
Oxfam Report on CO2: जिन के पास अकूत पैसा है, वे यह नहीं सोचते कि वे अपने ठाट-बाट, निजी जेट विमानों के इस्तेमाल, अत्यधिक उपभोग और धुंआधार निवेश के द्वारा आजकल के जलवायु संकट को और अधिक बढ़ावा दे रहे हैं। उनकी अमीरी का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता है आम लोगों और गरीबों को।
स्थिति यह है कि दुनिया भर के अमीरों के निजी जेट विमान, केवल दो सेकंड में जितनी कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) गैस उत्सर्जित करते हैं, उतनी तो दुनिया की आधी गरीब आबादी का कोई व्यक्ति पूरे साल में भी उत्सर्जित नहीं करता। यह बात ऑक्सफैम fam) की हालिया गणना से सामने आई है। दुनिया भर की विकास और सहायता संस्थाओं के इस अंतरराष्ट्रीय संगठन ने अपनी नई रिपोर्ट में, इस बात पर प्रकाश डाला है कि किस तरह आजकल के धनकुबेर—अपनी जीवनशैली और निवेश के द्वारा—जलवायु संकट को बढ़ावा देते हैं।
ऑक्सफैम के आंकड़े एक गहरी असमानता को उजागर करते हैं: दुनिया में जहाँ कुछ लोग निजी जेट विमानों से यात्रा करते हैं और संसाधनों का भारी उपभोग करते हैं, वहीं दूसरों के पास इतनी आर्थिक क्षमता तक नहीं होती कि वे खुद को गर्मी, बाढ़ या ऊर्जा की बढ़ती लागतों से बचा सकें। तो क्या जलवायु परिवर्तन के लिए अमीर लोग भी ज़िम्मेदार हैं? ALSO READ: क्या नेपाल में आई प्रलयंकारी बाढ़ के पीछे जलवायु परिवर्तन की निर्णायक भूमिका रही? रिसर्च में बड़ा खुलासा
जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक रिसर्च (DIW) की ऊर्जा अर्थशास्त्री क्लाउडिया केम्फर्ट ने एक मीडिया इंटरव्यू में कहा, “जलवायु संकट के लिए केवल अमीर लोग ही ज़िम्मेदार नहीं हैं, लेकिन इसे लेकर उनकी बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी अवश्य है।”
जीवनशैली में भारी असमानताएँ
केम्फर्ट के अनुसार, दुनिया की सबसे अमीर 10 प्रतिशत आबादी कार्बन डाईऑक्साइड के कुल उत्सर्जन के लगभग आधे भाग के लिए ज़िम्मेदार है। अकेले सबसे अमीर एक प्रतिशत लोग, कुल उत्सर्जन के लगभग 17 प्रतिशत हिस्से के लिए ज़िम्मेदार हैं, जबकि दुनिया की ग़रीब आधी आबादी की ज़िम्मेदारी का हिस्सा केवल 8 प्रतिशत है। ALSO READ: भीषण गर्मी और जंगल की आग से झुलसता यूरोप, 40 डिग्री के पार हो सकता है तापमान
व्यक्तिगत जीवनशैली में यह भारी अंतर हवाई यात्राओं के प्रसंग में विशेष रूप से स्पष्ट दिखता है। केम्फर्ट कहती हैं, “यह बिल्कुल साफ़ है कि जो लोग अक्सर और लंबी दूरी की हवाई यात्राएं करते हैं, वे बहुत अधिक मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं।” उनके निजी जेट इसका एक बड़ा कारण हैं।
ऑक्सफैम में सामाजिक-पारिस्थितिक परिवर्तन (सोशियो-इकोलॉजिकल ट्रांसफॉर्मेशन) की विशेषज्ञ लियोनी पीटरसन ने जर्मनी की एक वित्तीय संपादकीय टीम को दिए साक्षात्कार में कहा, “अत्यधिक अमीर लोगों की जलवायु को नुकसान पहुँचाने वाली जीवनशैली में, धाक जमाने के उनके निजी जेट विमानों से बेहतर और कोई चीज नहीं होती।”
ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर के निजी जेट विमान पिछले वर्ष कार्बन डाइऑक्साइड गैस के कुल मिलाकर 1 करोड़ 60 लाख टन के बराबर उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार थे। पिछले साल अकेले जर्मनी के हवाई अड्डों से 55,000 से अधिक निजी जेट विमानों ने उड़ानें भरीं, जिनसे कुल मिलाकर 1,82,000 टन से अधिक कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ। इसके अलावा, बहुत अमीर लोगों के घर भी अक्सर बहुत बड़े होते हैं। उनके घरों की ऊर्जा-खपत का स्तर भी काफी ऊँचा होता है— तब भी उनका “क्लाइमेट फुटप्रिंट” (जलवायु पर पड़ने वाला प्रभाव) यहीं तक सीमित नहीं रहता।
अमीरों के निवेशों की भूमिका
अति-धनी लोगों द्वारा किए गए निवेश भी एक बड़ी भूमिका निभाते हैं। ऑक्सफैम ने 1,095 कंपनियों में 1,000 अरबपतियों की हिस्सेदारी का अध्ययन किया। उसकी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में उनके निवेश का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा ऐसे क्षेत्रों में गया जो जलवायु के लिए विशेष रूप से हानिकारक हैं— जैसे कि तेल, गैस और रसायन। इन निवेशों से होने वाला उत्सर्जन कुल मिलाकर 48 करोड़ 60 लाख टन “CO2 समतुल्य” (CO2 equivalent) था—यह एक ऐसी मापन इकाई है, जिससे अलग-अलग ग्रीनहाउस गैसों के जलवायु प्रभाव की तुलना कार्बन डाईऑक्साइड के प्रभाव से की जा सकती है।
