बालाघाट के नक्सल मुक्त बिरसा ब्लॉक में पहली बार पहुंचे डॉक्टर, 125 बच्चों की बचाई जान

बालाघाट के नक्सल मुक्त बिरसा ब्लॉक में पहली बार पहुंचे डॉक्टर, 125 बच्चों की बचाई जान

नक्सलवाद का दंश क्या होता है और कैसे आज की पीढ़ी इसका खामियाजा भुगत रही है, इसकी ताजाी बानगी है मध्यप्रदेश का बालाघाट जिला। मध्यप्रदेश में नक्सलवाद के चेहरे के तौर पर पहचाने जाने वाला बालाघाट जिला जो स्वास्थ्य सेवाओं से 40 साल से अधिक समय तक अछूता था वहां पर कई आदिवासी गांव अब मुख्यधार से जुड़ रहे है। पिछले दिनों बालाघाट के नक्सली मुक्त हुए ग्रामीण क्षेत्रों में पहली बार डॉक्टर पहुंचे और जानलेवा बीमारी से पीड़ित 125 से ज्यादा बच्चों की जान बचाई। यह बेहद चुनौती पूर्ण स्थित है क्योंकि नक्सलवादियों ने आदिवासियों का इस प्रकार से ब्रेनवॉश कर रखा है कि, वह डॉक्टर को देखते ही भाग जाते हैं इलाज करवाने को तैयार नहीं है। पहली बार बालाघाट के क्षेत्र का यह चित्र सामने आ रहा है, जब सरकारी सुविधाएं सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच पा रही है। 

 

नक्सलियों का गढ़ था बिरसा ब्लॉक- मामला इसी साल नक्सली मुक्त हुए बालाघाट के बिरसा विकास खंड अंतर्गत गांवों जैसे बोंदारी, अडोरी, कुंडेकसा, कोरका, मछुरदा (मच्छुरदा), मातला, गठिया आदि का है। 1986 से यहां बड़े पैमाने पर हथियारबंद नक्सली गतिविधि शुरू हो गई थी। 1990 में इसी बिरसा थाने में पहला मामला दर्ज हुआ था। यहां नक्सलवाद की जड़ इतनी मजबूत थी, कि 1991 में बारूदी सुरंग में विस्फोट करके 9 पुलिस जवानों की सामूहिक हत्या कर दी गई थी।

फिर 1994 में 16 जवान शहीद हुए और 15-16 दिसंबर 1999 की रात तो आपको याद ही होगी, जब कांग्रेस पार्टी की सरकार के परिवहन मंत्री लिखीराम कावरे को उनके घर से बाहर निकालकर सरेआम मार डाला गया था। इसके बाद भी बालाघाट को नक्सली मुक्त नहीं करवाया गया था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के विशेष अभियान के कारण 2025 में बालाघाट नक्सली मुक्त हुआ। आज भी इस इलाके में कई हथियार और बारूद मिल रहे हैं। नक्सलवादियों ने इस क्षेत्र में कभी भी सरकारी सुविधाओं को पहुंचने ही नहीं दिया। उन्होंने आदिवासियों का इस प्रकार से ब्रेनवाश किया कि वह यूनिफॉर्म को देखते ही डर जाते हैं, फिर चाहे वह यूनिफॉर्म किसी डॉक्टर की हो या डाकिया की। 

 

नक्सलियों के खौफ से स्वास्थ्य सेवाओं से दूर थे आदिवासी-ताजा मामला नक्सलवादियों के केंद्र रहे बिरसा ब्लॉक का ही है। स्वास्थ्य विभाग की टीम यहां नियमित रूप से जा रही है, लोगों से संपर्क और संबंध बनाने का प्रयास कर रही है। उनको बताया जा रहा है कि बीमार होने पर, अस्पताल आना चाहिए। वहां नहीं जाना चाहिए जहां नक्सलवादियों ने बताया था। इस इलाके में हथियारबंदी नक्सलवाद खत्म हो गया है लेकिन नक्सलवादियों द्वारा 40 साल में किया गया ब्रेनवाश का कुचक्र, सिर्फ एक साल में नहीं टूट सकता। फिर भी बालाघाट के प्रशासन को बड़ी सफलताएं मिली है। 

