
-समीरात्मज मिश्र
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पाबंदियां लगाने से जुड़े एक मामले में केंद्रीय गृह सचिव समेत तीन वरिष्ठ अधिकारियों को अवमानना का नोटिस जारी किया। अधिकारियों ने अदालत में माफी मांगी, हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उनके स्पष्टीकरण और माफी के स्वरूप पर सवाल उठाए। ALSO READ: कमजोर मानसून के बाद भारत में पानी और बिजली की किल्लत
दो दिन पहले ही एसआईआर से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना यूबीटी के सांसद संजय राउत और पत्रकार निखिल वागले के खिलाफ उनकी टिप्पणियों पर अवमानना नोटिस जारी किया। इन मामलों ने एक बार फिर अदालत की अवमानना को लेकर बहस शुरू कर दी है। आखिर अवमानना क्या होती है और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट क्या सजा दे सकता है।
अदालत की अवमानना क्या होती है?
भारत में अदालत की अवमानना मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है— दीवानी अवमानना और आपराधिक अवमानना। इनके प्रावधान अदालत की अवमानना एक्ट 1971 में दिए गए हैं।
दीवानी अवमानना तब हो सकती है, जब कोई व्यक्ति जानबूझकर अदालत के फैसले, आदेश या निर्देश का पालन नहीं करता। अदालत के सामने किए गए किसी वादे का जानबूझकर उल्लंघन भी इसके दायरे में आ सकता है।
विरोध-प्रदर्शनों पर पाबंदियों से जुड़ा हालिया मामला इसी सवाल के इर्द-गिर्द है। अदालत के सामने आरोप लगाया गया कि सीजेपी के प्रदर्शन को रोकने के लिए प्रशासन की ओर से उठाए गए कुछ कदम मसलन, इंटरनेट बंद करना, मेट्रो और ट्रेनों के संचालन को रोकना उसके पहले के निर्देशों के अनुरूप नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से जवाब मांगा और यह स्पष्ट करने को कहा कि संबंधित कार्रवाई किन परिस्थितियों में की गई।
सुप्रीम कोर्ट में अवमानना नोटिस के जवाब में अधिकारियों का कहना था कि उन्होंने जानबूझकर अवमानना नहीं की बल्कि ये कदम सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाए गए थे।
दूसरी तरफ आपराधिक अवमानना का संबंध ऐसे कामों से है जो अदालत की प्रतिष्ठा को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाते हों, न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालते या न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करते हों। इसमें लिखित और मौखिक बयान दोनों शामिल हो सकते हैं।
हालांकि इसका यह मतलब भी नहीं है कि अदालत के हर फैसले की आलोचना अवमानना है। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील रवींद्र गड़िया कहते हैं, “न्यायिक फैसलों के तर्कों पर सवाल उठाना और उनकी आलोचना करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है लेकिन सवाल यह है कि आलोचना कहां तक वैध है और किस बिंदु पर वह न्याय प्रशासन में बाधा डालने वाली कार्रवाई बन जाती है।” ALSO READ: प्रदर्शन का हक बनाम पुलिस की पाबंदी, क्या कहता है संविधान
अवमानना के लिए सुप्रीम कोर्ट कितनी सजा दे सकता है?
अदालत की अवमानना के लिए सजा का प्रावधान कानून में स्पष्ट है। अदालत की अवमानना एक्ट 1971 की धारा 12 के मुताबिक, दोषी पाए जाने पर अधिकतम छह महीने की साधारण कैद, दो हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजाएं दी जा सकती हैं।
हालांकि कानून में माफी का भी प्रावधान है। यानी अगर अदालत को लगता है कि संबंधित व्यक्ति की माफी पर्याप्त और स्वीकार करने योग्य है, तो वह आरोप से मुक्त कर सकती है या सजा माफ कर सकती है। दीवानी अवमानना के कुछ मामलों में अदालत दोषी व्यक्ति को सिविल जेल भेजने का आदेश भी दे सकती है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अवमानना का नोटिस मिलते ही जेल जाना तय हो जाता है। रवींद्र गड़िया के मुताबिक, “पहले अदालत को आरोपों, उपलब्ध सामग्री और संबंधित व्यक्ति के जवाब पर विचार करना होता है। उसके बाद ही दोष और सजा पर फैसला लिया जा सकता है। अदालत यह भी देखती है कि उल्लंघन जानबूझकर किया गया था या नहीं, संबंधित व्यक्ति ने बाद में क्या कदम उठाए और क्या न्यायिक आदेश का पालन सुनिश्चित हो गया है। इन सबकी पड़ताल करने के बाद ही सजा पर फैसला होता है।”
दिलचस्प तथ्य यह है कि अदालतों में अवमानना के मामले तो बड़ी संख्या में दायर होते हैं लेकिन उनमें सजा बहुत कम मामलों में हो पाती है। लीगल-टेक कंपनी द प्रोफेसर वकीलों और मुकदमा लड़ने वाले लोगों को अदालतों से जुड़े डेटा का विश्लेषण उपलब्ध कराने पर काम करती है। कंपनी के विश्लेषण के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में सिविल अवमानना के कुल 5,566 मामले लंबित हैं या उन पर कार्रवाई की जा चुकी है। इनमें विभिन्न पक्षों की तरफ से दायर 5,533 याचिकाएं और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से खुद शुरू किए गए 33 मामले शामिल हैं।
अवमानना मामलों में सजा की दर इतनी कम क्यों है?
