
भोपाल। 'राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण भारतीय न्याय परंपरा को समृद्ध करने की दिशा में अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है। आज के इस आयोजन की थीम, एक आवाज, सशक्त भविष्य, गरिमा, समावेशन के माध्यम से न्याय पहुंचना है। न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व को लोकतंत्र का आधार बनाया गया है। मध्यस्थता के माध्यम से छोटे-छोटे मामलों का निपटारा कर हम केस पेंडेंसी जैसे गंभीर विषयों पर मंथन कर रहे हैं। हमारे लिए न्याय की अवधारणा पंच परमेश्नरों की परंपरा रही है, जिन्होंने कभी समझाइश देकर, कभी समझौतों से विवादों को सहजता से सुलझाया है।
भगवान श्रीकृष्ण के गीता के ज्ञान से भी समाधान का मार्ग दिखाई देता है, उन्होंने भीषण समय टालने के लिए 5 गांवों से समाधान निकालने का प्रयास किया था। हमारे संविधान में हजारों वर्षों की न्याय परंपरा का आधुनिक उत्कृष्ट संगम है। यह देश का न्याय विधान है और हमारे न्यायालय न्याय के मंदिर हैं। भारतीय अदालतों को लोग श्रद्धा से न्याय मिलने के स्थान के रूप में देखते हैं। न्याय की आस में न्यायालय की चौखट पर कदम रखते हैं। राज्य सरकार न्यायपालिका की भावना के अनुसार अपने सभी उपलब्ध संसाधनों के साथ सदैव सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।' यह बात मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कही। वे 'इंहेंसिंग एक्सेस टू जस्टिस' विषय पर आयोजित वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे।
कॉन्फ्रेंस का आयोजन 8 अगस्त को इंदौर के ब्रिलियंट कंवेंशन सेंटर में किया गया। कार्यक्रम में 'Ensuring Access Protecting Rights Building Futures' पुस्तक, निवारक एवं रणनीतिक विधिक सेवा योजनाएं, न्याय सबके लिए, निवारक एवं रणनीतिक विधिक सेवा योजनाएं, ब्रेल लिपी में मार्गदर्शिका और न्याय के स्वर का विमोचन किया गया। कार्यक्रम में नेशनल लीगल सर्वसेस अथॉरिटी (नालसा) का थीम सॉन्ग दिखाया गया।
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने नालसा शिक्षा स्कीम, नालसा के थीम सॉन्ग को इंडियन साइन लैंग्वेज में लॉन्च किया। कार्यक्रम में मध्यस्थता पर सर्टिफिकेट कोर्स-विवाद से सहमति और जस्टिस टू चिल्ड्रन लिटिगेशन फेलोशिप प्रोग्राम का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम को न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भी संबोधित किया। कॉन्फ्रेंस में सुप्रीम कोर्ट न्यायधीश जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, न्यायधीश विजय बिश्वनोई, न्यायधीश आलोक अराधे, न्यायधीश शील नागु, न्यायधीश संजीव सचदेवा, मध्यप्रदेश उच्च न्यायलय के न्यायधीश विवेक अग्रवाल, न्यायधीश आनंद पाठक सहित सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, विधिक सेवा प्राधिकरणों के वरिष्ठ पदाधिकारी, न्यायिक अधिकारी, महापौर पुष्यमित्र भार्गव उपस्थित थे। कार्यक्रम के अंत में मध्यप्रदेश उच्च न्यायलय के न्यायधीश आनंद पाठक ने आभार व्यक्त किया।
अंग्रेजों के बनाए कानून किए खत्म-कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में बदलाव का स्वर्णिम समय चल रहा है। हमने अंग्रेजों के दौर के अनेक गैर-जरूरी कानूनों को समाप्त कर न्याय को सुलभ और सरल बनाया है। हमारे लिए आधुनिक समय में ई-केस फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल डेटा संग्रह, आधुनिक न्याय प्रबंधन जैसी न्याय प्रणाली लागू की गई है। औपनिवेशक दौर के कानूनों के स्थान पर जो कानून लागू किए गए हैं, वे इसी कड़ी में जनविश्वास अधिनियम के माध्यम से छोटे उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर