भारत सस्ते पैकेटबंद खाने पर इतना निर्भर कैसे हुआ

भारत सस्ते पैकेटबंद खाने पर इतना निर्भर कैसे हुआ

packaged food

आदर्श शर्मा

कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपने उत्पादों को हल्की गुणवत्ता के साथ कम कीमत में बेचती हैं। प्रोसेस्ड फूड खाने से भारतीयों की सेहत पर असर हो रहा है और अब इसके खिलाफ आवाज भी उठने लगी है। ALSO READ: कैसा है 2027 यूपी चुनाव से पहले अखिलेश यादव का ‘नीला दांव’

 

भारत में अधिक चीनी, नमक और वसा वाले पैकेटबंद खाद्य उत्पादों पर चेतावनी वाले लेबल लगाने की तैयारी हो रही है। यह चर्चा भी हो रही है कि कई कंपनियां भारत में हल्की गुणवत्ता वाले सस्ते खाद्य उत्पाद बेचती हैं, जबकि दूसरे देशों में मिलने वाले उनके वही उत्पाद अच्छी गुणवत्ता के होते हैं। पैकेटबंद खाने से स्वास्थ्य पर होने वाले असर पर भी बात होने लगी है।

 

दुनियाभर में डायबिटीज के जितने मामले सामने आते हैं, उनमें से एक चौथाई अकेले भारत के होते हैं। डायबिटीज ड्रग बनाने वाली कंपनी नोवो नॉर्डिस्क के मुताबिक, भारत में 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, पैकेटों में बिकने वाला प्रोसेस्ड फूड भी इसके लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार है।

 

इन खतरों के बावजूद भारत में पैकेटबंद खाने का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। रिसर्च फर्म आईएमएआरसी ग्रुप के मुताबिक, भारत का पैकेज्ड फूड मार्केट साल 2025 में करीब 130 अरब डॉलर का था, जो 2026 में बढ़कर करीब 137 अरब डॉलर का हो गया। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत के लोग पैकेटबंद खाने पर इतना निर्भर क्यों होते चले गए। ALSO READ: क्या वाकई रोकी जा सकती है एआई के विकास की रफ्तार?

 

कम आमदनी और खाद्य मानकों को लागू करवाने में विफलता

प्रति परिवार औसत आय, वैश्विक औसत से काफी कम होने के कारण भारतीय सस्ते खाद्य उत्पादों के बड़े उपभोक्ता हैं। इससे बड़ी कंपनियों को एक ऐसा बड़ा बाजार मिल जाता है, जहां उनके ऊपर सख्त खाद्य मानकों को लागू करने का उतना दबाव नहीं होता, जितना कई अन्य देशों में होता है।

 

उदाहरण के लिए स्विस कंपनी नेस्ले के नूडल ब्रांड मैगी को ले लीजिए। भारत में नेस्ले मैगी के उत्पादन के लिए पाम ऑयल का इस्तेमाल करती है। वहीं, ब्रिटेन में बिकने वाली मैगी में सूरजमुखी का तेल इस्तेमाल होता है, जो महंगा होता है। इसी तरह भारत में मिलने वाली किटकैट में ऑस्ट्रेलिया में मिलने वाली किटकैट की तुलना में कम कोकोआ होता है।

 

नेस्ले के एक पूर्व अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि अच्छी गुणवत्ता वाली खाद्य सामग्रियां अधिक महंगी होती हैं और इससे उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी भी हो सकती है, जिससे कंपनियां बचना चाहती हैं। भारत में कंपनियों के सामने अपनी कीमतों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने की चुनौती होती है ताकि उनका सामान अधिक बिक सके।

 

इस बीच नेस्ले ने एक बयान जारी कर कहा कि उनकी रेसिपी उपभोक्ताओं की उम्मीदों, खान-पान की संस्कृति के आधार पर स्वाद की स्थानीय पसंदों, सामग्रियों की उपलब्धता और जलवायु स्थिति को ध्यान में रखते हुए तैयार की जाती हैं। कंपनी ने यह भी कहा कि वह भारत के सभी खाद्य सुरक्षा कानूनों का पालन करती है।

 

किफायती उपभोक्ता वर्ग के लिए तैयार किए गए खाद्य उत्पाद

नेस्ले और यूनीलिवर जैसी बड़ी कंपनियां करीब 100 सालों से भारत में मौजूद हैं। नेस्ले ने साल 1912 में भारत में मीठा गाढ़ा दूध बेचना शुरू किया था। उस दौरान भारत ब्रिटेन की एक कॉलोनी था और ज्यादातर आबादी गरीब थी। यूनीलिवर ने साल 1937 में डालडा बेचना शुरू किया जो वनस्पति तेलों से बनता था।

 

देखते ही देखते डालडा भारत में वनस्पति तेल का पर्यायवाची बन गया। इससे लोगों को पारंपरिक लेकिन महंगे घी का सस्ता विकल्प मिला और कम आय वाले घरों में, रेस्तराओं में और मिठाई की दुकानों में बड़े स्तर पर इसका इस्तेमाल होने लगा। इसके बाद विदेशी कंपनियां भारत में अपने उत्पाद बनाने लगीं ताकि कीमतों को कम रखा जा सके।

 

अंतरराष्ट्रीय खाद्य कंपनी मोंडलेज की इंडिया यूनिट की पूर्व अधिकारी पारुल शर्मा कहती हैं, भारत में कई रेसिपी दशकों पहले एक बहुत ही किफायती उपभोक्ता वर्ग के लिए तैयार की गई थीं और वो रेसिपी ही चली आ रही हैं। उन्होंने कहा कि लंबे वक्त तक भारतीय उपभोक्ताओं ने सही मायने में बड़े ब्रांडों से सवाल नहीं पूछे। ALSO READ: खाड़ी में बदलता ताकत का संतुलन, यमन युद्ध से सऊदी अरब पर बढ़ा संकट

 

अब लाल रंग के लेबलों से चेतावनी देने की तैयारी

भारत में कई सालों से खाने-पीने के पैकेटबंद उत्पादों पर वॉर्निंग लेबल लगाने पर बहस चल रही थी लेकिन खाद्य उद्योग की ओर से इसका विरोध हो रहा था। उन्हें खासतौर पर इस बात का डर था कि भारत के कई पारंपरिक खाद्य उत्पादों में चीनी और वसा की मात्रा अधिक होती है और लेबल लगाने से उपभोक्ता उन्हें खरीदने से बचने लगेंगे।

 

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने कहा है कि वह ऐसे खाद्य पदार्थों पर सख्त चेतावनी वाले लाल लेबल लगा सकता है जिनमें चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा सरकार द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक हो।

 

ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन का कहना है कि प्रस्तावित लेबलिंग नियम के तहत भारत में 80 फीसदी पैकेटबंद खाद्य पदार्थों को चीनी, नमक या वसा की उच्च मात्रा वाले खाद्य पदार्थों के रूप में चिह्नित किया जा सकता है। वहीं, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इससे आम लोगों में खाद्य पदार्थों के प्रति जागरुकता बढ़ेगी।

 

साल 2016 में चिली में भी पैकेटबंद खाद्य उत्पादों पर वॉर्निंग लेबल छापने का कानून लाया गया था। रिसर्चरों के मुताबिक, इसके बाद चीनी वाले पेयों की बिक्री में करीब 24 फीसदी की गिरावट देखी गई। स्वास्थ्य विशेषज्ञ उम्मीद जता रहे हैं कि वॉर्निंग लेबल छपने की शुरुआत होने से भारत में भी लोगों की खान-पान की आदतें बेहतर होंगी।