तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल करते हुए कश्मीर का मुद्दा उठाया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें उच्च स्तरीय सत्र में दुनिया भर के नेताओं को संबोधित करते हुए एर्दोगन ने दक्षिण एशिया में शांति का जिक्र करते हुए कश्मीर मामले को संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के तहत सुलझाने की बात कही। हालांकि एर्दोगन का कश्मीर राग कोई नई बात नहीं है।
किसी वैश्विक मंच से तुर्की के राष्ट्राध्यक्ष द्वारा कश्मीर राग अलापे जाने का यह कोई पहला मामला नहीं है। वह इससे पहले भी कई मौकों पर यूएन में इस विषय पर बयानबाजी कर चुके हैं।
पहले जानिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में एर्दोगन ने क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में मंगलवार को अपने संबोधन के दौरान एर्दोगन ने दक्षिण एशियाई क्षेत्र के मुद्दों पर बात की। एर्दोगन ने कहा कि दक्षिण एशिया में यह महत्वपूर्ण है कि कश्मीर मुद्दे सहित सभी विवादों का समाधान संयुक्त राष्ट्र चार्टर के ढांचे और संबंधित प्रस्तावों के दायरे में रहते हुए बातचीत के माध्यम से किया जाए।
UNGA में एर्दोगन पहले भी कर चुके हैं कश्मीर का जिक्र
संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से कश्मीर का जिक्र करना राष्ट्रपति एर्दोगन के भाषणों का नियमित हिस्सा रहा है, हालांकि इसमें समय-समय पर बदलाव भी देखे गए हैं। इससे पहले पिछले साल सितंबर में भी यूएनजीए के अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कश्मीर मुद्दे के समाधान का आह्वान किया था। साल 2024 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए अपने भाषण के दौरान एर्दोगन ने जम्मू-कश्मीर का कोई उल्लेख नहीं किया था और इस मुद्दे को छोड़ दिया था। इससे पहले वर्ष 2020 में आम बहस के दौरान दिए गए अपने पहले से रिकॉर्ड किए गए वीडियो संदेश में भी एर्दोगन ने जम्मू-कश्मीर का संदर्भ दिया था।
भारत का सख्त रुख- दूसरों की संप्रभुता का सम्मान करना सीखे तुर्की
वर्ष 2020 में जब एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र में जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया था, तब भारत ने इस पर बेहद कड़ी और सख्त आपत्ति दर्ज कराई थी। भारत ने तुर्की के बयानों को पूरी तरह से अस्वीकार्य करार दिया था। भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि तुर्की को दूसरे देशों की संप्रभुता का सम्मान करना सीखना चाहिए और अपनी खुद की नीतियों पर अधिक गहराई से विचार करना चाहिए। भारत हमेशा से यह रुख दोहराता रहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और यह पूरी तरह से भारत का आंतरिक मामला है।

