अंबानी-अडानी मोदी से पहले भी सेठ थे!

यह फालतू और गलत बात है कि गौतम अडानी को नरेंद्र मोदी ने बनाया, इसलिए वे उन्हीं के साथ जिएँगे-मरेंगे। पहली बात, अक्टूबर 2001 में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही गौतम अडानी हजारों करोड़ रुपये के कारोबार की हैसियत बना चुके थे। तब एक हजार करोड़ रुपये का टर्नओवर मामूली नहीं था। सन् 1998 में मुंद्रा बंदरगाह का व्यावसायिक संचालन शुरू हो चुका था। कांग्रेस के अहमद पटेल से, चिमनभाई पटेल और बाद में केशुभाई पटेल की सरकारों के समय अडानी पर शासन की बहुत कृफा रही।

मतलब अडानी नरेंद्र मोदी की खोज नहीं थे। वे उस गुजरात की उपज थे जिसमें लाइसेंस, कोटा, परमिट, बन्दरगाह, जमीन और सत्ता से सम्पर्क सब में चिमनभाई पटेल, केशुभाई पटेल व अहमद पटेल उनके खास थे।

उन दिनों गुजरात से हटाकर दिल्ली भेजे गए नरेंद्र मोदी का मिजाज प्रचारक का था। वे तब अडानी, नाथवानी और भोजवानी जैसे कारोबारियों को चिमनभाई और फिर केशुभाई काल का खास समझते थे। मोदी अपने कार्यकर्ताओं को उनसे सावधान रहने के लिए कहते थे।

पर जब  समय ने पलटा खाया। मोदी मुख्यमंत्री बने तो सेठों ने लपक कर नरेंद्र मोदी को पकड लिया।  जनवरी 2001 में गुजरात में भूकम्प आया था। उन्होंने रिलायंस के परिमल नाथवानी को फोन किया और कच्छ जाने के लिए कम्पनी का विमान माँगा। नाथवानी वही व्यक्ति थे जिन्होंने धीरूभाई अंबानी के लिए गुजरात में जामनगर रिफाइनरी स्थापित कराने से लेकर प्रदेश सरकार से हर तरह का काम कराया था। सो अंबानी का विमान मिला। सम्बन्ध बना। गांधीनगर में मुख्यमंत्री निवास नाथवानी की अड्डेबाजी का ठिकाना बना।

गौतम अडानी का मोदी पर निर्णायक दाँव गुजरात दंगों के बाद चला। तब सीआईआई के मंच पर देश के कुछ बड़े उद्योगपतियों ने मुख्यमंत्री मोदी की आलोचना की थी। तब अडानी ने कुछ गुजराती उद्योगपतियों को इकट्ठा किया। मोदी की तरफदारी का झंडा उठाया। “आपणुं गुजरात, आगवुं गुजरात” के मोदी नारे के सेनानी बनकर अडानी ने मोदी की तकदीर की सीढ़ी को अपनी तकदीर से जोड़ लिया।

इस नाते मेरा अनुमान है कि अमित शाह और गौतम अडानी के संबंध मोदी से पुराने रहे होंगे। इसलिए कि 1980 के दशक में युवा अमित शाह अपने परिवार के पीवीसी पाइप बनाने के कारोबार में थे जबकि अडानी प्लास्टिक दानों के आयात और बिक्री के धंधे में थे।

बहरहाल, मैं फिर भटका हूं। कुल मिलाकर सत्य इतना है कि मुकेश अंबानी हों, उनकी शतरंज के कर्ताधर्ता परिमल नाथवानी हों या गौतम अडानी—इन घरानों ने कांग्रेस और भाजपा, दोनों के मुख्यमंत्रियों-प्रधानमंत्रियों के साथ समय को भुनाया है। जिसकी सत्ता उसकी स्वामीभक्ति। अगली सत्ता आते दिखी तो अगली निष्ठा की तैयारी भी।

इसलिए इन कॉरपोरेट घरानों की न साँसें मोदी-शाह के साथ बँधी हैं और न वे इस गलतफहमी में होंगे कि मोदी के बाद शाह आएँगे तो उनका भविष्य अपने आप सुरक्षित रहेगा। सेठ यह भी जानता है कि राजा का सेवक कभी मालिक नहीं होता।  तब भला अंबानी-अडानी विपक्ष के सम्भावित घोड़ों पर दाँव लगाना क्यों शुरू नहीं करेंगे? बदलती हवा में अपनी बिसात क्यों नहीं बिछाएँगे?

वे मोदी-शाह के प्यादे नहीं हैं। वे हर राजा के समय के सेठ हैं। राजा का समय समाप्त होता है। सेठ अगले राजा की प्रतीक्षा पहले से शुरू कर देता है।