दम के साथ सड़क पर उतरी भाजपा

सामान्य ढंग से प्रतिक्रिया देने की बजाय भाजपा पलटवार करने के रास्ते पर चल रही है और इसकी कमान संभाली है खुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने। भाजपा पूरे देश में ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा कर रही है। तेलंगाना में अमित शाह खुद तिरंगा झंडा लेकर सड़क पर उतरे और पदयात्रा का नेतृत्व किया।

भारतीय जनता पार्टी दम दिखा रही है। कुछ लोगों को ऐसा लग रहा था कि भाजपा सत्ता में है और वह सड़क पर संघर्ष करना भूल गई है। वे यह भी संदेश बना रहे थे कि सड़क पर तो कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों का नियंत्रण है। जून और जुलाई में जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद यह संदेश ज्यादा व्यापक हो गया था। कांग्रेस और पारंपरिक विपक्षी पार्टियों के साथ साथ सिविल सोसायटी भी सड़क पर दिख रही थी। उसकी प्रतिनिधि के तौर पर कॉकरोच जनता पार्टी प्रदर्शन कर रही थी। कहा जा रहा था कि युवा केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी से नाराज हैं। इससे एक विमर्श राष्ट्रीय स्तर पर बन रहा था। दिख भी रहा था कि भाजपा बैकफुट पर आई है, डिफेंसिव है और विपक्ष की ओर से तय किए गए नैरेटिव पर प्रतिक्रिया दे रही है।

अब स्थिति पूरी तरह से बदल गई है। अब भाजपा प्रतिक्रिया नहीं दे रही है, बल्कि संसद के साथ साथ सड़क पर भी नियंत्रण हासिल कर रही है। इसमें कोई दो राय ही नहीं है कि चुनावी राजनीति में भाजपा बाकी पार्टियों से बहुत आगे है। लेकिन अब वह दिखा रही है कि प्रदर्शन की राजनीति में भी वह बाकियों से आगे है। असल में इलेक्टोरल पॉलिटिक्स बनाम प्रोटेस्ट पॉलिटिक्स का जो नैरेटिव बना था उसमें भाजपा ने अपनी पोजिशन रिक्लेम की है। अब वह विपक्ष को उसके अंदाज में जवाब दे रही है। कांग्रेस और कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन और कांग्रेस की रैली के बाद भाजपा अब जो कर रही है वह भाजपा का रिएक्शन नहीं है, बल्कि रिस्पांस है। इन दोनों में बहुत बारीक फर्क है। भाजपा पहले रिएक्ट कर रही थी, अब रिस्पांस दे रही है और भाजपा का रिस्पांस ऐसा है कि अब कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां बैकफुट पर हैं।

सामान्य ढंग से प्रतिक्रिया देने की बजाय भाजपा पलटवार करने के रास्ते पर चल रही है और इसकी कमान संभाली है खुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने। भाजपा पूरे देश में ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा कर रही है। तेलंगाना में अमित शाह खुद तिरंगा झंडा लेकर सड़क पर उतरे और पदयात्रा का नेतृत्व किया। उन्होंने इसके जरिए दो मैसेज दिए। पहला मैसेज बहुत बारीक है। उन्होंने कांग्रेस को वहां टारगेट किया, जहां उसे सबसे ज्यादा तकलीफ हो। साथ ही उन्होंने यह मैसेज दिया कि दक्षिण भारत में कर्नाटक के बाद तेलंगाना भाजपा की उम्मीदों का प्रदेश है। दूसरा मैसेज बहुत स्पष्ट था। अमित शाह ने कहा कि सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाने के लिए तैयार है। वहां उन्होंने राहुल गांधी को बहस करने की चुनौती दी। इसके बाद भी जब राहुल गांधी संसद से बाहर ही बहस के लिए अड़े रहे तो अमित शाह ने हरियाणा की पदयात्रा में कहा कि भाजपा का कोई भी सामान्य कार्यकर्ता किसी भी चौराहे पर राहुल गांधी से बहस करने को तैयार है। इस तरह भाजपा ने संसद में और संसद के बाहर किसी भी सार्वजनिक जगह पर बहस का दांव चल दिया है।

भाजपा ने ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा को आम जनता से भी जोड़ा। भाजपा ने यह मैसेज बनवाया कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां अराजकता के जरिए सत्ता परिवर्तन की बात कर रही हैं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है क्योंकि भारत के नागरिकों के मन में और भारतीय समाज में भी लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरीं हैं। कोई भी सामान्य मतदाता यह कतई नहीं चाहेगा कि अराजकता के जरिए या अलोकतांत्रिक तरीके से सत्ता परिवर्तन की बात हो। रही सही कसर कांग्रेस की सहयोगी पार्टियों और प्रदर्शन में शामिल लोगों ने पूरी कर दी। पहले सीपीआई एमएल की छात्र नेता नेहा बोरा ने कहा कि वे बांग्लादेश के प्रदर्शन से प्रेरणा लेती हैं। इसके बाद प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ की बात कही। अब झारखंड के कांग्रेस विधायक और हेमंत सोरेन सरकार में मंत्री इरफान अंसारी ने कहा है कि दिल्ली में 40 लाख छात्रों और युवाओं को राहुल गांधी ने रोक रखा है, अन्यथा वे सड़क पर उतर जाएंगे। उन्होंने यह भी दावा किया कि भारत के हालात बांग्लादेश और नेपाल से भी बदतर होंगे।

