सत्य, प्रेम, करुणा से लेकर राम हरि और जयजगत तक विनोबा भावे का सर्वोदय दर्शन!

सत्य, प्रेम, करुणा से लेकर राम हरि और जयजगत तक विनोबा भावे का सर्वोदय दर्शन!

Vinoba Bhave 131st Birth Anniversary

Vinoba Bhave 131st Birth Anniversary: आज ग्यारह सितंबर को संत विनोबा भावे का 131वां जन्मदिवस है। युवा विनोबा भावे के मन में हिमालय में जाने का भाव उठा पर शीघ्र ही विनोबा के कदम हिमालय के बजाय महात्मा गांधी के पास या सानिध्य में जाने की दिशा में चल पड़े और इस तरह विनोबा जी महात्मा गांधी के पास पहुंच गए। गांधी जी ने विनोबा भावे को पहला सत्याग्रही कहा ही नहीं घोषित भी किया। विनोबा ने तीन शब्दों में मनुष्य जीवन सूत्र का सार बताया “सत्य, प्रेम, करुणा।”

 

विनोबा सूत्र में संवाद करते थे। जिसका सुनने समझने वाले अपने अपने तरीके से अर्थ और भाष्य करते थे। पर विनोबा के सूत्र कालजयी एवं स्पष्ट हैं। 1974 में भारत में आपातकाल लगने से पहले ही विनोबा जी मौन ले चुके थे। विनोबा का मौन देश-दुनिया को आत्मचिंतन का स्पष्ट संदेश देता था, आपातकाल में विनोबा से पूछा गया कि क्या संदेश है तो विनोबा ने एक शब्द लिखा अनुशासन पर्व! आपातकाल के सन्नाटे में अनुशासन पर्व की गूंज समूची दुनिया में गूंजती रही। विनोबा के मौन की मुखरता की अभिव्यक्ति शब्दों की ध्वनि से से ज्यादा बोध्यगम्य रही। विनोबा की बौद्धिक क्षमता की सहजता और सरलता का जीवंत शब्द कर्म 'गीताई' के रूप में आज भी लोकसमाज को सत्य प्रेम और विश्वास को आत्मसात करने की असीम ऊर्जा देता है।

 

महाराष्ट्र की बिना पढ़ी-लिखी पर भक्ति ज्ञान और श्रद्धा-विश्वास से ओतप्रोत गुणवान मातृशक्ति को सहज सरल स्वरूप में 'गीताई' मिली। जगत के स्वरूप को जानने की जिज्ञासुओं को 'गीताई' के रूप में साकार रूप में सरल समाधान मिला। 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान नागपुर केन्द्रीय जेल में विनोबा जी ने गीता पर प्रवचन दिए थे, जिसे साने गुरुजी ने लिपिबद्ध किया था जो आज भी देश दुनिया में पढ़ा जाता है।

 

जय जगत की उद्धोषणा का सहज सरल सूत्र देने वाले संत विनोबा अपने विचारों या जीवन दर्शन को सत्य, प्रेम और करुणा के त्रिवेणी संगम के माध्यम से व्यक्त करते रहे। विनायक नरहरि भावे से प्रारंभ हुए विनोबा के हस्ताक्षर 'बाबा' के स्वरूप तक आकर 'राम हरि' में परिवर्तित हो गए। विनोबा जी द्वारा दिया जयजगत शब्द समूचे जगत में व्याप्त हो गया। व्यक्ति नहीं जगत की जय ही जीवन का सार है।

 

संत विनोबा भावे ने अपने जीवन काल में सभी धर्मों के ग्रंथों का अध्ययन मनन और चिन्तन कर हम सब को सभी धर्मों का सार निकाल कर सबके सामने रखा और सभी ने उस सार सहजता और सरलता के साथ स्वीकार किया। विनोबा भावे ने मन और तन के समन्वय के साथ आजीवन लोकसागर से प्रत्यक्ष साक्षात्कार एवं प्रत्यक्ष संवाद करते हुए समूचे देश में पैदल यात्रा करते हुए सतत् संवाद का अद्भुत प्रयोग कर, पैदल लोक यात्री के रूप में बारह साल तक सतत् गतिशील रहकर यात्रा संपन्न की।

 

हर दिन नई जमीन हर समय नया आसमान। भारत भूमि के लोकमानस में दान की गहरी समझ और परम्परा मौजूद है इस सूत्र को सामने रखकर विनोबा जी ने भूदान, ग्राम दान से लेकर जीवन दान के विचार को जमीन पर साकार कर समूची मानव सभ्यता को आजाद भारत में एक दूसरे के साथ मिलकर रहने और मिल-जुलकर ज़ीने का मार्ग अपनी जीवन यात्रा और कृतित्व से समझाया।

 

चंबल घाटी के बागी भाइयों के मन में संत विनोबा भावे ने बागी जीवन को त्याग कर सामान्य मनुष्य की तरह जीवन जीने का भाव जागृत कर बागी भाई सामान्य रूप से जीने की राह के राहगीर बने और सत्य प्रेम करुणा को बचे हुए जीवन का सूत्र बना दिया। विनोबा भावे ने सर्वोदय दर्शन को समग्रता से समझने की राह चुनी। सर्वोदय पात्र की परिकल्पना को साकार स्वरूप प्रदान किया।

 

सबै भूमि गोपाल की सब सम्पत्ति भगवान की के शाश्वत जीवन दर्शन को समग्रता से समझने की दृष्टि विकसित की। जीवन का कार्य सम्पूर्ण हो गया तो बिनोबाजी सहजता से शून्य में विलीन हो गये। अपने जीवन के आखरी पड़ाव में विनोबा जी ने नये प्रयोग किए जैसे शून्य में प्रवेश, क्षेत्र संन्यास। विनोबा ने अपने सभी साथियों एवं लोगों को एक दूसरे से आपस में नाहक मिलने जुलने का सिलसिला अपने निजी एवं सार्वजनिक जीवन में बनाए रखने का रास्ता सुझाया।

 

हम सब एक दूसरे से कोई काम होता है तभी मिलते-जुलते हैं विनोबा जी ने यह सुझाया कि हम नाहक मिलने जुलने की संस्कृति को बढ़ावा देंगे तो हमें स्वतंत्र सहजीवन का आनंद जीवन भर लगातार बिना रुके और विशेष प्रयास के मिलता रहेगा। विनोबा भावे से मिलकर असीम आनन्द और शान्ति की अनुभूति होती थी। विनोबा जी ने देश और दुनिया की भाषाओं को सीखने का सिलसिला आजीवन जारी रखा। अंतिम समय में वे जापानी सीख रहे थे।

 

भारतीय भाषाओं को समझने में लोगों को सहजता और सरलता हो इसलिए विनोबा जी ने सभी भारतीय भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखने का न केवल सुझाव दिया वरन कई पत्र-पत्रिकाओं को देवनागरी लिपि में प्रकाशित करने की शुरुआत भी की और करवाईं। विनोबा जी का जीवन प्रकृति की प्रतिकृति की तरह ही आरंभ से अंत तक बना रहा। हर दिन प्रवाहमान और सरलता से परिपूर्ण संत विनोबा जी का जन्मदिन पर सादर स्मरण, जयजगत।