हिसाब तो देना ही पड़ेगा! धन्नीपुर मस्जिद की फंडिंग पर उठे सवाल, वक्फ बोर्ड पर अनियमितता के आरोप

हिसाब तो देना ही पड़ेगा! धन्नीपुर मस्जिद की फंडिंग पर उठे सवाल, वक्फ बोर्ड पर अनियमितता के आरोप

Dhannipur Mosque Ayodhya

Dhannipur Mosque Ayodhya: अयोध्या के धन्नीपुर में प्रस्तावित मस्जिद निर्माण को लेकर विवाद एक बार फिर गरमा गया है। बाराबंकी की सामाजिक संस्था ‘दहेज पर प्रहार’ की टीम ने धन्नीपुर पहुंचकर सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन (IICF) पर मस्जिद के नाम पर चंदा जुटाने और भारी वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगाए हैं।

​7 साल बाद भी बाउंड्री वॉल तक नहीं बनी

​संगठन की प्रतिनिधि ने मीडिया को संबोधित करते हुए याद दिलाया कि 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद, राज्य सरकार ने सोहावल तहसील के धन्नीपुर गांव में मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ जमीन आवंटित की थी। हालांकि, लगभग 7 साल बीत जाने के बाद भी धरातल पर निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है। यहां तक कि आवंटित जमीन पर अब तक एक बाउंड्री वॉल तक का निर्माण नहीं कराया गया है।

​चंदे के हिसाब और आरटीआई पर चुप्पी के आरोप

​एनजीओ की प्रतिनिधि ने सीधा हमला बोलते हुए कहा कि वक्फ बोर्ड और इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन देश-विदेश से मस्जिद के नाम पर भारी चंदा (फंड) जुटा रहे हैं, लेकिन इस फंडिंग और खर्च का कोई भी पारदर्शी हिसाब सार्वजनिक नहीं किया जा रहा। स्थानीय जनता और देशवासियों को लगातार गुमराह किया जा रहा है।

Dhannipur Mosque Ayodhya

​उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आरटीआई (RTI) के तहत मांगी गई जानकारियों का कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया जा रहा है। संगठन ने मांग की है कि चंदे और फंडिंग से जुड़े सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।

​वक्फ बोर्ड का घेराव और हाईकोर्ट जाने की चेतावनी

​एनजीओ ने सुन्नी वक्फ बोर्ड और ट्रस्ट को 15 दिनों की मोहलत देते हुए कड़ा अल्टीमेटम दिया है।

  • ​घेराव व कानूनी कार्रवाई : यदि अगले 15 दिनों के भीतर फंडिंग का पारदर्शी हिसाब सार्वजनिक नहीं किया गया और स्थिति स्पष्ट नहीं हुई, तो लखनऊ स्थित सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के कार्यालय का घेराव किया जाएगा और मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट ले जाया जाएगा।
  • ​जमीन वापसी की मांग : संगठन ने स्पष्ट किया कि या तो आवंटित 5 एकड़ जमीन पर जल्द से जल्द मस्जिद का निर्माण शुरू कराया जाए, अन्यथा इस जमीन को राज्य सरकार को वापस सौंप दिया जाए।