अखिलेश, तेजस्वी या हेमंत—2029 का चंद्रबाबू नायडू कौन?

कई कथित जानकार इस ख्याल में हैं कि राहुल गांधी कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। यदि ऐसा है तो हेमंत सोरेन, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव भला नाथवानी-अडानी की घास क्यों न खाएँ? सो इनके बूते उत्तर प्रदेश में योगी की जगह अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने का करिश्मा भी संभव है? चुनाव में भारी चंदा मिल सकता है? कर्नाटक में अडानी मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार को इतनी कारोबारी ताकत और राजनीतिक हैसियत दिला सकते हैं कि कांग्रेस हाईकमान कभी उन्हें हटाना भी चाहे तो हटा न पाए? या परिमल नाथवानी ने लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव को भरोसा दिया होगा कि झारखंड में उन्हे सांसद बनाने के लिए वोट देंगे तो तो मौका आने पर वे बदले में बिहार में लालू परिवार की सत्ता लौटाने में मदद करेंगे!

जान ले गुजराती कारोबारी की कोई चाल धंधे के बिना नहीं होती। वह राजनीति से पहले धंधे, सौदे और खरीद-फरोख्त की रूपरेखा बनाता है। उसकी बिसात बड़ी होती है। प्यादों को भी छोटी-मोटी थैलियों से नहीं साधा जाता। इसलिए बात केवल राज्यसभा की एक सीट की नहीं है। इंदिरा गांधी की आकस्मिक मृत्यु के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। तब वे अंबानी और क्रोनी पूँजीपतियों को पसन्द नहीं करते थे। “दलाल हटाओ, देश बचाओ” जैसे जुमलों में थे। पर धीरूभाई ने ऐसे ही एंपायर नहीं बनाया। वे राजीव गांधी से मिले तो उनकी एप्रोच केवल चाँदी की जूती पहनाने वाली नहीं थी बल्कि अंदाज सीधा था—यह सब इंदिराजी की कृपा है। बताइए, मैं क्या करूँ? सब तो आपका है!

दिल्ली में तब धीरूभाई के कर्ताधर्ता बालू थे। मेरा मित्र टोनी यूएसआईएस की नौकरी छोड़कर उनका शागिर्द हुआ ही था। उस समय दिल्ली में न राजीव शुक्ला का मतलब था, न नाथवानी का। धीरूभाई के ही धंधे का एक और शातिर प्यादा था—देसाई। संसद भवन और सांसदों पर उसकी पकड़ देखकर मैं हैरान होता था। मजाल कि रिलायंस को लेकर संसद में सवाल उठे और उसके लोगों को पहले खबर न हो! बहस होने से पहले ही हर तरह का हिसाब तैयार रहता था।

फिलहाल इतना जान लें कि मुकेश अंबानी और गौतम अडानी दोनों अपनी-अपनी नई शतरंज सजा रहे हैं। उस बिसात पर मोदी-शाह हमेशा किंग और वजीर नहीं रहेंगे। विपक्ष की सम्भावनाएँ हैं। सो बतौर पूँजी ढाई घर चलने वाली चाल के लिए अखिलेश, तेजस्वी, हेमंत और डी. के. शिवकुमार जैसे घोड़े भी हैं।

मामूली बात नहीं है कि मुकेश अंबानी अब ट्रंप के दरबार तक पहुँच रखते हैं। रिलायंस का संस्थागत आधार मोदी युग से बहुत पुराना और कहीं अधिक विविध है। स्वयं अडानी एंटरप्राइजेज अपने कारोबारी मॉडल को देश के लिए “अत्यावश्यक विशाल आधारभूत ढाँचा” और “भारत के विकास के अगले चरण को शक्ति देने वाला” बताती है।

मतलब दोनों घराने यह निश्चित माने हुए होंगे कि मोदी जैसे कई आएँगे-जाएँगे, लेकिन उनके कारोबारी साम्राज्य को पीढ़ियों तक रहना है। उनके पास एक चुनाव का नहीं, पीढ़ियों का रोडमैप होगा। सो जब तक मौजूदा सत्ता है, उसे दुहो। अंधेरा बनने लगे, नए घोड़ों की लगाम पकड़ो। कसौटी है कि जो भी आए लगाम पकड घुडसवारी शुरू हो जाए!