
सुबह सात बजे टिन्नी की आंख खुली तो सबसे पहले उसे याद आया आज दिवाली है। वैसे तो दिवाली हर साल आती है और पिछली तीन-चार दीवालियां और फुलझड़ियों की धूम उसे याद है, लेकिन इस दिवाली पर कुछ नया करेंगे टिक्कू भैया ने कल बोला था। यही सोचकर उसे उत्सुकता हो रही थी कि क्या नया करेंगे? झट से आंखें मलते हुई वह उठी और सीधे ही टिक्कू भैया के कमरे में जा पहुंची। लेकिन यह क्या, टिक्कू भैया तो घुर्राटे मारकर सो रहे थे। ऐसे में ये क्या नया करेंगे, ये तो अभी तक सो रहे हैं। सोचते-सोचते उसने टिक्कू को जोर से हिलाना शुरू कर दिया। टिक्कू भैया नया कुछ करना है ना आज।
इस अप्रत्याशित हमले को झेलने के लिए ग्यारह साल का टिक्कू बिलकुल भी तैयार नहीं था। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। क्या है टिन्नी सोने भी नहीं देती, जाओ यहां से।
भैया आज दिवाली है न, नया कुछ करना है भूल गए आप। टिन्नी बनावटी गुस्से में बोली। अरे! हां मैं तो भूल ही गया। वह झटपट बिस्तर से उठ गया।
दोनों मुंह-हाथ धोकर बैठक खाने में आ गए। दादाजी चाय की चुस्कियों में व्यस्त थे। मेज पर अखबार सामने रखा था।
टिन्नी आज हम रसगुल्लों पर चर्चा करेंगे। टिक्कू ने जब सोफा पर बैठते हुए कहा तो टिन्नी बिफर उठी, आपने तो नया कुछ करने को… कहा था…।
टिन्नी की बात काटकर टिक्कू बोला यही तो है नया।
रसगुल्लों पर चर्चा!
यह भी कुछ नया हुआ? रसगुल्ले कैसे बनते हैं, कहां बनते हैं, कैसे खाते हैं ये सब बातें। हट्ट, मुझे नहीं करना ऐसी चर्चा।टिन्नी फिर भिनक गई।
अरे बाबा वो चर्चा नहीं है यह, हम टीवी में देखते हैं न, चाय पर चर्चा, कॉफ़ी पर चर्चा, होस्ट और गेस्ट बैठते हैं आमने-सामने फिर चर्चा होती है चाय अथवा कॉफ़ी पीते हुए। टिक्कू बोला।
अच्छा…. वैसी वाली चर्चा। तब तो मजा आएगा। किसके साथ करेंगे, होस्ट कौन होगा और गेस्ट कौन….? आठ साल की टिन्नी सब कुछ जल्दी से जल्दी जान लेना चाहती थी।
मैं और तुम, मतलब हम दोनों होंगे होस्ट और दादाजी होंगे गेस्ट। है न दादाजी?
टिक्कू ने दादाजी की तरफ निहारा बड़ी उम्मीद के साथ। हां के सिवा कोई दूसरा उत्तर हो भी नहीं सकता था उनके पास।
रसगुल्लों पर चर्चा मतलब रसगुल्ले खाते हुए दादाजी से बातचीत, क्या बढ़िया विषय चुना है टिक्कू भैया ने। टिन्नी बहुत खुश थी।
खाना खाने के बाद बैठ गए तीनों।सामने रसगुल्लों से लबालब भरी प्लेट रखी थी और साथ में तीन चम्मचें भी।
दादाजी आप बचपन में दिवाली किस तरह मनाते थे, कितने दीपक जलाते थे, क्या आप भी अपने पापा के साथ दीपक लेने बाज़ार जाते थे? टिक्कू ने एकसाथ तीन प्रश्न दागे।
अरे भाई, हम दिवाली मजे से मनाते थे लेकिन दिए लेने बाज़ार नहीं जाते थे। दिए हमें घर पर ही प्राप्त हो जाते थे।
घर पर! घर पर कैसे दादाजी? टिक्कू बोला।
हमारे जमाने में कुम्हार कक्का घर पर आकर पांच सौ दिए और पच्चीस डबुलियां (छोटी-छोटी मटकियां) दे जाते थे।
पांच सौ दिए! इतने सारे दिए आप जलाते थे? टिक्कू चौंककर बोला।
नहीं बेटे, दो सौ के लगभग दिए हम अपने लिए रख लेते थे और बाकी घर में काम करने वाले मजदूरों को और काम वाली बाइयों को बांट देते थे। उनको भी तो दिवाली मनाना होती थी न।
मगर इतने सारे दिए कुम्हार काका कैसे लाते थे?
