
Reservation Protest Delhi: आरक्षण के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति न देने के फैसले पर दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। क्षत्रिय करणी सेना की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने दिल्ली पुलिस के रुख पर सवाल उठाए और पूछा कि बिना किसी शर्त के इस तरह का ब्लैंकेट बैन (पूर्ण प्रतिबंध) कैसे लगाया जा सकता है।
आशंका के आधार पर इनकार गलत
सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि पुलिस का काम आशंकाओं के आधार पर सीधी अनुमति रद्द करना नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि पुलिस को भीड़ अधिक होने का अंदेशा था, तो वह सख्त शर्तें और समय सीमा तय कर के अनुमति दे सकती थी। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आप कुछ बंदिशें लगाकर अनुमति दे सकते हैं, सीधे मना कैसे कर सकते हैं?”
दिल्ली पुलिस की दलील और जंतर-मंतर की क्षमता
दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने कोर्ट को बताया कि जंतर-मंतर एक संवेदनशील इलाका है और यहां जगह की कमी है। उन्होंने तर्क दिया कि करणी सेना के सोशल मीडिया पर व्यूज और लाइक्स को देखते हुए जंतर-मंतर की तय क्षमता से काफी ज्यादा भीड़ जुटने की आशंका थी, जिससे पूरे मध्य दिल्ली की यातायात व्यवस्था प्रभावित हो सकती थी।
सोशल मीडिया लाइक्स और जमीनी भीड़ में अंतर
करणी सेना के वकील रोशन धनाई ने पुलिस के दावों का खंडन करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर पोस्ट देखने वाले लोग देश-दुनिया से हैं, वे सभी प्रदर्शन में नहीं आ रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि जंतर-मंतर ऐतिहासिक रूप से शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का केंद्र रहा है और वहां सुरक्षा बनाए रखना पुलिस के नियंत्रण में है।
विकल्पों पर विचार करने के निर्देश
हाई कोर्ट के रुख के बाद अदालत ने पुलिस से पूछा कि क्या जगह बदलकर या कुछ शर्तों के साथ प्रदर्शन की अनुमति दी जा सकती है? इस पर एएसजी ने जवाब दिया कि वह इस मुद्दे पर नए निर्देश प्राप्त कर अदालत को सूचित करेंगे।
सोशल मीडिया अकाउंट बैन का भी उठा मुद्दा
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को यह भी अवगत कराया गया कि उनके प्रदर्शन से जुड़े फेसबुक लाइव और व्हाट्सएप नंबर को निलंबित कर दिया गया है, हालांकि इंस्टाग्राम अकाउंट बहाल हो गया है। अदालत ने पुलिस को अपना रुख स्पष्ट करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर तय की है।
क्या है आरक्षण विरोधी आंदोलन?
हाल के आरक्षण विरोधी आंदोलनों (Anti-Reservation Movements) का कोई एक एकल चेहरा नहीं है, बल्कि अलग-अलग संगठन, युवा वर्ग और सामान्य श्रेणी (General Category) के समूह इनका नेतृत्व कर रहे हैं। इनमें दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' (RHA), यूथ फॉर इक्वैलिटी और क्षत्रिय करणी सेना जैसे संगठनों द्वारा किए जा रहे प्रदर्शन प्रमुख हैं।
प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत आरक्षण के कारण अधिक अंक (Merit) हासिल करने वाले सामान्य वर्ग के छात्रों को अवसर नहीं मिल पाता। इससे देश की प्रतिभा का सही उपयोग नहीं हो पाता। इस आंदोलन का सबसे बड़ा आधार यह मांग है कि आरक्षण की व्यवस्था जातिगत (Caste-based) न होकर आर्थिक स्थिति (Economic Status) पर आधारित होनी चाहिए, ताकि समाज के सभी वर्गों के गरीब लोगों को इसका लाभ मिल सके।
आंदोलनकारियों की मांग है कि जो परिवार या समुदाय दशकों से आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम हो चुके हैं, उन्हें आरक्षण की सूची से बाहर (क्रीमी लेयर) किया जाए ताकि वास्तव में जरूरतमंदों को मौका मिले।


