‘मक्का गठबंधन’ की इस्तांबुल में हुई पहली बैठक, पाकिस्तान को बड़ी जिम्मेदारी

'मक्का गठबंधन' की इस्तांबुल में हुई पहली बैठक, पाकिस्तान को बड़ी जिम्मेदारी

Mecca Defense Alliance

Mecca Defense Alliance: दुनिया भर में अपनी चौधराहट दिखाने का आदी रहा अमेरिका, मध्य-पूर्व में अपनी अब तक की भूमिका से पीछे हट रहा है। इस कारण, वहाँ पैदा होने वाले खालीपन को भरने के लिए तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने 7 अगस्त, 2026 को मक्का में अपना जो नया गठबंधन बनाया था, उसकी पहली बैठक सोमवार, 31 अगस्त को तुर्की के सबसे बड़े शहर इस्तांबुल में हुई।

 

तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फि़दान ने इस बैठक में घोषणा की कि तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के “मक्का डिफेंस अलायंस” (MDA) का सचिवालय सऊदी अरब की राजधानी रियाद में बनाया जाएगा और पाकिस्तान का एक प्रतिनिधि उसका पहला महासचिव होगा। हालांकि, 7 अगस्त को मक्का में हुए इन तीनों देशों के शिखर नेताओं के बीच जो समझौता हुआ था, उसकी कोई सटीक जानकारी अभी तक सामने नहीं आई है। ALSO READ: तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने किया त्रिपक्षीय सैन्य समझौता

एक पर हमला, सब पर हमले के समान

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की का कहना है कि उनके गठबंधन में शामिल किसी भी देश पर हमले को वे तीनों देशों पर हमला मानेंगे। यह बात अमेरिका और यूरोप वाले “उत्तर अटलांटिक संधि संगठन” नाटो (NATO) जैसी ही एक शर्त है—हालांकि दोनों ही मामलों में, यानी न तो नाटो संधि में और न ही MDA संधि में, यह अनिवार्य नहीं है कि किसी एक देश पर हमला होते ही, बाक़ी देशों को उस देश के पास तुरंत अपनी सेना भेजना या अपनी सेना को वहाँ तैनात करना होगा।

 

“इस्तांबुल पॉलिटिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट” (IstanPol) में तुर्की की विदेश नीति के विशेषज्ञ रिकार्डो गैस्को का कहना है कि शायद यही एक बात है जो दोनों गठबंधनों में एक समान है। उनकी नज़र में, “मक्का डिफेंस अलायंस” असल में कोई गठबंधन नहीं है, बल्कि “हितों का तालमेल” है। उनका तर्क है कि यह ऐसी कोई चीज़ नहीं है “जो नाटो जैसी हो।” ALSO READ: ट्रंप समेत 13 टॉप लीडर ईरान की HIT लिस्ट में, जानिए कौन-कौन हैं वे नेता

एक नई क्षेत्रीय शक्ति का उदय

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने मिलकर अपना एक त्रिगुट बना तो लिया है, पर तीनों देशों की अपनी सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं अलग-अलग हैं, भले ही तुर्की और सऊदी अरब की एक प्रमुख सोच मिलती-जुलती है: यह कि अमेरिका अब मध्य-पूर्व में स्थिरता लाने वाली शक्ति नहीं रहा।

 

अत: इन तीनों मुस्लिम देशों का उद्देश्य मध्य-पूर्व में एक ऐसा “पावर वैक्यूम” (सत्ता का खालीपन) बनने से रोकना लगता है, जिसमें इसराइल या ईरान जैसी कोई दूसरी शक्ति अपनी जगह बना सके। ईरान के साथ चल रहे टकराव के बीच सऊदी अरब को भी बार-बार ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों का निशाना बनाया गया है। सऊदी में मौजूद अमेरिकी सेना के अड्डे अब सुरक्षा-कवच के बजाय सुरक्षा-संकट अधिक बन गए लगते हैं।

 

तुर्की इस इलाके में —विशेषकर सीरिया में— इसराइल की गतिविधियों को अपने लिए बढ़ते ख़तरे के तौर पर देखता है। वैसे, तुर्की ही नहीं, सारा इस्लामी जगत धार्मिक कट्टरता के चलते इसराइल से इतना जलता-भुनता है, कि उसका अस्तित्व ही मिटा देना चाहता है।

 

यही धार्मिक विद्वेष भारत के प्रति पाकिस्तान की अंधी सोच-समझ पर भी हावी है। कर्ज़ में डूबे और भीतर से खंडित होते पाकिस्तान को लगता है कि सऊदी अरब का साथ मिल जाने पर भारत के मामले में उसे इस अरबी धन्नासेठ का राजनीतिक समर्थन ही नहीं, भरपूर धन-धान्य भी मिल सकता है। ALSO READ: बड़बोले ट्रंप की घटिया बेशर्मी, अंकारा में नहीं था Trump को कोई खतरा

नाटो बनाम मक्का?