न्याय को अधिक सरल और नागरिक हितैषी बनाते हैं। राज्य सरकार भी इसी दिशा में आगे बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि हमारी सरकार ने सभी तरह के प्रबंधन किए हैं। अभी कुछ दिन पहले ही अनुच्छेद 44 के माध्यम से राज्य के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से संबंधित विधेयक विधानसभा में पारित किया है। इसे पूर्व न्यायधीश रंजना देसाई के नेतृत्व में बनी समिति के सुधावों पर तैयार किया गया है। राज्य सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध की है कि न्याय में सभी धर्मों का सम्मान होगा और सर्वधर्म सद्भाव बनाए रखने के लिए सरकार हिंदू-मुस्लिम-सिख और ईसाई किसी धर्म में भेदभाव नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी के लिए प्रतिबद्धता दिखाते हुए हमने पेपर लीक, धोखाधड़ी के मामले में तेजी से कार्य करने के लिए 4 फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना की है। उच्च न्यायालय जबपलपुर के विशेष सहयोग से 24 घंटे के अंदर ही इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर में फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित की गई हैं।
न्याय में देरी भी अन्याय ही है-मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश में साइबर सुरक्षा, राष्ट्रीय स्वचालित प्रणाली, ई-जीरो एफआईआर के माध्यम से पुलिस प्रणाली वर्तमान दौर की जरूरतों के अनुसार सुदृढ़ हो रही है। आज के आयोजन में जस्टिस टू चिल्ड्रन लिटिगेशन फेलोशिप प्रोग्राम का शुभारंभ और न्याय के स्वर पुस्तक का विमोचन अत्यंत सराहनीय कदम है। उन्होंने कहा कि मालवा की धरती सम्राट विक्रमादित्य और राजा हरिश्चंद्र के काल से वंदनीय रही है। जहां हर कालखंड में कदम-कदम पर न्याय के उत्कृष्ट उदाहरण समाने आए हैं। लगभग 250 वर्ष पूर्व इसी न्याय नगरी में लोकमाता अहिल्याबाई होलकर ने सुशासन की स्थापना की थी। कोई शासक न्याय करते समय पुत्र और प्रजा में भेदभाव न करे, यह उदाहरण होलकर सम्राज्य में ही देखने को मिला है।
उन्होंने अपने इकलौते पुत्र को गलती के लिए उसी प्रकार दंडित किया, जैसा कोई न्यायाधीश करता है। इसी प्रकार लगभग 2 हजार वर्ष पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का उदाहरण देखने को मिलता है। जब उन्होंने विदेशी आक्रांता शकों को पराजित कर उनकी बेटी से विवाह किया। जब उनके सैनिक पत्नी के भाइयों को बंदी बनाकर सामने लाते हैं तो दोष सिद्ध होने और पत्नी के द्वारा भाइयों के लिए प्राणदान की मांग करने पर भी न्याय के मार्ग से विचलित नहीं हुए। उन्होंने भारतीय न्याय व्यवस्था का सम्मान करते हुए कहा कि हमारे लिए देरी से दिया गया न्याय भी अन्याय के समान है। उन्होंने अपने सालों को प्राणदंड देकर उत्कृष्ट परंपरा का निर्वहन किया।
संवाद से ही संभव है हल-कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि न्याय व्यवस्था के संदर्भ में सशक्त भविष्य, गरिमा, समावेशन सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि यह विधिक सहायता की वास्तविक परिभाषा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने देवी अहिल्याबाई होलकर के न्याय के प्रति समर्पण का जिक्र किया। लोकमाता के लिए न्याय सबके लिए समान था। वे इकलौती महिला शासक थीं, जो निर्बाध रूप से प्रतिदिन नागरिकों, किसानों और विधवाओं से मुलाकात कर उनकी समस्याओं का समाधान करती थीं। वे सीधे नागरिकों से संवाद करती थीं, उनके शासनकाल में किसी के साथ भेदभाव नहीं होता था। ऐसी इंदौर नगरी में इस सम्मेलन का आयोजन किया गया है।
