
यूरोपीय भूविज्ञान संघ में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, उत्तराखंड में हिमालय के नीचे मुख्य हिमालयी थ्रस्ट फॉल्ट (Fault) पूरी तरह लॉक है, जिससे लगातार खतरनाक तनाव और ऊर्जा जमा हो रही है। विज्ञानियों का अनुमान है कि यह ऊर्जा हर 100 साल में 8.1 तीव्रता के भारी भूकंप के बराबर हो सकती है। हालांकि यह सिर्फ ऊर्जा के संचय का आकलन है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर 100 साल में भूकंप आना तय है। ALSO READ: 24 October Top News: तिब्बत में फिर भूकंप, फ्रांस में प्रदर्शन, भारत-चीन तनाव पर क्या बोला विदेश मंत्रालय?
आईआईटी बॉम्बे और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको के शोधकर्ताओं ने मिलकर यह स्टडी की है। इसमें सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ तमिलनाडु के वैज्ञानिक भी शामिल है। अध्ययन के अनुसार, भारतीय प्लेट और हिमालय के बीच स्थित मुख्य हिमालयी थ्रस्ट का बड़ा हिस्सा अवरुद्ध है। इससे प्लेटों की गति के कारण पैदा होने वाला तनाव लगातार जमा हो रहा है।
हर साल 18 मिलीमीटर का खिसकाव-अंतर
तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ता दिब्यशक्ति पांडा और उनके सहयोगियों ने उपग्रह स्थिति निर्धारण प्रणाली तथा रडार उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन में मुख्य हिमालयी थ्रस्ट पर हर साल लगभग 18 मिलीमीटर का खिसकाव-अंतर सामने आया। इसका अर्थ है कि प्लेटों की अपेक्षित गति और भ्रंश पर वास्तविक खिसकाव के बीच अंतर बना हुआ है। ALSO READ: क्या विज्ञान सच कर रहा है अलकेमिस्ट्स का सपना? पारे से लैब में बना सोना, जानिए क्यों नहीं गिरेंगे मौजूदा दाम
115 किलोमीटर चौड़ा क्षेत्र अवरुद्ध
शोध के अनुसार, मुख्य हिमालयी थ्रस्ट लगभग 115 किलोमीटर की चौड़ाई तक अवरुद्ध है। उपग्रह रडार आंकड़ों में जमीन का अधिकतम ऊर्ध्वाधर उठाव भी प्रति वर्ष चार से छह मिलीमीटर दर्ज किया गया। विज्ञानियों ने इन आंकड़ों के आधार पर भूगर्भीय माडल तैयार किया। परिणामों से उत्तराखंड हिमालय के नीचे प्लेटों के बीच मजबूत जुड़ाव और तनाव जमा होने के संकेत मिले।
अध्ययन में जमा भूकंपीय ऊर्जा की तुलना हर 100 साल में 8.1 तीव्रता के एक बड़े भूकंप से की गई है। हालांकि, यह ऊर्जा संचय का अनुमान है, भूकंप आने की समय-सारिणी नहीं।
पहाड़ी ढलानों की इमारतों ने बढ़ाई चिंता
विज्ञानियों ने यह दावा नहीं किया है कि अगला बड़ा भूकंप कब आएगा या उसकी तीव्रता निश्चित रूप से कितनी होगी। उनका कहना है कि उत्तराखंड में पहाड़ी ढलानों पर लगातार इमारतें बन रही हैं। कई जगह बिल्डिंग कोड का पालन नहीं हो रहा है।
मैदानी इलाकों पर भी पड़ सकता है असर
शोधकर्ता साफ चेतावनी देते हैं कि इंडो-गंगेटिक प्लेन यानी गंगा-यमुना के मैदानी इलाके भी बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। इन मैदानों में भारत की करीब 40 प्रतिशत आबादी रहती है। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, पटना जैसे बड़े शहर भी इसी क्षेत्र में हैं। इससे बड़े भूकंप की स्थिति में नुकसान बहुत ज्यादा हो सकता है।
भूकंप निगरानी के लिए बनेंगी 8 नई वेधशालाएं
भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील उत्तराखंड में अब धरती के भीतर होने वाली हलचल पर पैनी नजर रखने के लिए राज्य में 8 वेधशालाएं बनाने का फैसला किया गया है। इनके स्थापित होने पर प्रदेश में भूकंप का पता लगने के साथ ही आपदा प्रबंधन तंत्र को मजबूत बनाने में भी मदद मिलेगी। राज्य की ओर से 8 स्थलों का चयन कर इस संबंध में प्रस्ताव राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र को भेज दिया गया है।