तुर्की के विदेश मंत्री फिदान के अनुसार, तुर्की का बहुत पहले से ही नाटो जैसे रक्षा गठबंधन का हिस्सा होना कोई विरोधाभास नहीं है; मक्का समझौते का उद्देश्य “मौजूदा ज़िम्मेदारियों और ढांचों के पूरक” के तौर पर काम करना है।

 

“इस्तांबुल पॉलिटिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट” के रिकार्डो गैस्को ने मीडिया से कहा, “तुर्की के लिए नाटो और मक्का समझौते के अलग-अलग लाभ हैं।” तुर्की की सरकार के लिए—जिसने हाल ही में अपने यहाँ नाटो के शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की थी—नाटो ही यूरो-अटलांटिक क्षेत्र में उसकी अपनी सुरक्षा का आधार है।

 

रिकार्डो गैस्को का यह भी कहना है कि मक्का गठबंधन “फ़ारस की खाड़ी, लाल सागर, हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका या दक्षिण एशिया में हर संकट से निपटने के लिए नहीं बनाया गया है।” “इसलिए, मक्का समझौता तुर्की को क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ सीधे सहयोग के लिए एक लचीला ज़रिया देता है।”

 

ट्रंप मक्का समझौते से खुश हैं यूरोपीय संघ के मुख्यालय ब्रसेल्स में, संघ के एक अधिकारी ने बताया कि तुर्की ने अपने NATO सहयोगियों को मक्का समझौते के बारे में पहले ही जानकारी दे दी थी। सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ यह समझौता दो साल से ज़्यादा समय से तैयार किया जा रहा था। तुर्की के सबसे प्रमुख NATO सहयोगी अमेरिका ने इस सारी प्रक्रिया का सकारात्मक रूप से समर्थन किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने मक्का समझौते को “एक बड़ा, साहसी और महत्वपूर्ण पहला क़दम” बताया है। उन्होंने इस बात पर खुशी जताई है कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने “आख़िरकार” इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।

तुर्की के रक्षा उद्योग के लिए निर्यात बाज़ार

इस नई साझेदारी से तुर्की को एक और लाभ है: उसे एक आकर्षक निर्यात बाज़ार मिल रहा है। तुर्की का रक्षा उद्योग दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले उद्योगों में से एक माना जाता है। सरकारी रक्षा उद्योग एजेंसी (SSB) के अनुसार, तु्र्की के रक्षा उद्योग ने पिछले साल 10.05 अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर मूल्य का सामान निर्यात किया—जो 2024 की तुलना में 48 प्रतिशत ज़्यादा है। तुर्की की “बायकर” (Baykar) कंपनी द्वारा बनाए गए ड्रोन सबसे ज़्यादा बिकने वाले निर्यात उत्पाद हैं।

 

“बायकर” कंपनी के मुख्य तकनीक अधिकारी सेल्चुक बायराक्तार ने, मक्का समझौते के बारे में मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि “खासकर रक्षा उद्योग में हमारे देश की जो वैश्विक महत्वाकांक्षाएँ विकसित हुई हैं, वे नई कूटनीतिक पहलों के लिए रास्ता बना रही हैं।” बायकर कंपनी पहले से ही सऊदी अरब को ड्रोन बेच रही है और वहाँ उनका निर्माण भी कर रही है।

 

बायराक्तार ने बताया, “हमारी कुल कमाई का 90 प्रतिशत हिस्सा निर्यत से आता है। यदि हमने यह टेक्नोलॉजी अपने मित्र और सहयोगी देशों को नहीं दी होती, तो शायद हम इसका दसवां हिस्सा ही कमा पाते।” पाकिस्तान भी पहले से ही बायकर ड्रोन इस्तेमाल कर रहा है और तुर्की की डिज़ाइन के आधार पर युद्धपोत भी बना रहा है।

लक्ष्य : मक्का अलायंस का विस्तार है

मक्का गठबंधन की “रणनीतिक-राजनीतिक और रक्षा समिति” (स्ट्रैटेजिक-पॉलिटिकल एंड डिफेंस कमिटी) की पहली बैठक में, तुर्की के विदेश मंत्री फिदान ने ज़ोर दिया कि यह गठबंधन समय के साथ उसके विस्तार के उद्देश्य से बना है। वह किसी देश के विरुद्ध नहीं है, बल्कि उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हमारा क्षेत्र अपनी समस्याओं की ज़िम्मेदारी खुद संभाले।

 

फिलहाल इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले तीनों देश मिलकर उसके प्रथम “स्थापना चरण” को पूरा करना चाहते हैं। जानकारों का मानना है कि इस नए गठजोड़ के पास मध्यपूर्व की क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को बदलने की क्षमता है—हालांकि ऐसा तुरंत नहीं होगा, क्योंकि नए साझे ढांचे को बनाने में अभी कई साल लग सकते हैं।