
वाराणसी के रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में आयोजित ‘संस्कृति संसद-2026’ में देश के 3,000 से अधिक संत-महात्मा और 7,000 युवा जुटे। राम-कृष्ण के अपमान पर संतों का कड़ा रुख— ‘विरोध करने वाले सड़कछाप’।
वाराणसी: प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी के ऐतिहासिक ‘रुद्राक्ष इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर’ में 3 से 5 नवंबर 2026 तक तीन दिवसीय ‘संस्कृति संसद-2026’ का भव्य आयोजन किया गया है। अखिल भारतीय संत समिति और गंगा महासभा के तत्वावधान में हो रहे इस महाकुंभ में देश के 13 अखाड़ों के संत-महात्मा, धर्माचार्य, विद्वान और हजारों की संख्या में राष्ट्रनिष्ठ युवा शामिल हुए हैं।
इस उच्चस्तरीय संसद में सनातन धर्म के ग्रंथों के संरक्षण, उसके वैश्विक विस्तार और वर्तमान चुनौतियों पर गहन मंथन किया गया। संतों ने एक स्वर में चेतावनी दी कि दुनिया में सनातन संस्कृति के बढ़ते प्रभाव से अन्य ताकतों की नींद उड़ी हुई है, इसलिए इसे तोड़ने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं।
1. “जो राम-कृष्ण का अपमान करते हैं, वे सड़कछाप हैं”
कैवल्य अध्यक्ष एवं अनंत श्रीविभूषित निर्वाण पीठाधीश्वर स्वामी विशोकानंद भारती महाराज ने दो टूक शब्दों में कहा कि कभी भारत विश्व गुरु के साथ ‘इंद्र गुरु’ भी था। जो लोग मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम और श्रीकृष्ण का अपमान करते हैं, वे केवल ‘सड़कछाप’ हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “हम राम और कृष्ण के नाम पर पूरी दुनिया में घूमते हैं और इसके लिए महर्षि तुलसीदास को अपना प्रमाण मानते हैं।”
2. ‘Gen-Z कॉन्क्लेव’ बना आकर्षण का केंद्र: युवाओं को जड़ों से जोड़ने पर जोर
इस संस्कृति संसद का सबसे बड़ा और अनूठा आकर्षण ‘Gen-Z कॉन्क्लेव’ रहा, जिसमें लगभग 90% वक्ता युवा थे। देश की युवा पीढ़ी को सीधे संत-महात्माओं के सामने सवाल पूछने और अपनी बात रखने का अवसर मिला।
स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती (महामंत्री, अखिल भारतीय संत समिति) ने कहा कि देश में फैलाई जा रही अफवाहों से निपटने और सनातन का मज़ाक उड़ाने वाली ताकतों को करारा जवाब देने के लिए विशेष रणनीति बनाई गई है।
गुजरात के विधायक हार्दिक पटेल ने चिंता जताई कि विदेशी ताकतें नेपाल और बांग्लादेश जैसी परिस्थितियां भारत में भी पैदा करने का प्रयास कर रही हैं। युवाओं को भ्रमित कर आंदोलन के नाम पर गलत रास्ते पर ले जाया जा रहा है।
3. काशी सुमेरु पीठाधीश्वर की प्रमुख मांगें और चेतावनियां
काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी नरेंद्रानंद महाराज ने स्पष्ट रूप से कहा कि पश्चिमी दबाव और षड्यंत्रों के प्रभाव में आकर हमारे मूल ग्रंथों में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार के सामने निम्नलिखित मांगें रखीं:
सनातन गुरुकुलों को मिले सरकारी अनुदान: इसके लिए विशेष बजट और कोष का प्रावधान होना चाहिए।
मठ-मंदिरों की मुक्ति: मंदिरों का नियंत्रण सरकारी तंत्र से पूरी तरह मुक्त कर समाज के हाथों में सौंपा जाना चाहिए।
पांडुलिपियों की वापसी: चीन, इंग्लैंड और जापान जैसे देशों में मौजूद हमारी प्राचीन पांडुलिपियों को वापस लाकर ज्ञान परंपरा को संरक्षित किया जाए।
4. अन्य प्रमुख संतों और विद्वानों के विचार
गोवा के पद्मश्री सद्गुरु ब्रह्मेशानंदाचार्य महाराज: भारत ऋषियों और संतों की भूमि है। जब तक ये संस्थाएं मजबूत रहेंगी, देश सुरक्षित रहेगा। उन्होंने गोवा को ‘दक्षिण काशी’ के रूप में मान्यता देने की मांग की।
जगद्गुरु डॉ. चंद्रशेखर शिवाचार्य महास्वामी: हिंदू समाज के करोड़ों लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।
प्रो. रामचंद्र पांडेय (श्रीकाशी विद्वत् परिषद्): प्राचीन हस्तलेखों और पांडुलिपियों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है, तभी भारतीय ज्ञान परंपरा का सही मूल्यांकन संभव है।
ब्रह्मचारी गिरीश (महर्षि वैदिक शिक्षा संस्थान): समाज में बदलाव टकराव से नहीं, बल्कि ज्ञान, अभ्यास और चेतना से आना चाहिए। यह ‘संस्कृति संसद’ परंपरा और आधुनिकता के बीच एक मजबूत सेतु का काम कर रही है। संतों का यह संदेश साफ है कि वर्तमान समय में युवाओं को वैचारिक रूप से मजबूत बनाकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना ही राष्ट्र की सबसे बड़ी सुरक्षा है। कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद विद्यासागर सोनकर, सुनील देवधर, प्रो. नागेंद्र पांडेय समेत देश भर के कई प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।


