भारत के लिए ट्रम्प से ज्यादा खतरनाक है डेमोक्रेट्स!

भारत के लिए ट्रम्प से ज्यादा खतरनाक है डेमोक्रेट्स!

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अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रम्प को मिले चुनावी झटकों और डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़ती ताकत के बीच भारत के लिए यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि वाशिंगटन का रुख उसके प्रति नरम पड़ जाएगा। भारत की नीतियों की आलोचना करने में डेमोक्रेटिक सांसद भी पीछे नहीं रहे है। कश्मीर, धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों के अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर पार्टी के कई प्रभावशाली नेता लगातार भारत सरकार पर सवाल उठाते रहे है। ऐसे में अमेरिकी सत्ता के बदलते समीकरणों से भारत के प्रति इस आलोचनात्मक रवैये में बदलाव की उम्मीद करना उचित नहीं होगा।

 

शीतयुद्ध के दौर में भारत की गुटनिरपेक्ष विदेश नीति, पाकिस्तान के साथ अमेरिका के रणनीतिक संबंध और भारत के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच कई बार मतभेद उभरे। मई 1998 में भारत के पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद तत्कालीन डेमोक्रेट राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रशासन ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिकी प्रशासन का तर्क था कि इन परीक्षणों से दक्षिण एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ तेज हो सकती है।  2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद अमेरिकी कांग्रेस में भारत की नीतियों पर आलोचना  खूब हुई थी और इसमें आगे डेमोक्रेटिक सांसद ही थे।

भारतीय मूल की डेमोक्रेट सांसद प्रमिला जयपाल ने दिसंबर 2019 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में रेजोल्यूशन 745 प्रस्तुत किया था। इसमें जम्मू-कश्मीर में संचार प्रतिबंध समाप्त करने, हिरासत में लिए गए लोगों के मामलों की समीक्षा करने और धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की मांग की गई थी। इस प्रस्ताव का समर्थन बर्नी सैंडर्स और एलिजाबेथ वॉरेन जैसे नेताओं ने भी किया। जानी मानी डेमोकेटिक नेता कमला हैरिस ने कश्मीर के लोगों के नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का प्रश्न उठाया था। इस प्रकार कश्मीर अमेरिकी डेमोक्रेटिक राजनीति में भारत से जुड़े प्रमुख मुद्दों में शामिल  रहा है।

 

2020 के राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडेन ने अपने चुनावी कार्यक्रम में सीएए, एनआरसी और जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंधों को लेकर चिंता जताई थी। एक और चर्चित डेमोक्रेट सांसद इल्हान उमर ने अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की है। वे भारत के प्रति अपने आलोचनात्मक रुख के कारण लगातार चर्चा में रही है। इल्हान उमर कश्मीर, धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भारत सरकार की नीतियों पर सवाल उठाती रही है। 2022 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान उन्होंने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का दौरा किया था और वहां मानवाधिकारों तथा कश्मीर की स्थिति पर बयान दिए थे।

भारत ने इस यात्रा पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन बताया था। 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान भी इल्हान उमर ने भारत को लेकर अपनी आलोचना जारी रखी। उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की स्थिति पर चिंता जताई गई थी और धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन से जुड़ी अमेरिकी निगरानी सूची में भारत को शामिल करने की मांग की गई थी।  पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की यात्रा और भारत के खिलाफ अमेरिकी संसद में प्रस्ताव पेश करने जैसी घटनाओं के कारण भारत में उन्हें भारत विरोधी दृष्टिकोण रखने वाली सांसद के रूप में देखा जाता है। 

 

एक और डेमोक्रेट सीनेटर टैमी बाल्डविन ने 2023 को सीनेट में रेजोल्यूशन 424 प्रस्तुत किया था। इसमें भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध कथित उत्पीड़न तथा हिंसा समाप्त करने का आग्रह किया गया था। अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी लोकतंत्र, धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के प्रश्नों पर भारत सरकार की आलोचना करती रही है। यही विरोधाभास बाइडेन प्रशासन के समय भी दिखाई दिया था।  उस समय प्रधानमंत्री मोदी को राजकीय यात्रा का निमंत्रण दिया गया था और रक्षा तथा तकनीकी सहयोग को नई ऊंचाई मिली, दूसरी ओर अमेरिकी कांग्रेस में भारत की आंतरिक नीतियों पर आलोचनात्मक प्रस्ताव प्रस्तुत होते रहे थे।

 

यहां अमेरिकी विदेश नीति की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठते है। पाकिस्तान में सैन्य शासन, लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी और अल्पसंख्यकों की स्थिति के बावजूद अमेरिका ने अपने रणनीतिक हितों के लिए लंबे समय तक पाकिस्तान के साथ सहयोग किया है। इसके विपरीत भारत के आंतरिक मामलों पर अमेरिकी सांसदों की मुखरता दिखाई देती है। यह अंतर अमेरिकी विदेश नीति में रणनीतिक हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच मौजूद तनाव को उजागर करता है। 4 नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की सफलता ने अमेरिकी राजनीति में शक्ति संतुलन को प्रभावित किया है। इससे ट्रम्प प्रशासन को कांग्रेस में अधिक राजनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। डेमोक्रेट सांसद संसदीय समितियों, सुनवाई और प्रस्तावों के माध्यम से प्रशासन की नीतियों पर दबाव बढ़ा सकते है। भारत से जुड़े मुद्दे भी इस राजनीतिक खींचतान का हिस्सा बन सकते है।

 

अमेरिकी राजनीति में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं, लेकिन भारत को लेकर रिपब्लिकन से कहीं ज्यादा कड़ा व्यवहार डेमोक्रेट्स का रहा है। जाहिर है अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में ट्रम्प के कमजोर पड़ने और  डेमोक्रेट्स के मजबूत होने का फायदा भारत को मिलने वाला है, ऐसा तो नहीं लगता और न ही डेमोक्रेट्स का इतिहास इसकी अनुमति देता है।