दिवाली का त्योहार आते ही देशभर में मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ जाती है। इस बार जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के कुम्हार भी इस मांग को पूरा करने में जुटे हैं। यहां के स्थानीय कारीगरों ने दिवाली से पहले करीब 40 हजार मिट्टी के दीये तैयार किए हैं। खास बात यह है कि कभी घाटी में बाहर से मंगाए जाने वाले दीये अब स्थानीय कुम्हार खुद बना रहे हैं। इस काम से न सिर्फ कश्मीर की पारंपरिक मिट्टी के बर्तन बनाने की कला को आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है बल्कि स्थानीय कारीगरों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं।
इस पहल में स्थानीय कुम्हारों के साथ युवा उद्यमी मोहम्मद उमर भी शामिल हैं। वह एएस पॉटर वर्कशॉप के संचालक हैं। उमर ने न्यूज एजेंसी ANI से बातचीत में बताया कि उनकी वर्कशॉप ने 2020-21 में पहली बार मिट्टी के दीये बनाने शुरू किए थे। उस समय तक वे दीये नहीं बनाते थे लेकिन जब इनकी मांग और ऑर्डर आने लगे तो उन्होंने भी इस काम की शुरुआत कर दी। धीरे-धीरे ऑर्डर बढ़ते गए और अब यह काम बड़े स्तर पर पहुंच गया है।
2020-21 में शुरू हुआ दीये बनाने का काम, अब 40 हजार तक पहुंचा उत्पादन
मोहम्मद उमर के मुताबिक उनकी वर्कशॉप ने 2020-21 में दीये बनाने शुरू किए थे। इसकी शुरुआत ग्राहकों से मिले ऑर्डर के बाद हुई थी। पहले ऑर्डर कम संख्या में आते थे लेकिन समय के साथ मांग बढ़ती गई। उमर ने बताया कि पिछले साल उनकी वर्कशॉप ने कम से कम 25 हजार दीये बेचे थे। इस साल बढ़ती मांग को देखते हुए करीब 40 हजार दीये तैयार किए गए हैं। इनमें से 6 नवंबर तक 12 हजार दीये बिक चुके थे। दिवाली आने में अभी समय बाकी होने के कारण उन्हें उम्मीद है कि बाकी दीये भी त्योहार तक बिक जाएंगे। उमर ने ANI से कहा कि, ‘हमने 40 हजार दीये बनाए हैं, इसलिए हमें उम्मीद है कि हम इन्हें पूरा बेच लेंगे।’ फिलहाल वर्कशॉप ने इस साल का उत्पादन करीब 40 हजार दीयों तक रखने का फैसला किया है।
फेसबुक और इंस्टाग्राम से मिल रहे 200 से 400 तक के ऑर्डर
कश्मीर में बने इन दीयों की मांग सिर्फ श्रीनगर या आसपास के इलाकों तक सीमित नहीं है। मोहम्मद उमर के मुताबिक अब घाटी के बाहर से भी ग्राहक ऑर्डर दे रहे हैं। इसमें ऑनलाइन बिक्री और सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है। उमर ने बताया कि उनकी वर्कशॉप ने फेसबुक पर अपने दीयों की जानकारी और तस्वीरें पोस्ट करनी शुरू कीं। इसके बाद उन्हें लगातार ऑर्डर मिलने लगे। फेसबुक और इंस्टाग्राम के जरिए उन्हें 200, 300 और 400 तक के ऑर्डर भी मिले हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से अब उनके उत्पादों की पहुंच घाटी से बाहर देश के दूसरे हिस्सों तक हो गई है। उमर के मुताबिक ऑनलाइन बिक्री शुरू होने के बाद अलग-अलग जगहों से ग्राहक उनसे संपर्क कर रहे हैं। इस तरह सोशल मीडिया उनकी पारंपरिक कुम्हारी के काम को नए बाजार से जोड़ने का माध्यम बन गया है।
छोटे दीयों से लेकर स्टैंड और सजावटी डिजाइन तक तैयार कर रहे कारीगर
श्रीनगर की इस वर्कशॉप में ग्राहकों की पसंद और जरूरत के मुताबिक अलग-अलग तरह के दीये बनाए जा रहे हैं। मोहम्मद उमर ने बताया कि उनकी वर्कशॉप में तीन से चार तरह की वैरायटी तैयार की जाती हैं। इनमें छोटे आकार के सामान्य दीये, स्टैंड वाले दीये और बड़े सजावटी दीये शामिल हैं। कुछ सजावटी डिजाइनों में चार से पांच दीये एक साथ लगाए जाते हैं। इस तरह ग्राहकों को अलग-अलग आकार और डिजाइन के विकल्प मिलते हैं। वर्कशॉप के उत्पाद स्थानीय लोग खरीद रहे हैं और इन्हें जम्मू भी भेजा जा रहा है। उमर के मुताबिक दीयों की मांग बढ़ने के साथ ही कश्मीर के दूसरे कारीगरों ने भी इन्हें बनाना शुरू कर दिया है। पहले जहां घाटी के व्यापारी और ग्राहक बाहर से आने वाले दीयों पर निर्भर रहते थे, वहीं अब स्थानीय स्तर पर भी इनका उत्पादन होने लगा है।
मिट्टी की कमी बनी सबसे बड़ी चुनौती, कुम्हारों ने सरकार से लगाई गुहार
दीयों की बढ़ती मांग और उत्पादन के बीच कश्मीर के कुम्हारों के सामने एक बड़ी समस्या भी है। मोहम्मद उमर ने बताया कि घाटी में मिट्टी की उपलब्धता कम होती जा रही है। उनके मुताबिक मिट्टी की कमी की वजह से पारंपरिक कुम्हारी के काम को आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है। उमर ने बताया कि पहले उनकी वर्कशॉप कुल्हड़ बनाने के लिए बारामूला से मिट्टी लाती थी लेकिन अब वहां से पर्याप्त मिट्टी नहीं मिल पा रही है। उन्होंने कहा कि अगर कुम्हारों को जरूरी कच्चा माल ही उपलब्ध नहीं होगा तो वे आने वाले समय में ऑर्डर पूरे नहीं कर पाएंगे। उन्होंने स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री से इस समस्या पर ध्यान देने की अपील की है। उमर का कहना है कि अगर सरकार रोजगार के अवसर बढ़ाना चाहती है तो कुम्हारों के लिए मिट्टी की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। उन्होंने कहा कि मिट्टी नहीं मिली तो अगले साल मिलने वाले ऑर्डर पूरे करना संभव नहीं होगा। इसलिए कुम्हारों को इस बुनियादी कच्चे माल की आपूर्ति की जरूरत है।
कश्मीर के कुम्हारों की आजीविका का जरिया है मिट्टी का काम
मोहम्मद उमर ने बताया कि उनकी वर्कशॉप के लिए मिट्टी के बर्तन बनाना ही कमाई का मुख्य जरिया है। दीवाली के मौके पर मिलने वाले ऑर्डर इस काम से जुड़े लोगों के लिए खास महत्व रखते हैं। उन्होंने कहा कि मिट्टी के साथ काम करना ही उनका पेशा है और इसी से उनकी आजीविका चलती है। दिवाली की तैयारियों के बीच श्रीनगर की कुम्हार वर्कशॉप में पारंपरिक चाक पर मिट्टी को आकार देते कारीगर और बड़ी संख्या में तैयार रखे गए दीये इस काम की बढ़ती गतिविधि को दिखाते हैं। इस पहल के जरिए स्थानीय कारीगर एक पारंपरिक हुनर को जारी रखने के साथ त्योहार के दौरान बढ़ने वाली मांग का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं।

