
राहुल गांधी कह रहे हैं कि बहस कर लो। अमित शाह कह रहे हैं कि बहस कर लो। नितिन नबीन कह रहे हैं कि बहस कर लो। फिर समस्या क्या है? बहस क्यों नहीं हो रही है? असल में राहुल गांधी की चुनौती के बाद बहस का विषय ही बदल गया है। कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां आंदोलन तो मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआऱ के खिलाफ कर रही थीं और उनका पहला लक्ष्य मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटवाना था। लेकिन उन्होंने बहस की मांग कर दी है देशद्रोह और विदेशी ताकतों से मिलीभगत के मामले पर। जब से राहुल गांधी ने यह मांग की है तब से उनके ऊपर विदेशी ताकतों से मिले होने के आरोपों में थोड़ी कमी आई है। भाजपा के नेता उनके ऊपर यह आरोप कम लगा रहे हैं। भाजपा की ओर से एसआईआर पर बहस करने की चुनौती दी जा रही है।
तभी बहस पर सहमति इसलिए नहीं बन रही है कि राहुल गांधी अलग विषय पर बहस चाहते हैं और भाजपा अलग विषय पर। सवाल है कि दोनों विषयों पर बहस क्यों नहीं हो सकती है? राहुल क्यों नहीं एसआईआर पर बहस के लिए तैयार हो जाते हैं? अगर उनको पता है कि एसआईआर के जरिए वोट चोरी हो रही है और उसी के सहारे भाजपा जीत रही है, उनके पास कथित तौर पर इसके सबूत भी हैं तो वे इस मुद्दे पर बहस क्यों नहीं तय कर लेते हैं? अमित शाह ने कहा कि सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाने के लिए तैयार है। उसमें एसआईआऱ के हर पहलू पर बहस हो जाए। इस मुद्दे पर निश्चित रूप से बहस होनी चाहिए लेकिन उसकी तरीका भाषण देने वाला नहीं, बल्कि बहस वाला होना चाहिए। सरकार और विपक्ष की ओर से एक एक वक्ता तय हों और सवाल जवाब की शक्ल में बहस हो। यह नहीं कि एक पक्ष पहले भाषण करे और दूसरा पक्ष बाद में भाषण करके आरोप लगाए। अगर पुराने गड़े मुर्दे उखाड़ कर आरोप लगाने की बजाय एसआईआर के हर पहलू पर वस्तुनिष्ठ बहस होती है तो उसका स्वागत होना चाहिए।
इसी तरह सरकार भी अपने आरोपों पर बहस के लिए तैयार हो। राहुल गांधी के देश विरोधी ताकतों से मिले होने का आरोप पिछले कई साल से लग रहा है। इस बार तो सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाए हैं। उन्होंने एकता परेड के दौरान 31 अक्टूबर को कहा कि विदेश में किसकी गुप्त मुलाकातें होती हैं और देश के दुश्मनों का समर्थन किसको प्राप्त है। उनका सीधा निशाना राहुल गांधी पर था। अब राहुल इस विषय पर बहस चाहते हैं। वे कह रहे हैं कि सरकार सबूत पेश करे कि वे देश के दुश्मनों से मिले हैं। सरकार को यह चुनौती स्वीकार करनी चाहिए और सबूत पेश करके हमेशा के लिए विवाद समाप्त करना चाहिए। सबूत हैं तो राहुल के ऊपर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि प्रधानमंत्री के आरोप लगाने के बाद जैसे ही राहुल गांधी आक्रामक हुए वैसे ही भाजपा बैकफुट पर आ गई। भाजपा का भी एक भी नेता नहीं कह रहा है कि ठीक है राहुल के देश के दुश्मनों से मिले होने पर बहस कर लेते हैं। इसमें क्या समस्या है? प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया है तो जाहिर है उन्होंने ऐसे ही आरोप नहीं लगाया होगा। उनके पास सारी एजेंसियां हैं और सबूत होंगे तभी कही होगी। फिर उन सबूतों को संसद में रख कर राहुल को लाजवाब कर देने में क्या समस्या है? ध्यान रहे अगर किसी के खिलाफ देशद्रोह के सबूत हैं और उन पर कार्रवाई नहीं हो रही है तो यह भी देशद्रोह ही है।

