पार्टी के बुरे प्रदर्शन के बाद भी नीतियों पर कायम चांसलर

पार्टी के बुरे प्रदर्शन के बाद भी नीतियों पर कायम चांसलर

Germany chancellor Friedrich Merz

रजत शर्मा

चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया और बर्लिन के चुनावों में अपनी कंजरवेटिव क्रिश्चियन डेमोक्रैटिक यूनियन (सीडीयू) पार्टी को लगे झटकों के बाद भी अडिग रुख दिखाया है। एग्जिट पोल्स में सीडीयू मेक्लेनबुर्ग में मात्र 5.1 प्रतिशत के आसपास नजर आ रही है। एग्जिट पोल्स सामने आने के बाद पत्रकारों से बातचीत में मैर्त्स ने कहा, “मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया के नतीजे को हम बातों में नहीं टाल सकते। यह एक संकट है।”

 

वहीं, बर्लिन में राज्य की सत्ता संभाल रही सीडीयू को करीब 8 फीसदी नुकसान के साथ 20 फीसदी वोट मिलते दिख रहे हैं।

 

जर्मनी सुधार करने में सक्षम है: मैर्त्स

चांसलर ने जर्मनी की आर्थिक समस्याओं और गहराते विभाजन की ओर इशारा करते हुए कहा, “इसका जवाब अच्छे पुराने दिनों की ओर लौटना नहीं हो सकता। इसका जवाब यह भी नहीं हो सकता कि हम हर अच्छी चीज को लगातार अपनी बातों से डिगाते रहें।”

 

मैर्त्स ने कहा, “जवाब यह होना चाहिए कि हम अपने देश को भविष्य के लिए तैयार करें।” उन्होंने आगे कहा कहा, “हमें सुधार करने ही होंगे। जर्मनी सुधार करने में सक्षम है।” मैर्त्स ने आगे कहा, “हम यह जिम्मेदारी उठा रहे हैं। मैं यह जिम्मेदारी उठा रहा हूं, क्योंकि मैं अपने देश को आगे ले जाना चाहता हूं।”

 

मैर्त्स की घटती अप्रूवल रेटिंग

प्रेसवार्ता में चांसलर ने यह स्पष्ट नहीं किया कि जर्मनी के बेहतर भविष्य के लिए वे क्या कदम उठाने वाले हैं। लेकिन, उनके लहजे से स्पष्ट था कि मैर्त्स इन झटकों के बाद भी अपने पद पर बने रहेंगे।  राष्ट्रीय स्तर पर इस हफ्ते की शुरुआत में मैर्त्स की अपनी अप्रूवल रेटिंग गिरकर मात्र 14 फीसदी तक पहुंच गई।

 

वहीं इसी हफ्ते की शुरुआत में जारी ओपिनियन पोल्स के मुताबिक, धुर दक्षिणपंथी एएफडी राष्ट्रीय स्तर पर 27 से 29 फीसदी समर्थन के साथ पहले स्थान पर पहुंच गई है। मैर्त्स की सीडीयू को राष्ट्रीय स्तर पर 18 से 20 फीसदी समर्थन मिलता दिख रहा था।

 

गठबंधन सरकार के सहयोगियों का रुख

सीडीयू इस वक्त सेंटर-लेफ्ट सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी (एसपीडी) के साथ गठबंधन में संघीय सरकार चला रही है। बर्लिन और मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया के नतीजों के बाद उप-चांसलर और एसपीडी के नेता लार्स क्लिंगबाइल ने कहा कि चुनावी नतीजों के बाद संघीय सरकार को अपना रवैया फिर से परखना होगा।

 

क्लिंगबाइल ने पब्लिक ब्रॉडकास्टर एआरडी से कहा, “संघीय सरकार के तौर पर हमें यह समझना होगा कि देश में इतनी ज्यादा अनिश्चितता क्यों है।” उन्होंने कहा कि सरकार सुधार से जुड़ी अपनी योजनाओं को लोगों तक इस तरह नहीं पहुंचा पाई, जिससे उन्हें भरोसा होता कि ये सुधार बेहतरी लाएंगे। वहीं अमूमन बहस अक्सर खर्च में कटौती के आसपास होती रही।

 

क्लिंगबाइल जर्मनी के वित्त मंत्री भी हैं। उन्होंने कहा कि 45 साल तक योगदान देने के बाद मिलने वाले पूरे रिटायरमेंट लाभों को खत्म करने के विवादित प्रस्ताव को लेकर लोगों की चिंताओं को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

 

एसपीडी के महासचिव टिम क्लूसनडॉर्फ ने अलग से चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स के सीडीयू-एसपीडी गठबंधन से दिशा बदलने की मांग की। क्लूसनडॉर्फ ने पब्लिक ब्रॉडकास्टर जेडडीएफ से कहा कि ये चुनाव, “एक बहुत साफ संदेश हैं कि आप बस जोर-जबरदस्ती से आगे नहीं बढ़ सकते।” उन्होंने कहा कि सरकार को सुधार करने होंगे। उनका तर्क था कि सुधारों का जोर सिर्फ कटौती पर नहीं, बल्कि ढांचागत बदलावों पर होना चाहिए।

 

क्या पेंशन सुधार रहे बुरे प्रदर्शन की वजह?

चांसलर मैर्त्स के सत्ताधारी गठबंधन के कुछ सुधारों की आलोचना होती रही है। इन्हीं में से है रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन में होने वाले सुधार। सरकार यहां कुछ कटौतियां करना चाहती है, लेकिन विपक्षी पार्टियों समेत लोग और सामाजिक संगठन इसका विरोध कर रहे हैं।

 

मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया में वोटरों के लिए बर्लिन की संघीय सरकार का पेंशन सुधार एक बड़ा मुद्दा था। जर्मनी का यह इलाका एकीकरण से पहले पूर्वी जर्मनी का हिस्सा था। मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया, जर्मनी में सबसे कम आमदनी वाला राज्य है। 45 साल नौकरी करने के बाद भी यहां के लोगों की पेंशन इतनी नहीं है कि जीवन-खर्च आसानी से चल सके। इसलिए धुर-दक्षिणपंथी एएफडी ने इसे मुख्य मुद्दों में शामिल किया है।

 

हालांकि, सैक्सनी-अनहाल्ट में दक्षिणपंथी एएफडी की जबरदस्त चुनावी जीतके बाद, पेंशन सुधारों पर दोबारा विचार किया जा रहा है। अगर मतदाता अपने वोट के जरिए यह संदेश देते हैं कि उन्हें सुधार नहीं चाहिए, तो इससे चांसलर की अहम सुधारों को लागू करने की क्षमता पर भी असर पड़ता है।

 

एग्जिट पोल के अनुमान देखकर यही लगता है कि पेंशन सुधारों पर दोबारा विचार करने की बात लोगों तक नहीं पहुंची, या फिर वाकई उन्हें चांसलर मैर्त्स के काम पर भरोसा नहीं है।