
-प्रभाकर मणि तिवारी
पश्चिम बंगाल सरकार ने इस विरासत के संरक्षण के लिए सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी रेल इंडिया टेक्निकल एंड इकोनॉमिक सर्विस (राइट्स) को अध्ययन का जिम्मा सौंपा है। इसके साथ ही इस सेवा को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी मॉडल) पर चलाने पर विचार किया जा रहा है। इसके लिए इसी सप्ताह राज्य सचिवालय में परिवहन मंत्री अर्जुन सिंह और ऑस्ट्रेलिया के कौंसुल जनरल बर्नार्ड लिंच के बीच बैठक में विस्तार से चर्चा की गई। ALSO READ: मेलोनी बनीं सबसे लंबे वक्त तक इटली की पीएम रहने वालीं नेता, मोदी ने बधाई दी
परिवहन मंत्री अर्जुन सिंह डीडब्ल्यू को बताते हैं, “ट्राम पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त परिवहन प्रणाली है। परिवहन विभाग की कोशिश है कि इस सेवा को जारी रखने के लिए सरकार पर ज्यादा आर्थिक बोझ न पड़े। इसलिए पश्चिम बंगाल सरकार सार्वजनिक-निजी भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल के जरिए ट्रामों के पुनरुद्धार और आधुनिकीकरण पर विचार कर रही है। इसके लिए निविदा जारी की जाएगी। ऑस्ट्रेलिया और बेलारूस की कुछ कंपनियों ने इसमें दिलचस्पी दिखाई है।”
कोलकाता में ही चलती है ट्राम
कोलकाता देश का अकेला ऐसा महानगर है जहां ट्रामें चलती हैं। यह कोलकाता की पहचान के साथ ही ऐतिहासिक विरासत भी है। यह कोलकाता आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।
परिवहन विभाग के एक अधिकारी डीडब्ल्यू से कहते हैं, “कोलकाता में ब्रिटिश दौर से ही ट्रामें चल रही हैं। लेकिन तब से ट्राम प्रणाली की तकनीक में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। ट्रामों को आधुनिक बनाने के लिए तकनीकी सुधारों की जरूरत है। इसलिए राइट्स ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस की दो कंपनियों के साथ बातचीत कर एक अध्ययन करेगी और इसे बेहतर बनाने के सुझाव देगी।”
परिवहन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल में ट्राम सेवा को लावारिस छोड़ दिया गया था। सरकार ने महानगर के ज्यादातर रूटों पर यह सेवा बंद कर इसकी कई बहुमूल्य जमीनें और संपत्तियां बेच दी थीं। ALSO READ: मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों पर जलवायु के गंभीर खतरे का डर
कब हुई थी ट्राम सेवा की शुरुआत?
24 फरवरी 1873 को कोलकाता में सियालदह स्टेशन से आर्मेनियन स्ट्रीट तक पहली बार ट्राम चली थी। उस समय इसे घोड़े खींचते थे। बीच में चार साल बंद रहने के बाद वर्ष 1880 में यह सेवा दोबारा शुरू की गई। इस दौरान स्टीम इंजन से ट्राम चलाने की भी नाकाम कोशिश की गई थी। आखिर में 27 मार्च 1902 को बिजली से ट्राम चलाने में कामयाबी मिली। 1930 के दशक में कोलकाता में तीन सौ से ज्यादा ट्रामें चलती थीं।
यह सेवा ऐतिहासिक हावड़ा ब्रिज को पार कर हुगली के दोनों किनारों को आपस में जोड़ती थी। लेकिन अब यह महानगर के महज दो रूटों पर ही चलती है। बॉलीवुड और बांग्ला फिल्मोद्योग टालीवुड के अनगिनत फिल्मों की शूटिंग भी इन ट्रामों में हो चुकी है।
क्यों लिया गया था बंद करने का फैसला
दो साल पहले तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने ट्राम सेवा को बंद करने का फैसला किया था। लेकिन तब इसका भारी विरोध हुआ था। स्थानीय लोगों और संगठनों की दलील थी कि ट्राम कोलकाता की ऐतिहासिक विरासत और पहचान है। इसे बंद करने की बजाय इसका आधुनिकीकरण जरूरी है।
उस समय विपक्षी दलों ने सरकार पर ट्राम डिपो की बेशकीमती जमीन बेचने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। सरकार की दलील थी कि बेहद धीमी गति के कारण मुख्य सड़कों पर ट्रामों की आवाजाही के कारण ट्रैफिक जाम की समस्या होती है।
सरकार के फैसले के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में कई जनहित याचिकाएं भी दायर की गई कती। उसके बाद अदालत ने इस मुद्दे पर सलाह देने के लिए एक सलाहकार समिति का गठन किया था। अदालत ने बीते साल कई ट्राम लाइनों को नए सिरे से बिछाने का निर्देश दिया था। ALSO READ: हिमालय क्षेत्र में भविष्य में भी ग्लेशियर फ्लड आने का गंभीर खतरा
विरासत के संरक्षण से खुशी
इस ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण के फैसले पर आम लोगों ने प्रसन्नता जताई है। कोलकाता और आसपास के इलाकों में रहने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसने नब्बे के दशक की शुरुआत तक महानगर में परिवहन का प्रमुख साधन रही ट्राम की सवारी नहीं की हो। यह देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की सूची में भी शामिल रही है। कोई तीस साल तक दफ्तर आने-जाने के लिए ट्राम की सवारी करने वाले मनोतोष गांगुली डीडब्ल्यू से कहते हैं, “ट्राम इस महानगर की पहचान रही है। इस विरासत का हर हाल में संरक्षण किया जाना चाहिए।”
दक्षिण कोलकाता के एक कॉलेज में प्रिंसिपल रही सुतपा बनर्जी ने भी दशकों तक ट्राम से आवाजाही की है। अब भी मौका मिलने पर वो इसकी सवारी करना नहीं भूलतीं। वो डीडब्ल्यू से कहती हैं, “सरकार का यह फैसला बढ़िया है। हमें अपनी पहचान और विरासत का संरक्षण करना ही चाहिए। आधुनिकीकरण के जरिए इसे नई पीढ़ी के अलावा पर्यटकों के लिए भी आकर्षक बनाया जा सकता है। उम्मीद है यह काम जल्दी ही शुरू होगा।”
ट्राम सेवा की बेहतरी के लिए लंबे समय तक आंदोलन करने वाले कलकत्ता ट्राम यूजर्स एसोसिएशन (सीटीयूए) के दीप दास डीडब्ल्यू से कहते हैं, “यह एक बेहतरीन फैसला है। आधुनिकीकरण के जरिए इस परिवहन सेवा को मौजूदा दौर में भी बेहद उपयोगी बनाया जा सकता है। इससे शहरी परिवहन की समस्या भी कुछ हद तक दूर हो सकती है।”