उनके पास एक गधा था। उसी पर लादकर कुम्हार कक्का दिए लाते थे और मुहल्ले के ख़ास-ख़ास घरों में दिए दे जाते थे।
अरे वाह, गधे पर दिए, टिन्नी ताली बजाकर हंसने लगी। फिर उसी ने प्रश्न पूछा दादाजी दीयों के लिए बत्ती और तेल,इसके लिए तो बाज़ार जाते होंगे न।
नहीं बिलकुल नहीं, तेलन फुआ घर आकर मूंगफली का तेल दे जाती थीं।उस समय तिली अथवा सरसों का तेल खाने के काम आता था और दीगर कामों में मूंगफली का तेल।
लेकिन दीपकों के लिए बाती के लिए तो बाजार से कपास लाते ही होंगे न अब टिक्कू चहका।
नहीं यहां भी नहीं, बाज़ार क्यों जाना जब घर में ही कपास के पेड़ लगे हों। मेरी दादी कपास के फूलों से रुई निकालकर चार-छह दिन पहले ही रख लेती थीं। बत्ती बनाने का काम जरूर मुझे सौंप दिया जाता था।
अरे यार दादाजी ये तो गप्प मालूम पड़ती है।हर एक काम घर में होता था बाज़ार जाते ही नहीं थे क्या? टिन्नी फिर टुनकी।
दिए घर में आ गए, कुम्हार कक्का दे गए, तेल, तेलन फुआ घर दे गईं, घर की रुई से बातियां बन गईं। बाज़ार का कोई काम नहीं। दादाजी आप ऊंची-ऊंची तो नहीं फेंक रहे हैं। टिक्कू ने अविश्वास सा करते हुए आंखें मिचमिचाईं।
अच्छा दादाजी ठीक है सब कुछ घर में आ जाता था तो मिठाई लेने तो बाजार जाते होंगे। टिन्नी ने जैसे यह प्रश्न करके दादाजी को परास्त करने का कोई ब्रह्मास्त्र उठा लिया हो।
नहीं मिठाई भी नहीं, मिठाई का क्या कहना। घर में ही इतनी शानदार मिठाई बनती थी कि…. वाक् युद्ध में अजेय दादाजी कुछ आगे कह पाते कि टिक्कू बोल उठा सारा मोहल्ला सुगंध से महक उठता था। है न दादाजी।
बिलकुल सही पकड़े हैं। घर में चार गाएं और तीन भैंसें थीं। दिवाली से दो तीन दिन पहले ही मावा तैयार कर लिया जाता था। गुलाब जामुन, लड्डू और बरफी, सब कुछ घर में ही तैयार हो जाता था। एक बात और बताएं बच्चों। दादाजी ने ऐसे कहा, जैसे कोई बहुत गोपनीय बात बताने जा रहे हों।
हां-हां बताइए, एक नहीं दो बातें बताइए दादाजी। टिन्नी चहकी।
मेरे मामाजी के यहां से बेसन की मिठाई भी आ जाती थी। मेरी मामी बहुत अच्छी बनाती थी।
बेसन की मिठाई है आई रे,
मोरे मम्मा ने भेजी।
मम्मा ने भेजी और माईं ने भेजी।
बेसन की मिठाई है आई रे, मोरे मम्मा ने भेजी।
दादाजी गुनगुनाने लगे।
अच्छा आपका फेवरेट गीत है यह तो, जिसे आप यदाकदा गुनगुनाते रहते हैं। टिक्कू उनकी तरफ देखकर बोला।
हां बेटे, मामाजी के यहां से आई उस बेसन की मिठाई का स्वाद तो मुझे अभी तक अनुभव होता रहता है। काजू, किशमिश, बादाम, पिस्ता और केसर की सुगंध अहा! क्या मजा आता था उस मिठाई में। दादाजी जैसे स्वप्न लोक में जाकर मिठाई का आनंद लेने लगे थे।
अरे! ये रसगुल्लों पर चर्चा कर रहे न हम लोग। आज का टॉपिक है यह। रसगुल्ले तो किसी ने खाए ही नहीं।दादाजी ने स्मरण दिलाया।
अरे हां यह तो भूल ही गए। टिक्कू जोर से बोला और सबने प्लेट से उठाकर एक-एक रसगुल्ला गप्प से खा लिया।
दादाजी फूल माला, क्या ये सब भी घर में ही……टिन्नी पूछने को हुई तो दादाजी ने उसके प्रश्नों के तीर को अपनी हाजिर जवाबी की ढाल पर रोक लिया।
हां मालिन काकी ढेर सारे फूल और मालाएं बनाकर घर पर दे जाती थीं। तालाब से लाए कमल के सुन्दर-सुन्दर फूल बड़े प्यारे लगते थे। मोगरा चमेली के फूलों की सुगन्धित मालाएं, घर महक उठता था।वाह क्या मजे थे उन दिनों।दादाजी सचमुच पुरानी यादों में खो गए।
चर्चा में दादाजी से पार पाना बहुत मुश्किल लग रहा था था। पर बच्चे भी कब हार मानने वाले थे।
दादाजी पटाखे बनाने वाला कारखाना आपके मकान के किस कमरे में था। फुलझड़ियां भी क्या किचन में बनती थीं?