सवाल है कि क्या भारत के आम लोग इस बात को स्वीकार करेंगे कि भारत के हालात नेपाल और बांग्लादेश से बदतर हो? कांग्रेस को इस पर जवाब देना होगा। यह भी बताना होगा कि क्या कांग्रेस और राहुल गांधी या पारंपरिक विपक्ष की दूसरी पार्टियां इस किस्म की बातों से सहमत हैं? भाजपा इन्हीं बातों को लेकर जनता के बीच जा रही है। जब वह अराजकता हटाओ की बात करती है तो उसका उद्देश्य यह बताना होता है कि दिल्ली में कैसे नवरात्रों, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े हिंदू त्योहारों के बीच कांग्रेस और उसके प्रॉक्सी संगठनों ने दिल्ली को बंधक बना लिया। कैसे त्योहारों के बीच प्रदर्शन किए गए और दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली की गई, जिससे करोड़ों, अरबों का व्यापार प्रभावित हुआ। दूसरी बात यह है कि अराजकता हटाओ की बात करके भाजपा भारत को बांग्लादेश और नेपाल जैसा बनाने की संभावनाओं के प्रति लोगों को आगाह कर रही है।

कह सकते हैं कि कांग्रेस, कॉकरोच जनता पार्टी और अन्य विपक्षी पार्टियों ने बैठे बिठाए भाजपा को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा थमा दिया है। ध्यान रहे इस समय नरेंद्र मोदी की सरकार तीसरे कार्यकाल के मिडटर्म में है। ढाई साल बीत गए हैं और ढाई साल के बाद लोकसभा का चुनाव है, जिसमें मोदी के नेतृत्व में भाजपा लगातार चौथा चुनाव जीतने के लिए उतरेगी। उससे पहले मतदाताओं के मन में सरकार के कामकाज को लेकर कुछ सवाल होंगे तो पार्टी कार्यकर्ता भी सत्ता के मद में होंगे। अगर जनता के अंदर कुछ थकान होगी तो कार्यकर्ताओं में लापरवाही होगी। तभी भाजपा ने इस मौके का लाभ उठा पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरने और उन्हें सड़क पर उतार कर पार्टी की सांगठनिक क्षमता की परख करने का फैसला किया। इसका पहला लाभ तो यह हुआ कि भाजपा ने प्रभावी तरीके से कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों के प्रोपेगेंडे का जवाब दिया और दूसरा लाभ यह हुआ कि भाजपा के कैडर में नया जोश आ गया।

यह काम उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुआ है। तीन महीने के बाद उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। भाजपा ने इन सभी राज्यों में अपने कैडर को सड़क पर उतार दिया है। इन पांच में से चार राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भाजपा की ही सरकार है लेकिन वहां भी अब विमर्श बदल गया है। चुनाव से पहले वहां भी अराजकता हटाओ का मुद्दा जोर पकड़ रहा है। यह नैरेटिव जोर पकड़ रहा है कि विपक्षी पार्टियां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के मसले पर संसद में या संसद के बाहर बहस से भाग रही हैं। भाजपा बता रही है कि इसका कारण यह है कि कांग्रेस को जेनुइन मतदाताओं की चिंता नहीं है, उसे घुसपैठियों के वोट की चिंता है, जिनकी बोगस वोटिंग से अब तक भाजपा विरोधी पार्टियों की राजनीति चलती थी। भाजपा का दूसरा नैरेटिव यह है कि मतदाता सूची के सफाई का विरोध कांग्रेस इसलिए कर रही है क्योंकि उसे चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि अराजकता की राजनीति पसंद है। भाजपा का कैडर आम लोगों तक यह बात भी पहुंचा रहा है कि देश के दुश्मनों की मदद से विपक्षी पार्टियां देश में बांग्लादेश, नेपाल जैसे हालात बनाने का प्रयास कर रही हैं।

कह सकते हैं कि इस नैरेटिव से और ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्राओं से भाजपा को दो स्पष्ट लाभ हैं। पहला तो राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की राजनीति पर उसका एकाधिकार और मजबूत हो रहा है और दूसरा उसकी राज्य सरकारों के कामकाज को लेकर अगर थोड़ी बहुत नाराजगी है भी तो वह चुनावी विमर्श नहीं बन पा रहा है। एक तरह से भाजपा ने कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को अपने मजबूत पिच पर खेलने के लिए मजबूर कर दिया है। ऐसे में परिणाम क्या होता है, यह सब जानते हैं।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)