोरंजन का अतिरिक्त साधन नहीं होता। वह अक्सर उन भावनाओं को व्यक्त करता है, जिन्हें किरदार सीधे शब्दों में नहीं कह पाते। ख़ासकर पहली मोहब्बत और पुरानी यादों पर आधारित कहानी में संगीत का महत्त्व बढ़ जाता है। एक अच्छा गीत किसी बीते हुए रिश्ते की स्मृति को जीवंत कर सकता है, जबकि बैकग्राउंड म्यूज़िक किसी हल्के दृश्य को भावनात्मक गहराई दे सकता है।
‘पहला प्यार दूसरी बार’ के शीर्षक में एक शरारत है। पहली बार प्यार करने वाला व्यक्ति अक्सर अपने ही एहसासों को समझने की कोशिश कर रहा होता है। दूसरी बार वही व्यक्ति कुछ अनुभव लेकर लौटता है। उसे अपनी ग़लतियों का अंदाज़ा भी हो सकता है और इस बात का डर भी कि कहीं कहानी फिर अधूरी न रह जाए।
लेकिन क्या अनुभव प्रेम को आसान बना देता है? शायद नहीं। कई बार वह हमें समझदार बनाता है, तो कई बार ज़रूरत से ज़्यादा सतर्क। पुरानी यादें हमें किसी व्यक्ति के पास ले जा सकती हैं, मगर केवल यादों के सहारे कोई रिश्ता आगे नहीं बढ़ सकता।
यही इस विषय की सबसे दिलचस्प संभावना है। क्या हम पहले प्यार को दोबारा पाना चाहते हैं या उस उम्र को, जिसमें हमने पहली बार किसी को चाहा था? क्या हमें उस व्यक्ति की कमी महसूस होती है या अपने उस पुराने रूप की, जो किसी उम्मीद के साथ जीता था?
इन सवालों के जवाब किसी भी रोमांटिक कॉमेडी को केवल हल्की-फुल्की प्रेम कहानी से आगे ले जा सकते हैं। फ़िल्म की आलोचनात्मक पड़ताल करते हुए इसकी सीमाओं को नज़रअंदाज़ करना भी ठीक नहीं होगा। नए कलाकारों के साथ काम करना जोखिम है, लेकिन अच्छी फ़िल्म बनाने की ज़िम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। दर्शकों को केवल नए चेहरे नहीं, ऐसे किरदार चाहिए जिनकी ख़ुशियों, नाकामियों और मोहब्बत में वे अपनी ज़िंदगी का कोई हिस्सा पहचान सकें।
आख़िरकार, सिनेमा को केवल बड़े सितारों की ज़रूरत नहीं होती। उसे नई प्रतिभाओं, नई आवाज़ों और नई कहानियों की भी ज़रूरत होती है। सितारे दर्शकों को सिनेमाघर तक ला सकते हैं, लेकिन नए कलाकार ही कई बार दर्शकों को किसी अनदेखी दुनिया से परिचित कराते हैं।
पहला प्यार हो या दूसरी बार, असली सवाल मौक़ा मिलने का नहीं, उस मौक़े को यादगार बनाने का है। यही बात रिश्तों पर भी लागू होती है और सिनेमा पर भी। नज़दीकी सिनेमाघरों में है। देख लीजिएगा।
(पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