इस उत्सर्जन को निवेशकों के बीच उनके निवेश के अनुपात (pro-rata basis) में बांटा गया है। अरबपतियों के इस समूह में शामिल 49 जर्मन लोगों के मामले में, उनके निवेश से जुड़ा उत्सर्जन औसतन लगभग 7,05,000 टन CO2 समतुल्य रहा—जो कि अंतरराष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।
जर्मनी की ऊर्जा अर्थशास्त्री क्लाउडिया केम्फर्ट कहती हैं, “बात सिर्फ यह नहीं है कि लोग कैसे रहते हैं, बल्कि यह भी है कि उनका पैसा कहाँ जाता है।” उनका कहना है कि इसका सीधा संबंध आय और संपत्ति से है। ऑक्सफैम के अनुसार, जर्मनी में भी भारी असमानता देखने को मिलती है: सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत आबादी का एक व्यक्ति, गरीब आधी आबादी के किसी एक व्यक्ति की तुलना में 52 गुना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करता है।
अमीर लोग अपना बेहतर बचाव कर सकते हैं
वैश्विक तापमान-वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) के नतीजों में भी असमानता साफ दिखाई देती है। अधिक आमदनी वाले लोग अक्सर ख़राब मौसम से खुद को बेहतर तरीके से बचा सकते हैं। उदाहरण के लिए, अमीर लोग अक्सर ऐसे इलाकों में रहते हैं, जहां जलवायु से जुड़ी आपदाओं का — जैसे सूखा पड़ने या बाढ़ आने— का ख़तरा हुत कम होता है।
गरीब लोग अक्सर ऐसी इमारतों में रहते हैं जो मौसम के प्रभाव से बचाव के लिए बनी नहीं होतीं। वे अपने घरों को ऊर्जा-कुशल (energy-efficient) बनाने का ख़र्च नहीं उठा सकते, और किसी आपदा के बाद उनके पास सहारा पाने के लिए आर्थिक बचत भी बहुत कम होती है। जलवायु संकट के नतीजों से वे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
ऑक्सफैम के अनुसार, ग़रीबी-अमीरी की अधिक असमानता वाले देशों में बाढ़ से होने वाली मौतों की संख्या, कम असमानता वाले देशों की तुलना में 7 गुना अधिक है। संस्था का तर्क है कि सामाजिक असमानता जलवायु आपदाओं के असर को और बढ़ा देती है, क्योंकि यह तय करने में वह प्रमुख भूमिका निभाती है कि सबसे ज्यादा ख़तरे में कौन है— और आपदा से हुए नुकसान के बाद कौन फिर से स्वयं संभल सकता है।
जलवायु आपदाएं सामाजिक असमानता बढ़ाती हैं
अर्थशास्त्री क्लाउडिया केम्फर्ट भी इसे एक मुख्य समस्या बताती हैं कि “जो लोग कार्बन डाईऑक्साइड का सबसे ज़्यादा उत्सर्जन करते हैं, वे आमतौर पर जलवायु संकट के नतीजों से खुद को बचाने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में भी होते हैं।” इसके विपरीत, कम आय वाले लोग अक्सर सबसे अधिक असुरक्षित होते हैं।
इस तरह, जलवायु परिवर्तन पहले से ही विद्यमान सामाजिक असमानताओं को और गहरा बना देता है। जिनके पास बहुत कम संपत्ति है, उनके लिए कोई आपदा उनकी आजीविका के एक बड़े हिस्से को नुकसान पहुँचने का कारण बन सकती है, जबकि अमीर लोग नुकसान की भरपाई करने और अपनी संपत्ति को सुरक्षित रखने में ज़्यादा सक्षम होते हैं।
अधिक कर और कम संपन्न लोगों के लिए राहत
ऑक्सफैम बड़ी संपत्ति और निजी जेट विमानों पर अधिक कर लगाने की मांग करता है। इससे मिलने वाले राजस्व का उपयोग अर्थव्यवस्था को अधिक जलवायु-अनुकूल बनाने और जलवायु संकट के परिणामों से निपटने के लिए किया जाना चाहिए— क्योंकि “जो लोग जलवायु संकट को बढ़ावा देते हैं, उन्हें ही इससे निपटने की क़ीमत भी चुकानी चाहिए, न कि इसका बोझ आम जनता पर डाला जाना चाहिए।”
ऑक्सफैम आर्थिक रूप से कमज़ोर देशों और गरीब वर्गों को भी पर्याप्त सहायता देने की वकालत करता है, ताकि वे जलवायु संकट का सामना कर सकें। यह बहुत ज़रूरी है कि लोगों को जलवायु संरक्षण के फ़ायदे मिलें। सबसे बड़ी बात यह है कि वह सभी के लिए बचतकारी और सामाजिक रूप से न्यायसंगत बना रहे।
इसलिए, प्रश्न केवल यह नहीं है कि कितनी कार्बन डाईऑक्साइड के लिए कौन ज़िम्मेदार है। प्रश्न यह भी है कि उसके उत्सर्जन को प्रभावी ढंग से कैसे कम किया जा सकता है। जलवायु संरक्षण की लागत को इस तरह कैसे बाँटा जा सकता है कि सीमित आर्थिक संसाधनों वाले लोगों पर अनावश्यक बोझ न पड़े। ये प्रश्न तेज़ी से विकसित हो रहे भारत के लिए भी उतने ही ज्वलंत और महत्वपू्र्ण हैं, जितने पश्चिमी जगत या अन्य देशों के लिए।


