
Mamata Banerjee ECI Dispute: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर एक बड़ा सियासी भूचाल आ गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग करते हुए पश्चिम बंगाल और उन सभी राज्यों में फिर से चुनाव कराने की मांग की है, जहां उनके (ज्ञानेश) कार्यकाल में चुनाव और SIR की प्रक्रिया संपन्न हुई थी।
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि 2024 के लोकसभा चुनाव और हालिया चुनावों में लगभग 79 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से अवैध रूप से हटाकर उनके मताधिकार को छीना गया है। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि ज्ञानेश कुमार की देखरेख में हुई चुनावी प्रक्रियाओं ने लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को चोट पहुंचाई है। ALSO READ: Election Commission SIR विवाद : चुनाव आयोग ने क्यों दी सफाई, किस मामले को लेकर मचा है घमासान, केजरीवाल बोले- ज्ञानेश कुमार पर चले देशद्रोह का केस
79 लाख वोटरों के नाम हटाने का आरोप
चुनाव आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल की कुल मतदाता सूची में से लगभग 10 प्रतिशत (करीब 79 लाख नाम) हटा दिए गए। उन्होंने इसे मतदाताओं को वोटिंग के अधिकार से वंचित करने का सुनियोजित प्रयास बताया। ALSO READ: चुनाव आयोग का बड़ा बयान, कहा- सभी निर्णय बहुमत से हुए, तस्वीर का सिर्फ एक हिस्सा दिखाया जा रहा है
दोबारा चुनाव की मांग
उन्होंने मांग की है कि पुरानी वोटर लिस्ट के आधार पर पश्चिम बंगाल और उन सभी राज्यों में फिर से निष्पक्ष चुनाव कराए जाएं, जहां ज्ञानेश कुमार ने चुनावों और SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) की देखरेख की है। विपक्ष द्वारा पूर्व में लाए गए महाभियोग प्रस्ताव का जिक्र करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि उन्होंने हमारे महाभियोग प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी। लेकिन अब सिर्फ महाभियोग से काम नहीं चलेगा, अब तो उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए। जब तक वह कुर्सी पर बने रहेंगे, हमारा विरोध जारी रहेगा।
उन्होंने कहा कि विपक्ष ने इस मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) का रुख किया है और अब न्यायपालिका को आम जनता की आवाज सुननी चाहिए। जल्द ही इंडिया (INDIA) ब्लॉक की बैठक होगी, जिसमें चुनाव आयोग के खिलाफ बड़े ‘विद्रोह’ और राष्ट्रव्यापी आंदोलन का आह्वान किया जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के भीतर ही फैसलों को लेकर आम सहमति नहीं थी। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR, फॉर्म 6 और मतदाता डेटाबेस से जुड़े फैसलों पर 14 बार अपनी लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ आदेश और फैसले अन्य दो आयुक्तों की जानकारी के बिना ही जारी कर दिए गए थे। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग पर तीखी टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग को स्वतंत्र तो होना ही चाहिए, बल्कि उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।
चुनाव आयोग की सफाई
हालांकि विपक्ष के आरोपों और मीडिया रिपोर्ट पर चुनाव आयोग के अधिकारियों ने आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है। अधिकारियों ने माना कि विभिन्न राज्यों में वोटर लिस्ट में सुधार और डेटाबेस प्रबंधन के दौरान दोनों चुनाव आयुक्तों (संधु और जोशी) ने अपने सुझाव और चिंताएं जरूर जताई थीं। किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में अलग-अलग राय या विचार होना एक स्वाभाविक और विचार-विमर्श का हिस्सा है। आयोग ने स्पष्ट किया कि SIR और वोटर लिस्ट संशोधन से जुड़े सभी बड़े और मुख्य निर्णय सर्वसम्मति से ही लिए गए थे।