 

नक्सल प्रभावित इस इलाके में हर साल हजारों लोग अज्ञात बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं। वह कभी अस्पताल ही नहीं आते। पहली बार इस इलाके का मेडिकल रिकार्ड तैयार किया जा रहा है। इस साल 2026 के जून महीने में रिकॉर्ड किया गया कि एक बच्चे की मौत हुई है। मृत्यु से पहले उसको तेज बुखार आया था। इसके साथ शरीर पर दाने/चकत्ते (त्वचा संक्रमण या ‘माता’ जैसे), मुंह में छाले, पेट दर्द, उल्टी-दस्त, भूख न लगना, कमजोरी, झटके इत्यादि लक्षण भी दिखाई दिए थे। डॉक्टर के लिए यह एक नई प्रकार की बीमारी थी। नई बीमारी हमेशा मेडिकल के लिए चैलेंज होती है। 

 

डॉक्टरों की टीम ने सर्च करना शुरू किया। घर-घर जाकर प्रत्येक बच्चे की जांच की जाने लगी। यह बिल्कुल भी आसान नहीं था क्योंकि डॉक्टर को देखते ही आदिवासी, अपने बच्चों को लेकर जंगलों में भाग जाते हैं। उनको समझाना बहुत मुश्किल होता है कि, डॉक्टर एक अच्छा इंसान है, इलाज करवाने से बच्चे ठीक हो जाएंगे। कई लोग समझ रहे हैं। उन्होंने अपने बच्चों का इलाज करवाया। 


125 बच्चे हुए स्वस्थ्य, 44 अस्पताल में भर्ती- स्वास्थ्य विभाग के अनुसार बालाघाट जिले के बिरसा विकासखंड के ग्राम कुंडेकसा, अडोरी, कोरका एवं बांदरी में स्वास्थ्य संबंधी समस्या, मौसमी बीमारी, सर्दी खांसी बुखार,चर्मरोग, मीजलस स्कैबीज, मलेरिया के उपचार के लिए अस्पताल मे भती कराए गए बच्चों में से 125 बच्चे स्वस्थ्य होकर अपने गांव लौट गए हैं। 16 अगस्त तक कुल 169 बच्चो मे से 125 बच्चों को सफलता पूर्वक स्वास्थ्य लाभ मिलने के बाद अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया। इस तरह कुल 44 बच्चे अस्पताल में उपचाररत हैं, जो पूर्णतः स्वस्थ्य है।

 

461 बच्चों का इलाज उनके घर पर ही किया, सभी स्वस्थउक्त ग्रामों में 20 सर्वेक्षण टीम, के माध्यम से घर-घर जाकर स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है एवं 4 पीएमजनमन एएमएमयु, बीमार व्यक्तियों की जांच के लिए 10 चिकित्सा अधिकारी एवं 4 एम्बूलेंस भर्ती हेतु लगायी गयी है। स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा बच्चों के स्वास्थ्य पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। अब तक कुल 630 मरीज विभिन्न बीमारियों के मिले, जिसमें 125 को अस्पताल में एवं 461 को घर पर ही उपचार प्रदान कर ठीक किया गया।

 

स्वास्थ्य विभाग द्वारा कुंडेकसा, बोंदारी,कोरका, घुम्मुर, अडोरी मछुरदा, गठिया, मातलामें घर घर सर्वे किया जा रहा है। सर्वे के दौरान 658 बच्चों को विटामिन ए की खुराक ओआरएस वितरण जिंकटेबलेट वितरण दिया गया। 597 बच्चों को आयरन सायरप प्रदान किया गया 521 बच्चों को अल्बडाजोल की टेबललेट खिलायी गयी, 63 बच्चों को मिजल्स का डोस लगाया गया ।