टिक्कू को अब शरारत सूझने लगी थी।
अरे यार पकड़ लिया न तुम लोगों ने। दादा जी ठहाका मारकर हंसे।पटाखे घर में नहीं बनते थे।फुलझड़ियां लेने मैं अपने पिताजी के साथ बाजार जाता था। कभी-कभी चाचाजी ढेर सारे पटाखे खरीदकर लाते थे। सब बच्चों को फुलझड़ियां, चकरी, दीवाल फोड़ जैसे छोटे पटाखे मिलते थे। पापाजी और चाचाजी तो काम करने वाले मजदूरों के बच्चों को भी पटाखे बांटते थे।
दादाजी मतलब यह हुआ कि जो चीजें स्वास्थ्य के लिए हितकर होती थीं वह सब घर में ही बनती थीं, जैसे मिठाइयां नमकीन पूड़ी, कचौड़ी, रायता इत्यादि और जो हानिकारक होती थीं जैसे पटाखे वह बाहर बनते थे,है न दादाजी। टिक्कू ने अपनी बात रखी।
बात तो बिलकुल सही है दादाजी हाथ ऊपर उठाकर बोले।
दादाजी एक अंतिम प्रश्न और है- जब दो सौ दिए जलाते थे तो उनको जलाकर कहां रखते थे? टिक्कू ने पूछा।
अरे भाई पहले गांव में बिजली तो थी ही नहीं, न बल्ब, न ही बिजली झालर।बस दिए ही दिए थे।सब कमरों में एक-एक दिया, आंगन में चार दिए, चहारदीवारी पर एक कतार में बीस पच्चीस दिए, सब दरवाजों, खिड़कियों पर दिए,छत की मुंडेर पर बीस-पच्चीस दिए, रसोई घर में दिए और नहानी और कुएं की जगत पर दिए। सारा घर जगर-मगर हो जाता था।
आंगन में बनाए गोवर्धन के पेट पर रखे दिए से घर के सारे बच्चे-बड़े फुलझड़ियां पटाखे जलाते थे। हां, कुछ दिए पड़ोसियों के घर भी रखने हम जाते थे। दिए रखकर हम कहते थे ‘ये मेहमान हैं इन्हें संभालकर रखना’। फिर दिवाली का ढेर सारा प्रसाद भी हमें वहां मिल जाता था। फुलझड़ियां और पटाखे भी मिल जाते थे। दादाजी मजे-मजे से अपने बचपन की दिवाली को स्मरण कर रहे थे।
दादाजी अंतिम के बाद का एक प्रश्न और… टिन्नी चहकी।
हां जल्दी पूछो, पूजा की तैयारी भी करना है ना। दादाजी उठने को हुए।
अपने घर पर पूजा में आप क्या काम करते थे?
हम शंख बजाते थे, झालर-घंटा मेरे पिताजी और माताजी मंजीरा बजाकर आरती गाती थीं- ॐ जय जगदीश हरे……।
चलो उठो अब पूजा का समय हो रहा है।
दादी जी ने आवाज़ लगाई तो सब लोग सतर्क हो गए।
रसगुल्लों पर चर्चा समाप्त हुई टिक्कू बोला और सब लोग उठकर ताली बजाने लगे।


