कॉर्पोरेट दुनिया में मेहनती और हमेशा उपलब्ध रहने वाले कर्मचारी को अक्सर जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन क्या हर दिन जरूरत से ज्यादा काम करना आगे चलकर आपके लिए ही परेशानी बन सकता है? इसी सवाल को लेकर एक महिला ने सोशल मीडिया पर अपनी राय साझा की है। उनका कहना है कि अगर कर्मचारी लगातार तय समय से पहले काम पूरा करते हैं या ऑफिस के बाद भी मैसेज का जवाब देते रहते हैं, तो धीरे-धीरे मैनेजमेंट उसी प्रदर्शन को सामान्य मानने लगता है। जो काम कभी अतिरिक्त प्रयास था, वही बाद में रोज की अपेक्षा बन सकता है। उन्होंने कर्मचारियों को अपनी पूरी ऊर्जा हर दिन खर्च करने के बजाय कुछ हिस्सा बचाकर रखने की सलाह दी।
उनके मुताबिक, यह काम से बचने की बात नहीं है, बल्कि मुश्किल दिनों के लिए खुद को तैयार रखने का तरीका है। सोशल मीडिया पर उनकी इस सोच को लेकर कई लोगों ने सहमति जताई और अपने ऑफिस अनुभव भी साझा किए।
‘आज जल्दी काम किया तो कल भी उतनी ही उम्मीद होगी’
इंस्टाग्राम पर अव्रीन ने एक वीडियो शेयर कर कर्मचारियों को काम और निजी जिंदगी के बीच सीमाएं तय करने की सलाह दी। उन्होंने समझाया कि अगर कोई कर्मचारी छह घंटे में पूरा होने वाला काम सिर्फ तीन घंटे में खत्म कर देता है, तो मैनेजर भविष्य में उसी काम को तीन घंटे में पूरा होने वाला मान सकते हैं। यानी एक बार दिखाई गई अतिरिक्त तेजी आगे चलकर रोज की अपेक्षा बन सकती है।
रात 10 बजे जवाब दिया तो रोज की उम्मीद?
अव्रीन ने ऑफिस के मैसेज का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई कर्मचारी कभी-कभार रात 10 बजे Teams पर जवाब देता है, तो इससे दूसरों को यह लग सकता है कि वह उस समय भी उपलब्ध रहता है। उनका कहना है कि कॉर्पोरेट माहौल में एक अनकही धारणा बन सकती है आपका सबसे अच्छा प्रदर्शन ही धीरे-धीरे आपका सामान्य प्रदर्शन मान लिया जाता है।
‘80% दो, 20% अपने लिए बचाकर रखो’
महिला ने कर्मचारियों को हर दिन अपना पूरा दम लगाने के बजाय अपनी ऊर्जा का कुछ हिस्सा बचाकर रखने की सलाह दी। उनके मुताबिक, इसका मतलब काम में लापरवाही करना नहीं है। बल्कि जरूरी यह है कि कर्मचारी अपनी पूरी क्षमता को हर दिन का न्यूनतम मानक न बनने दें। बची हुई ऊर्जा उन दिनों काम आ सकती है, जब तबीयत खराब हो, निजी जिंदगी में कोई परेशानी चल रही हो या ऑफिस में अचानक कोई जरूरी स्थिति पैदा हो जाए।
ज्यादा मेहनत और लापरवाही में फर्क
अव्रीन ने साफ किया कि उनकी सलाह जिम्मेदारियों से बचने या जानबूझकर काम धीमा करने की नहीं है। उनका फोकस वर्कप्लेस बाउंड्रीज पर है। उनके मुताबिक, कभी-कभार अतिरिक्त मेहनत करना ठीक है, लेकिन अगर वही हर दिन की अपेक्षा बन जाए तो कर्मचारी पर लगातार दबाव बढ़ सकता है।
सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा- ‘बात तो सही है’
अव्रीन की पोस्ट पर कई सोशल मीडिया यूजर्स ने उनके विचारों से सहमति जताई। कुछ लोगों ने कहा कि ऑफिस में सीमाएं तय करना जरूरी है, जबकि कई ने अपने अनुभव भी साझा किए।
एक यूजर ने लिखा कि वर्कप्लेस पर सीमाएं बनाना बेहद जरूरी है। दूसरे ने कहा कि यह बात बिल्कुल सही है। एक अन्य यूजर ने कॉर्पोरेट लाइफ को समझाने वाला अनुभव बताया।
एक कर्मचारी ने अपने मैनेजर का उदाहरण देते हुए लिखा कि लंबे समय तक 10 घंटे से ज्यादा काम करने के बावजूद उसे सामान्य काम का हिस्सा माना जाने लगा। इसके बाद उसने तय ऑफिस टाइम खत्म होते ही काम बंद करना शुरू कर दिया।
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