इसके लिए मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण बधाई का पात्र है। उन्होंने कहा कि संवाद की प्रक्रिया अनेक विचारों से एकमत या आवाज तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सभी के पास न्याय की पहुंच सिर्फ कानून के आधार पर तैयार नहीं हो सकती है। यह संवाद से ही संभव है। उन्होंने कहा कि न्याय की प्रक्रिया केवल न्यायपालिका या किसी एक संस्था से पूरी नहीं होती है। इस यज्ञ में सबको मिलकर आहूति देनी होती है। किसी विवाद में मध्यस्थता की प्रक्रिया सामने वाले के सुनने से प्रारंभ होती है। न्याय मिलने से पहले पीड़ित को यह विश्वास होना आवश्यक है कि उसकी पीड़ा या समस्या को कोई सुन रहा है।
सभी का समान वैधानिक उद्देश्य-जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के संवाद और चर्चा के लिए कार्यक्रमों से राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जिला और तहसील स्तर की संस्थाएं जुड़ी हैं। हमारे पैरा लीगल वॉलेंटियर सामाजिक व्यवस्था के सबसे करीब होते हैं। उनकी भूमिकाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन हम सभी एक समान संवैधानिक उद्देश्य से साथ जुड़े होते हैं। वेस्ट जोन में विधिक सेवाओं का विस्तार मध्यप्रदेश के जनजातीय समुदाय, गोवा के मछुआरा समुदाय, गुजरात के माइग्रेंट वर्कर और मुंबई में रहने वाली किसी महिला के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सभी की अलग-अलग समस्याएं हो सकती हैं। हर समस्या का समाधान एक जैसा नहीं होगा, बल्कि उसकी प्रकृति के अनुसार हमें अलग समाधान प्रदान करना होगा। स्थानीय समस्या को उसी सोच के साथ निदान तक लेकर जाना पड़ेगा। उस समस्या को समझने के लिए उनकी भाषा को समझना होगा। पीड़ित के दु:ख को उसी के शब्दों में सुनाना पड़ेगा। इससे समस्या को समझने और उसका निदान करने में बड़ा अंतर देखने को मिलेगा। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार डॉक्टर मरीज से बात करके उसकी परेशानियों को समझता है। उसी प्रकार किसी समुदायों की समस्या को जानने के लिए हमें संवाद का सहारा लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह क्रॉन्फ्रेंस केवल अपने विचारों का आदान-प्रदान करने का मंच नहीं है, बल्कि सभी को न्याय की पहुंच समान बनाने के लिए एक बेहतर व्यवस्था का निर्माण करना है। सशक्त भविष्य के लिए हम आज संवाद, नागरिकों की गरिमा, समानता की आवश्यकता है। पीड़ित को सबसे पहले मानवीय व्यवहार के साथ रिसीव करें। उसकी समस्या सुनें और फिर निदान के लिए प्रयास किया जाए। किसी को समान-सम्मान देने में डिगनिटी शामिल है। गरीब, आर्थिक रूप से पिछड़े, महिलाओं की सहायता करना कोई चैरिटी नहीं है। हम केवल उसके सहायक हैं।
न्याय में दिखे समानता का भाव-जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि समाज के अंतिम छोर के व्यक्ति तक न्याय की पहुंच हो, इसी में समानता का भाव छिपा है। समानता स्वयं से पूछता है कि हममें से कोई पीछे तो नहीं रह गया। हमें प्रगति और अधिकारों के दिलवाने की लड़ाई में देखना होगा कि कहीं कोई पीछे तो नहीं छूट गया। समानता और न्याय की पहुंच हर नागरिक का अधिकार है और यह सुनिश्चित करना भी हम सभी की जिम्मेदारी है। हमारी क्षमत इसमें नहीं कि जो हमारे पास आ गया उसकी सहायता करें, बल्कि असल परीक्षा तो यह है कि जो हमारे पास नहीं आया है, हम उसके पास कैसे पहुंचे। पैरा लीगल वॉलेंटियर्स हमारी लीगल सेना और समाजसेवी की तरह हैं। यही काम महात्मा गांधी ने समाज के लिए किया था। समानता केवल स्कीम लॉन्च करने से नहीं आएगी। संवाद सुनिश्चित करता है कि हर समस्या को सुना जाए। गरिमा सुनिश्चित करती है कि सभी से सम्मानपूर्वक बर्ताव हो। समावेशन सुनिश्चित करता है कि कोई पीछे न छूटे।

