
CJI Suryakant: जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों के बावजूद छात्रों पर कार्रवाई करने को लेकर शीर्ष अदालत बेहद सख्त नजर आ रही है। ग्रेटर नोएडा के एक एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा यूनिवर्सिटी के छात्र को 'शांति बंधपत्र' का नोटिस भेजने पर चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने साफ लहजे में पूछा कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा चुका है, तो मजिस्ट्रेट की ऐसी हिम्मत कैसे हुई?
अदालत के स्पष्ट रुख के बाद भी प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा आदेशों की अनदेखी का एक बड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां CJI सूर्यकांत ग्रेटर नोएडा प्रशासन की कार्यशैली पर बुरी तरह भड़क गए। मामला गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी (GBU) के छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी किए गए एक प्रशासनिक नोटिस से जुड़ा है। ALSO READ: CJP प्रोस्टेट पर बोले CJI- युवाओं की बात सुननी चाहिए, हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता
जब यह मामला चीफ जस्टिस की पीठ के समक्ष लाया गया, तो उन्होंने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकता है? हमने पहले ही साफ कर दिया था कि छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में किसी भी छात्र के खिलाफ कोई जबरन या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। देश का कोई भी मजिस्ट्रेट सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।
क्या है पूरा विवाद और क्यों भेजा गया नोटिस?
यह पूरा मामला दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के नेतृत्व में हुए छात्र प्रदर्शन से जुड़ा है। ग्रेटर नोएडा पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर तृतीय कार्यकारी मजिस्ट्रेट कार्यालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत छात्र अक्षत त्रिपाठी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। नोटिस में छात्र से 6 महीने तक शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपए का निजी मुचलका और दो जमानतदार पेश करने को कहा गया था। ALSO READ: NEET प्रदर्शन विवाद : पुलिस लाठीचार्ज वाली याचिका मामले में क्यों भड़के CJI सूर्यकांत?
पुलिस का दावा था कि प्रयागराज निवासी और GBU का छात्र अक्षत छात्रों को उकसाने, सरकार विरोधी और भ्रामक प्रचार फैलाने का काम कर रहा था, जिससे परिसर में तनाव फैल सकता था। छात्र अक्षत त्रिपाठी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन में भाग लिया था और वह किसी तरह का भ्रामक प्रचार नहीं कर रहा था।
स्थानीय प्रशासन बैकफुट पर
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पूर्व में ही छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एफआईआर रद्द कर चुका है और सीजेपी प्रदर्शनों से जुड़े किसी भी छात्र पर दंडात्मक कार्रवाई न करने का अंतरिम आदेश दे चुका है। अदालत का कड़ा रुख देखने और मामला तूल पकड़ने के बाद ग्रेटर नोएडा पुलिस और स्थानीय प्रशासन बैकफुट पर आ गया। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामला संज्ञान में आते ही इस नोटिस को निरस्त कर दिया गया है।


