2,700 की कैंसर दवा 27,000 में! सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह मरीजों से ‘दिनदहाड़े डकैती’ है, अधिकारियों की चुप्पी पर उठाए सवाल

2,700 की कैंसर दवा 27,000 में! सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह मरीजों से 'दिनदहाड़े डकैती' है, अधिकारियों की चुप्पी पर उठाए सवाल

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कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जरूरी दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और लूट पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई के दौरान एक चौंकाने वाला उदाहरण सामने रखा। ALSO READ: नोटिस मशीन से जारी हुए लगते हैं, दिल्ली में SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

 

कोर्ट ने बताया कि एक दवा, जिसका अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) 27,000 रुपये प्रिंट किया गया था, वह असल में रिटेलर को महज 2,700 रुपये में उपलब्ध कराई जा रही थी। यानी रिटेलर को मिलने वाली कीमत से MRP सीधे 10 गुना ज्यादा था। इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘यह मरीजों के साथ दिनदहाड़े डकैती है। अगर यह जबरन वसूली नहीं है, तो और क्या है?’

 

दवा के दाम कैसे तय हो रहे ?

सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है, उससे दवा के दाम तय करने की व्यवस्था पर सवाल खड़े होते है। MRP और रिटेलर के बीच दस गुना अंतर बताता है कि सप्लाई चेन में दाम के कई स्तर है। यानी कीमत तय करने की व्यवस्था पारदर्शी नहीं है। इस मामले में निगरानी व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े होते है। ALSO READ: राहुल गांधी ने फोन पर ऐसा क्‍या कहा कि महाराष्‍ट्र के राहुल बोंद्रे ने बदल दिया BJP में जाने का फैसला?

 

अधिकारियों की चुप्पी पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि जिन सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी बाजार में दवाओं की कीमतों और ऐसी अनियमितताओं पर लगाम लगाने की है, वे इस पर पूरी तरह चुप क्यों हैं। कोर्ट ने इसे ‘बेलगाम स्थिति’ करार दिया है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत का ध्यान इस बात की ओर भी आकर्षित किया कि रजिस्टर्ड डॉक्टरों द्वारा मरीजों को जेनेरिक दवाएं लिखने से जुड़े मुद्दे पर भी विचार किया जाना जरूरी है।

 

29 सितंबर को फिर सुनवाई

दवा कंपनियों और रिटेलरों द्वारा मनमाने दाम वसूलने के खिलाफ दायर याचिका पर अब 29 सितंबर को अगली सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने देश में दवा की कीमतें तय करने वाली सप्लाई चेन और इसकी निगरानी व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।