
Jharkhand Student Protest: झारखंड की राजनीति और युवा आंदोलन के इतिहास में 17 अगस्त का दिन एक बड़े मोड़ के रूप में दर्ज हो गया। पिछले कई हफ्तों से अपनी मांगों को लेकर भूख हड़ताल और सड़कों पर आंदोलन कर रहे युवाओं की आखिरकार बड़ी जीत हुई। झारखंड कैबिनेट ने एक बड़ा फैसला लेते हुए JSSC CGL (झारखंड कर्मचारी चयन आयोग – कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल) की परीक्षा और नतीजों को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। इसके साथ ही धांधली के घेरे में आई आउटसोर्सिंग एजेंसी (TDPL) द्वारा 2014 से आयोजित सभी परीक्षाओं को रद्द करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है।
फैसले की खबर आते ही रांची की सड़कों पर आंदोलनकारी छात्रों का जश्न फूट पड़ा। तिरंगा लहराते और ढोल-नगाड़ों की थाप पर थिरकते युवाओं के बीच सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात यह थी कि आंदोलन के मंच से “राहुल गांधी जिंदाबाद” और “छात्र एकता जिंदाबाद” के गगनभेदी नारे लग रहे थे। ALSO READ: हेमंत सोरेन के फैसले के बाद झारखंड में छात्र आंदोलन खत्म, लेकिन CBI जांच की मांग पर अड़े छात्र
आखिर इस पूरे घटनाक्रम के पीछे का राजनीतिक ताना-बाना क्या है? कैसे लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी इस पूरी लड़ाई के केंद्र में आ गए और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इस बड़े मुद्दे पर क्यों मूकदर्शक बनकर रह गई?
1. राहुल गांधी का 'मास्टरस्ट्रोक' और हेमंत सोरेन सरकार का फैसला
झारखंड में JMM-कांग्रेस गठबंधन की सरकार है। आंदोलन कर रहे युवाओं ने कई बार आरोप लगाया था कि राज्य सरकार उनकी आवाज नहीं सुन रही है। इस गतिरोध के बीच राहुल गांधी ने 14 अगस्त को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को एक व्यक्तिगत पत्र लिखा।
17 अगस्त को कांग्रेस ने राहुल गांधी की इस चिट्ठी को सार्वजनिक किया। पत्र में राहुल गांधी ने साफ शब्दों में लिखा था कि “देश का शिक्षा तंत्र युवाओं के शोषण का जरिया बन गया है। झारखंड के छात्रों का आंदोलन शांतिपूर्ण है और उनकी मांगें पूरी तरह से जायज हैं। मुख्यमंत्री को खुद छात्रों से मिलकर उनकी समस्याएं सुननी चाहिए।” ALSO READ: झारखंड सरकार ने छात्रों की बात मानी, JSSC-CGL परीक्षा रद्द, 2014 से हुई सभी गड़बड़ियों की होगी जांच
राहुल गांधी के इस सार्वजनिक रुख के बाद गठबंधन सरकार पर नैतिक और राजनीतिक दबाव अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया। इसी दबाव का परिणाम था कि 17 अगस्त की शाम मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आपात कैबिनेट बैठक बुलाई और JSSC CGL परीक्षा समेत TDPL से जुड़ी सभी गतिविधियों को रद्द करने का ऐलान कर दिया।
यही वजह रही कि जीत के बाद छात्रों ने खुलकर माना कि जब राज्य सरकार सुन नहीं रही थी, तब राहुल गांधी के हस्तक्षेप और समर्थन ने उनकी लड़ाई को राष्ट्रीय स्तर पर ताकत दी।
2. छात्रों के आंदोलन पर बीजेपी क्यों रह गई पीछे?
आमतौर पर जब भी कोई छात्र या किसान आंदोलन होता है, तो मुख्य विपक्षी दल उसका नेतृत्व संभालकर सरकार को घेरता है। लेकिन झारखंड के इस मामले में बीजेपी पूरी तरह से पिछड़ती हुई नजर आई।
- नेताओं के खोखले दावे : बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया था कि यदि 13 अगस्त तक छात्रों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो वे खुद अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठेंगे। हालांकि, 13, 14 और 15 अगस्त बीत जाने के बाद भी वे आंदोलन स्थल पर नजर नहीं आए, जिससे छात्रों में निराशा और अविश्वास पैदा हुआ।
- सहानुभूति की कमी : बीजेपी के केंद्रीय और प्रांतीय नेताओं ने सरकार पर आरोप-प्रत्यारोप तो लगाए, लेकिन छात्रों के साथ धरातल पर ऐसा कोई भावनात्मक या भरोसेमंद जुड़ाव नहीं बना सके जो युवाओं को आकर्षित कर पाता।
- विपक्ष की भूमिका में नाकामी : जिस मुद्दे पर बीजेपी हेमंत सरकार को बड़े राजनीतिक संकट में धकेल सकती थी, उस मुद्दे की कमान राहुल गांधी और कांग्रेस के कूटनीतिक दबाव ने अपने हाथ में ले ली।
3. 'कहीं खुशी, कहीं गम': परीक्षा रद्द होने का दर्दनाक पहलू
JSSC CGL परीक्षा रद्द होने का फैसला केवल एक जश्न की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय परीक्षा प्रणाली की उस कड़वी सच्चाई को भी उजागर करता है जहां “गेहूं के साथ घुन भी पिसता है।”
जिन युवाओं ने सालों की मेहनत, माता-पिता की गाढ़ी कमाई और दिन-रात एक करके ईमानदारी से परीक्षा पास की थी, वे अब सड़कों पर उतरकर रो रहे हैं। उनका सवाल वाजिब है—”अगर 100 में से 20 लोगों ने बेईमानी की है, तो 80 ईमानदार छात्रों का भविष्य क्यों बर्बाद किया जा रहा है? दोबारा परीक्षा देने पर क्या गारंटी है कि वे फिर से पास हो जाएंगे?”
4. आगे की राह और सीबीआई जांच की मांग
हालांकि, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में 'परीक्षा सुधार समिति' का गठन किया है, लेकिन छात्रों का एक बड़ा गुट अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। छात्र नेताओं का कहना है कि परीक्षा रद्द होना एक पड़ाव है, लेकिन जब तक पूरे मामले की जांच सीबीआई (CBI) को नहीं सौंपी जाती, तब तक पेपर लीक कराने वाले भू-माफिया और भ्रष्ट तंत्र का पर्दाफाश नहीं हो पाएगा।
झारखंड का यह घटनाक्रम देश की सभी राज्य सरकारों के लिए एक चेतावनी है। पेपर लीक और प्रशासनिक लापरवाही सिर्फ एक परीक्षा का रद्द होना भर नहीं है, बल्कि यह लाखों युवाओं के सपनों और मानसिक स्थिति के साथ खिलवाड़ है। राजनीतिक दृष्टिकोण से, राहुल गांधी ने समय पर सही हस्तक्षेप करके छात्रों के बीच अपनी साख मजबूत की, जबकि बीजेपी इस बड़े मौके को भुनाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई।