विश्लेषण से पता चलता है कि अवमानना के सिर्फ बीस मामलों में यानी करीब आधे फीसदी मामलों में अवमानना के दोषी व्यक्ति को वास्तव में जेल या जुर्माने की सजा दी गई। कुछ मामलों में व्यक्ति को दोषी तो ठहराया गया, लेकिन जेल की सजा नहीं दी गई जबकि करीब 1।5 फीसदी मामलों को अदालत की तरफ से माफी स्वीकार किए जाने के बाद बंद कर दिया गया। वहीं, 98 प्रतिशत यानी 3,600 मामले ऐसे थे, जिनमें संबंधित व्यक्ति ने अदालत के आदेश का पालन कर लिया या मामले को खारिज कर दिया गया अथवा याचिका वापस ले ली गई।
सुप्रीम कोर्ट के वकील दुष्यंत पराशर कहते हैं कि सजा की कम दर की एक वजह यह है कि अवमानना की हर याचिका का मकसद संबंधित व्यक्ति को दंडित करवाना नहीं होता। डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, “कई बार याचिका इसलिए दायर की जाती है ताकि अदालत के पहले के आदेश का पालन सुनिश्चित हो सके। अगर संबंधित पक्ष आदेश का पालन कर देता है, तो अदालत को अलग से सजा देना जरूरी नहीं लगता। इसलिए अवमानना कानून का मकसद केवल दंड देना नहीं, बल्कि न्यायिक आदेशों का सम्मान सुनिश्चित करना और न्याय प्रशासन को बाधित होने से बचाना भी है।”
अदालत की अवमानना से संबंधित कुछ चर्चित मामले
अदालत की आलोचना और अवमानना के बीच की सीमा पर बहस करने वाले मामलों में सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण का मामला काफी चर्चित है। साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके दो ट्वीट्स को आपराधिक अवमानना माना। इन टिप्पणियों में न्यायपालिका और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को लेकर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए एक रुपये का सांकेतिक जुर्माना लगाया जिसे उन्हें भरना पड़ा था। ऐसा नहीं करने पर उन्हें तीन महीने की कैद और वकालत पर पाबंदी लग सकती थी।
इसी तरह लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति रॉय को भी साल 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक अवमानना के मामले में दोषी ठहराया था। अदालत ने उन्हें एक दिन की साधारण कैद और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
हालांकि कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायाधीश सीएस कर्णन का मामला काफी चर्चित रहा। साल 2017 में जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई जजों पर खुले तौर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने उन्हें अदालत की अवमानना का दोषी ठहराते हुए छह महीने की जेल की सजा सुनाई। उस समय कर्णन हाईकोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश थे।
निशिकांत दुबे के मामले में खुद संज्ञान लेने की मांग
अप्रैल 2025 में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की सुप्रीम कोर्ट और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ टिप्पणियों को लेकर अवमानना की कार्रवाई की मांग उठी थी। निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को ‘देश में गृहयुद्ध भड़काने के लिए जिम्मेदार’ बताया था।
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर अनुरोध किया गया कि अदालत इन टिप्पणियों पर खुद संज्ञान लेकर उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करे। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने उनकी टिप्पणियों को गैर-जिम्मेदाराना बताया।
लेकिन इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल उठाया कि किसी बयान को अनुचित या गैर-जिम्मेदाराना मानना और उसे कानूनी रूप से अवमानना मानना क्या अलग-अलग चीजें हैं।
सरकारी विभागों के अफसर कई बार ऐसा करते हैं कि अवमानना मामलों में अदालत से माफी मांग लेते हैं लेकिन उनकी कार्यशैली में कोई फर्क नहीं पड़ता। हाल के दिनों में विरोध प्रदर्शनों से निपटने के मामले हों या फिर बुलडोजर कार्रवाइयों को लेकर अफसरों को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, अदालती आदेशों की अवहेलना कई बार दिखी है।
दुष्यंत पराशर इसे खतरनाक स्थिति बताते हैं, “जब सरकारें यह समझ लेती हैं कि अदालत आदेश देती रहे, हमें तो वही करना है जो हमारे फायदे में है, तब आम जनता का न्याय प्रणाली से भरोसा उठने लगता है। अगर अवमानना की कार्रवाई केवल कागजी नोटिस तक सीमित रह जाएगी और दोषी अधिकारियों पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तो अवमानना का खौफ पूरी तरह खत्म हो जाएगा।”
दरअसल, अवमानना का नोटिस अपने आप में सजा नहीं है लेकिन यह बताता है कि अदालत अपने आदेशों के पालन को गंभीरता से ले रही है। अंतिम फैसला इस बात पर निर्भर करता है कि जानबूझकर अवहेलना साबित होती है या नहीं और संबंधित पक्ष का स्पष्टीकरण अदालत को संतुष्ट करता है या नहीं।


